- करोड़ों की सार्वजनिक संपत्ति पर ‘निजी तानाशाही’, पर्यटन विभाग और सरकार कटघरे में
- सुकून की जगह या जनाक्रोश का केंद्र? घुनघुट्टा रिसोर्ट में प्रबंधन की मनमानी से पर्यटक नाराज़
- रोक-टोक और अभद्र व्यवहार से बिगड़ी घुनघुट्टा रिसोर्ट की छवि, पर्यटन पर संकट
- प्रकृति तो सुंदर, व्यवस्था कठोर, घुनघुट्टा रिसोर्ट से पर्यटक मायूस
- ऊपर बात कर लीजिए’ बना डरावना जवाब, घुनघुट्टा रिसोर्ट में बढ़ता आक्रोश
- पर्यटकों से बदसलूकी का आरोप, घुनघुट्टा रिसोर्ट को लेकर यूथ कांग्रेस का विरोध
- पर्यटन के नाम पर अघोषित पाबंदी? घुनघुट्टा रिसोर्ट में सुकून गायब


-राजन पाण्डेय-
सोनहत 07 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। यह सवाल अब सिर्फ पर्यटकों की नाराजगी नहीं रहा, बल्कि जनहित और सार्वजनिक धन की जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन चुका है, घुनघुट्टा रिसोर्ट आखिर किसके लिए बना है? क्या यह रिसोर्ट आम नागरिकों और पर्यटकों के सुकून के लिए है, या फिर एक मैनेजर की मनमानी और तानाशाही के लिए? सरकार ने सोनहत के घुनघुट्टा रिसोर्ट को करोड़ों रुपये की लागत से विकसित किया, यह पैसा जनता का पैसा है टैक्स और सार्वजनिक संसाधनों से, उद्देश्य साफ था पर्यटन को बढ़ावा, स्थानीय रोजगार, नागरिकों और पर्यटकों को प्रकृति के बीच सुकून लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट बताई जा रही है।
बता दे की प्रकृति की गोद में बसे सोनहत के घुनघुट्टा रिसोर्ट की पहचान लंबे समय तक शांति, सुकून और हरियाली के लिए रही है, लेकिन बीते कुछ समय से यह पर्यटन स्थल नाराजगी, असंतोष और शिकायतों के केंद्र में आ गया है, दूर-दराज़ जिलों से सुकून के पल बिताने आने वाले पर्यटक अब खुद को असहज, अपमानित और नियंत्रित महसूस कर रहे हैं, हालात यह हैं कि कई सैलानी यहां से खराब अनुभव लेकर लौट रहे हैं और दोबारा न आने की बात कह रहे हैं, घुनघुट्टा रिसोर्ट आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां प्रशासनिक हस्तक्षेप और पारदर्शी व्यवस्था की सख्त जरूरत है, यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो यह सुंदर स्थल सुकून की पहचान नहीं, बल्कि नाराजगी का प्रतीक बनकर रह जाएगा।
पब्लिक का पैसा, लेकिन पब्लिक के लिए मनाही?- पर्यटकों और स्थानीय नागरिकों के आरोप बेहद गंभीर हैं रिसोर्ट में घुसने की अनुमति नहीं, घूमने, बैठने, तस्वीर लेने तक पर रोक-टोक, सिर्फ फोटो खिंचवाने भर पर बदतमीजी और अपमानजनक व्यवहार लोग पूछ रहे हैं जब पैसा जनता का है, तो सुविधा जनता को क्यों नहीं?
बदतमीजी का ‘अधिकार’ किसने दिया?- सबसे बड़ा सवाल मैनेजर कुशवाहा के व्यवहार को लेकर उठ रहा है, आरोप है कि पर्यटकों से असभ्य भाषा में बात की जाती है, बेवजह रोका जाता है, आदेश ऊपर से है कहकर जिम्मेदारी टाल दी जाती है, यह सवाल अब सार्वजनिक बहस का विषय है किस नियम, किस आदेश और किस अधिकार के तहत कोई मैनेजर जनता से बदतमीजी कर सकता है?
पर्यटन विभाग की भूमिका पर सवाल- पर्यटन विभाग ने मैनेजर को किस उद्देश्य से तैनात किया है? लोगों को सहूलियत देने के लिए? रिसोर्ट को आमजन के लिए सुलभ बनाने के लिए? या फिर नागरिकों को रोकने, अपमानित करने और सार्वजनिक स्थल को निजी जागीर की तरह चलाने के लिए? यदि मैनेजर का व्यवहार सही है, तो विभाग को इसे लिखित नियमावली में सार्वजनिक करना चाहिए, और यदि गलत है, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं?
करोड़ों की संपत्ति कहीं ‘निजी रिसोर्ट’ तो नहीं बन गई?- घुनघुट्टा रिसोर्ट को लेकर लोगों में यह धारणा गहराती जा रही है कि यह रिसोर्ट नागरिकों के लिए नहीं, बल्कि कुछ लोगों के निजी नियंत्रण में चला गया है, यह स्थिति न सिर्फ पर्यटन को नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि सरकारी छवि और जनविश्वास को भी चोट पहुंचा रही है।
यह सिर्फ रिसोर्ट का मामला नहीं- यह मुद्दा केवल घुनघुट्टा रिसोर्ट तक सीमित नहीं है, यह सवाल है जनता के अधिकारों का, सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग का और सरकारी जवाबदेही का यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो घुनघुट्टा रिसोर्ट सुकून की पहचान नहीं, बल्कि सरकारी उपेक्षा और अफसरशाही की मनमानी का प्रतीक बन जाएगा, अब देखना यह है कि सरकार और पर्यटन विभाग जनता के साथ खड़े होते हैं या एक मैनेजर की मनमानी पर आंख मूंदे रहते हैं।
प्रवेश से ही शुरू हो जाती है परेशानी– पर्यटकों का आरोप है कि रिसोर्ट में प्रवेश प्रक्रिया ही अनावश्यक रूप से कठिन बना दी गई है, कई बार गेट पर ही रोक दिया जाता है, प्रवेश मिलने पर भी कर्मचारियों की कठोर और असहयोगात्मक भाषा का सामना करना पड़ता है, परिसर के भीतर घूमने, बैठने और तस्वीरें लेने तक पर बार-बार टोका जाता है पर्यटकों का कहना है कि वे यहां आराम और प्रकृति का आनंद लेने आते हैं, न कि किसी अनुशासनात्मक जांच के लिए।
ऊपर बात कर लीजिए…सबसे बड़ी समस्या- शाम 4 बजे या उसके बाद पहुंचने वाले पर्यटकों के लिए स्थिति और भी खराब बताई जा रही है, कई मामलों में गेट ही नहीं खोला जाता, निवेदन करने पर एक ही जवाब ऊपर बात कर लीजिए पर्यटकों का आरोप है कि फोन पर जिस अधिकारी से बात कराई जाती है, वह अक्सर जिले के बाहर से बात करता है और कठोर शब्दों में मना कर देता है। इससे लोगों में निराशा और आक्रोश और बढ़ जाता है।
नियमों की भरमार, लेकिन नियमावली गायब– एक बड़ा विरोधाभास यह भी सामने आया है कि रिसोर्ट परिसर के अंदर या बाहर किसी प्रकार की लिखित नियमावली प्रदर्शित नहीं है, पर्यटकों को नियमों की पूर्व जानकारी नहीं दी जाती, इसके बावजूद नियमों का हवाला देकर कड़ी रोक-टोक की जाती है, पर्यटकों का कहना है कि प्रबंधन को पहले बुनियादी सुविधाएं सुधारने पर ध्यान देना चाहिए, न कि केवल नियंत्रण और पाबंदियों पर।
सुविधाओं का अभाव, नियंत्रण पर जोर- शिकायतों के अनुसार बैठने, जानकारी देने और मार्गदर्शन जैसी मूलभूत सुविधाएं अपर्याप्त हैं, कर्मचारियों का व्यवहार सेवाभाव से दूर नजर आता है, हर छोटी बात पर “ऊपर से आदेश” का हवाला देकर पर्यटकों को चुप करा दिया जाता है, इससे रिसोर्ट का इको-टूरिज्म का उद्देश्य ही सवालों में आ गया है।
स्थानीय पर्यटन और रोजगार पर असर- घुनघुट्टा रिसोर्ट कोरिया जिले के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल है। यहां आने वाले पर्यटक स्थानीय होटल, छोटे दुकानदार, टैक्सी और गाइड, ग्रामीण रोजगार के लिए आय का बड़ा साधन हैं। लगातार बढ़ती नकारात्मक प्रतिक्रियाओं से स्थानीय पर्यटन व्यवसाय पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
सोशल मीडिया पर भी फूटा गुस्सा– बीते दिनों सोशल मीडिया पर कई पर्यटकों ने रिसोर्ट प्रबंधन के रवैये को लेकर नकारात्मक अनुभव साझा किए हैं, लोगों का कहना है कि यदि जल्द सुधार नहीं हुआ, तो घुनघुट्टा रिसोर्ट की पहचान नकारात्मक टूरिस्ट स्पॉट के रूप में बन जाएगी, जो सोनहत की छवि के लिए घातक होगा।
भाजपा जिलाध्यक्ष का बयान यदि ऐसा हो रहा है तो यह गलत है- घुनघुट्टा रिसोर्ट को लेकर उठ रहे सवालों पर भारतीय जनता पार्टी के कोरिया जिलाध्यक्ष देवेंद्र तिवारी ने प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने कहा इस विषय में अभी मुझे पूरी जानकारी नहीं है, लेकिन यह सुविधा क्षेत्र की जनता और पर्यटकों के लिए है, उन्हें यह सुविधा मिलनी चाहिए, मैं इस मामले की जानकारी लेता हूँ और यदि ऐसा हो रहा है, तो यह गलत है, इस बात से सरकार को भी अवगत कराऊँगा, भाजपा जिलाध्यक्ष के इस बयान के बाद अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या पर्यटन विभाग से वस्तुस्थिति की रिपोर्ट ली जाएगी, क्या रिसोर्ट प्रबंधन के व्यवहार की जांच होगी, और क्या जनता व पर्यटकों को वास्तव में उनका अधिकार और सुविधा मिल पाएगी, स्थानीय लोगों का कहना है कि अब यह सिर्फ शिकायत का विषय नहीं रहा, बल्कि सरकारी जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है, यदि सत्ता पक्ष के जिला अध्यक्ष तक यह मामला पहुँचा है, तो जनता को उम्मीद है कि घुनघुट्टा रिसोर्ट को “निजी नियंत्रण” से निकालकर फिर से सार्वजनिक सुविधा के रूप में स्थापित किया जाएगा।

यूथ कांग्रेस का विरोध, आंदोलन की चेतावनी-
रिसोर्ट प्रबंधन की कार्यप्रणाली को लेकर यूथ कांग्रेस अध्यक्ष प्रकाश चन्द्र साहू ने तीखी नाराजगी जताई है, उन्होंने कहा घुनघुट्टा रिसोर्ट को क्षेत्र के पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विकसित किया गया है, न कि पर्यटकों को प्रताडç¸त करने के लिए।
कांग्रेस नेता अनित दुबे और यूथ कांग्रेस अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि रिसोर्ट में अघोषित पाबंदियां लगाई जा रही हैं, कर्मचारियों का व्यवहार अभद्र और तानाशाहीपूर्ण है, बाहरी जिलों से आने वाले पर्यटक खराब अनुभव लेकर लौट रहे हैं, जो सोनहत के लिए ठीक नहीं, यूथ कांग्रेस ने स्पष्ट किया है कि यदि जल्द ही स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो वे कलेक्टर कोरिया से औपचारिक शिकायत करेंगे और आवश्यकता पड़ने पर विरोध-आंदोलन भी किया जाएगा।


प्रशासन के सामने अहम सवाल
क्या पर्यटन स्थल आम नागरिकों के लिए हैं या केवल प्रबंधन की मर्जी पर?
बिना लिखित नियमावली के पाबंदियां कितनी जायज हैं?
यदि पर्यटक निराश होकर लौटेंगे, तो पर्यटन विकास का लक्ष्य कैसे पूरा होगा?
सरकार से सीधे सवाल अब सवाल सीधे सरकार और प्रशासन से हैं—
क्या सार्वजनिक धन से बना रिसोर्ट आम जनता के लिए नहीं है?
क्या एक मैनेजर सरकार से ऊपर है?
क्या पर्यटन विभाग इस व्यवहार से सहमत है?
और सबसे अहम—क्या मैनेजर कुशवाहा पर कार्रवाई होगी या नहीं?
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