शासकीय कार्यालयों से लेकर राजनीतिक मंचों तक बदलता व्यवहार चिंता का विषय
लेख by रवि सिंह- शिष्टाचार केवल आचरण का विषय है इसे न तो थोपा जा सकता है और न ही यह किसी नियम या अधिनियम से अनिवार्य होता है, फिर भी भारतीय सामाजिक परंपरा में इसका विशेष महत्व रहा है, चाहे पारिवारिक जीवन हो, गुरु–शिष्य परंपरा हो या फिर शासकीय कार्यालयों की कार्यसंस्कृति मर्यादा, सम्मान और संयम को हमेशा समाज की पहचान माना गया है, पुराने समय में गुरु–शिष्य परंपरा केवल चरण वंदन या औपचारिक आदर तक सीमित नहीं थी, शिष्य अपने गुरु के प्रति सम्मान भाव इतना गहरा रखते थे कि यदि गुरु पैदल चल रहे हों और शिष्य किसी वाहन में, तब भी शिष्य आगे निकलना अनुचित मानते थे। उस दौर में यही संस्कार समाज को एक आदर्श स्वरूप प्रदान करते थे।
शासकीय कार्यालयों में भी दिखता था संस्कारों का प्रभाव- एक समय था जब शासकीय कार्यालयों में भी पद के अनुरूप सम्मान और व्यवहार स्वतः दिखाई देता था। अधिकारी, कर्मचारी और आम नागरिक—सभी मर्यादा के दायरे में रहते थे, प्रोटोकॉल केवल नियमों तक सीमित नहीं था, बल्कि आचरण और व्यवहार से स्वतः प्रकट होता था, लेकिन समय के साथ स्थितियां तेजी से बदली हैं, आज हालात यह हैं कि शिष्टाचार धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा है और स्वयं को “महत्वपूर्ण” साबित करने की होड़ आगे बढ़ती जा रही है।
ताजा मामला कोरिया जिले से जुड़ा- कोरिया जिले से सामने आया एक मामला इन बदलते सामाजिक और राजनीतिक व्यवहारों पर गंभीर सवाल खड़े करता है, मामला एक ऐसे युवा से जुड़ा है जो भारतीय जनता पार्टी के किसी भी अधिकृत या जिम्मेदार पद पर नहीं है, बावजूद इसके वह स्वयं को राजनीतिक रूप से प्रभावशाली दर्शाने का निरंतर प्रयास करता नजर आ रहा है, यह युवा न केवल बड़े नेताओं के आगमन पर संगठन से अलग जाकर स्वागत-सत्कार कार्यक्रम आयोजित करता दिखाई देता है, बल्कि हाल ही में उसकी एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर सामने आई है जिसमें वह जिला कलेक्टर से मुलाकात करते हुए नजर आता है।
कलेक्टर कार्यालय की वीडियो बनी चर्चा का विषय- सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में यह युवा जिला कलेक्टर के समक्ष जिस अंदाज में बैठा नजर आता है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, भले ही कलेक्टर कार्यालय में रखी कुर्सियां किसी बाध्य प्रोटोकॉल नियम से नहीं जुड़ी हों, लेकिन शिष्टाचार की दृष्टि से आम नागरिकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी के समक्ष मर्यादित ढंग से व्यवहार करें, वीडियो में बैठने की मुद्रा और हावभाव को लेकर यह चर्चा तेज है कि क्या यह व्यवहार प्रशासनिक गरिमा के अनुरूप था।
अनुशासन की पहचान रखने वाली पार्टी से जुड़ा मामला- चूंकि यह मामला सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी से जुड़ाव प्रदर्शित कर रहे एक युवा से संबंधित है, इसलिए प्रश्न और गहरे हो जाते हैं, भाजपा संगठन अपने अनुशासन और संगठनात्मक मर्यादा के लिए जानी जाती है, यही कारण है कि यह सवाल उठना स्वाभाविक है क्या संगठन से जुड़े होने का दावा करने वाला कोई व्यक्ति अनुशासन से ऊपर हो सकता है?
संगठन से अलग चलने की प्रवृत्ति- पार्टी के भीतर भी यह चर्चा आम है कि संबंधित युवा संगठन के कार्यक्रमों में नियमित सहभागिता नहीं करता, जिला संगठन से अलग हटकर गतिविधियां संचालित करता है, बड़े नेताओं के आगमन पर ही सक्रिय दिखाई देता है, स्वयं की अलग गिनती और पहचान स्थापित करने का प्रयास करता है, बताया जा रहा है कि वह अक्सर संगठनात्मक निर्णयों से इतर जाकर स्वागत-सत्कार कार्यक्रम आयोजित करता है, जिससे पार्टी के भीतर “एकला चलो” की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
कार्यकर्ताओं से दूरी, नेतृत्व से निकटता का प्रयास- जानकारी के अनुसार यह युवा जिले के पार्टी पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं से दूरी बनाए रखता है केवल शीर्ष नेताओं की उपस्थिति वाले कार्यक्रमों में सक्रिय रहता है, लगातार यह प्रयास करता है कि बड़े नेता उसे अलग तवज्जो दें यह व्यवहार संगठनात्मक संतुलन के विपरीत माना जा रहा है।
सवाल सिर्फ व्यक्ति का नहीं, प्रवृत्ति का है- यह मामला किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि उस प्रवृत्ति का प्रतीक बनता जा रहा है जिसमें सत्ता की निकटता को अधिकार समझ लिया जाता है, शिष्टाचार को कमजोरी माना जाने लगा है, अनुशासन से पहले प्रदर्शन को महत्व दिया जाता है, यह प्रवृत्ति यदि समय रहते नहीं रोकी गई, तो न केवल राजनीतिक संस्कृति बल्कि प्रशासनिक मर्यादा भी प्रभावित हो सकती है।
शिष्टाचार नियम नहीं, संस्कार है- शिष्टाचार कोई लिखित कानून नहीं, बल्कि सामाजिक संस्कार है, यह पद से नहीं, सोच से जुड़ा होता है, और यही संस्कार किसी व्यक्ति की असली पहचान बनाते हैं, आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा नेतृत्व को धैर्य और मर्यादा का पाठ पढ़ाया जाए, संगठनात्मक अनुशासन को केवल भाषणों तक सीमित न रखा जाए, और सत्ता की निकटता को व्यवहारिक सीमा का उल्लंघन न बनने दिया जाए, क्योंकि सत्ता अस्थायी होती है, लेकिन आचरण ही व्यक्ति की स्थायी पहचान बनता है।

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