एक अधिकारी, दो नगरीय निकाय, व्यवस्था सुधरेगी या जुगाड़ और गहराएगा?
जब एक नगर पालिका नहीं संभल रही, तो नगर पंचायत पटना किस भरोसे?
वित्तीय प्रभार का खेल? पटना नगर पंचायत में फंड और फैसलों पर सवाल
सुशासन या स्थानीय जुगाड़, दो नगरीय निकायों की चाबी एक ही हाथ में क्यों?
जनप्रतिनिधि असंतुष्ट, फिर भी दोहरी जिम्मेदारी: प्रशासनिक फैसले कटघरे में
दो कुर्सियाँ, एक अधिकारी: पारदर्शिता या प्रभाव की जीत?
-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर/पटना,06 जनवरी 2026(घटती-घटना)। कोरिया जिले के नवगठित पटना नगर पंचायत को जब कथित भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे पूर्व सीएमओ से मुक्त किया गया, तब यह उम्मीद जगी कि अब यहां नए नेतृत्व के साथ स्वच्छ और पारदर्शी नगरीय प्रशासन की शुरुआत होगी। लेकिन यह उम्मीद ज्यादा दिन नहीं टिक सकी। जैसे ही यह जानकारी सामने आई कि बैकुंठपुर नगर पालिका के वर्तमान सीएमओ को ही पटना नगर पंचायत का भी वित्तीय प्रभार सौंप दिया गया है, वैसे ही प्रशासनिक हलकों और आमजन के बीच एक तीखा सवाल खड़ा हो गया यह सुशासन है या फिर जुगाड़ तंत्र?
पटना नगर पंचायत को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के बाद यदि वही पुरानी कार्यशैली और दोहरे प्रभार की व्यवस्था लागू की जाती है, तो यह नवगठित निकाय के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाता है,आज जरूरत है स्पष्टता, पारदर्शिता और स्वतंत्र प्रशासनिक ढांचे की न कि ऐसे फैसलों की,जो सुशासन से ज्यादा जुगाड़ की बू दें, अब देखना यह होगा कि शासन और नगरीय प्रशासन विभाग इस फैसले पर पुनर्विचार करता है या नहीं, क्योंकि सवाल सिर्फ एक अधिकारी का नहीं,बल्कि दो नगरीय निकायों की कार्यप्रणाली और जनता के भरोसे का है, यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की पोस्टिंग का नहीं है,यह सवाल है प्रशासनिक पारदर्शिता का जवाबदेही का और नवगठित नगर पंचायत पटना के भविष्य का अगर अभी स्पष्टता नहीं लाई गई,तो यह निर्णय आने वाले समय में बड़े विवाद और अविश्वास की वजह बन सकता है।
नवगठित नगर पंचायत, लेकिन पुरानी व्यवस्था?- पटना नगर पंचायत हाल ही में गठित नगरीय निकाय है, स्वाभाविक है कि यहां विकास कार्यों के लिए धन की आवक आने वाले समय में बढ़ेगी, ऐसे में अलग, स्वतंत्र और पूर्णकालिक सीएमओ की नियुक्ति अपेक्षित थी, लेकिन इसके बजाय बैकुंठपुर के सीएमओ को ही दोहरी जिम्मेदारी सौंप दी गई, प्रशासनिक जानकारों का कहना है कि एक अधिकारी के पास दो नगरीय निकायों का वित्तीय नियंत्रण होना खासकर तब, जब उनमें से एक नवगठित और फंड-समृद्ध होने जा रहा हो, हितों के टकराव और निगरानी की कमी को जन्म दे सकता है।
‘जुगाड़’ की चर्चा क्यों?- स्थानीय चर्चाओं में यह बात जोर पकड़ रही है कि बैकुंठपुर सीएमओ स्थानीय निवासी हैं और उनका संबंध एक प्रभावशाली परिवार से बताया जाता है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या इसी स्थानीय प्रभाव और पहुंच के चलते उन्हें अपने ही गृह जिले में दो-दो नगरीय निकायों का प्रभार मिल गया? जबकि नगरीय प्रशासन विभाग में सीएमओ की कमी इतनी भी नहीं बताई जाती कि ऐसी मजबूरी में दोहरा प्रभार देना पड़े, यही कारण है कि इसे प्रशासनिक विवेक से ज्यादा ‘जुगाड़’ के रूप में देखा जा रहा है।
बैकुंठपुर में असंतोष, पटना की जिम्मेदारी कैसे?- सबसे बड़ा और चिंताजनक पहलू यह है कि बैकुंठपुर नगर पालिका में ही सीएमओ के कार्यकाल को लेकर संतोष का माहौल नहीं है, स्थानीय स्तर पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि नगर पालिका की व्यवस्था पटरी पर नहीं है, विकास कार्यों की गति और गुणवत्ता पर सवाल हैं, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक भी भीतर ही भीतर असंतुष्ट हैं, लेकिन स्थानीय होने के कारण यह विरोध खुलकर सामने नहीं आ पा रहा, जो अक्सर दबा दिया जाता है, अब सवाल यह है कि जब एक नगर पालिका की व्यवस्था नहीं सुधर पा रही, तो नवगठित नगर पंचायत पटना की जिम्मेदारी कैसे संभाली जाएगी?
एक अधिकारी, दो नगरीय निकाय, व्यवस्था सुधरेगी या और उलझेगी?- सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक स्थानीय अधिकारी के पास एक साथ नगर पालिका और नगर पंचायत की जिम्मेदारी देने से व्यवस्था वास्तव में सुधरेगी या और बिगड़ेगी? जब एक नगर पालिका की कार्यप्रणाली पहले से ही सवालों के घेरे में हो, विकास कार्यों की रफ्तार पर असंतोष हो और जनप्रतिनिधि भीतरखाने नाराज़ हों, तो उसी अधिकारी को दूसरे नगरीय निकाय की जिम्मेदारी देना प्रशासनिक विवेक पर सवाल खड़े करता है।
जब एक नगर पालिका नहीं संभल पा रही, तो दूसरी कैसे संभलेगी?- यह तर्क समझ से परे है कि जो अधिकारी एक नगर पालिका की व्यवस्था पटरी पर नहीं ला सका, वह नवगठित नगर पंचायत की जिम्मेदारी कैसे बेहतर ढंग से निभा पाएगा? नगर पंचायत पटना एक नया निकाय है, जहां नीति, योजना और पारदर्शी शुरुआत की सबसे ज्यादा जरूरत है। लेकिन वहां भी वही चेहरा, वही कार्यशैली और वही अधिकारी तो बदलाव किस बात का?
असंतोष दबा है, खत्म नहीं हुआ- नगर पालिका बैकुंठपुर में जनप्रतिनिधि, पार्षद और आम नागरिक इस अधिकारी की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं बताए जाते, लेकिन स्थानीय होने के कारण विरोध खुलकर सामने नहीं आ पा रहा, अब यही सवाल पटना नगर पंचायत को लेकर उठ रहा है अगर बैकुंठपुर में असंतोष दबा हुआ है, तो पटना में संतुष्टि किस भरोसे पैदा होगी?
वित्तीय प्रभार: संयोग या उद्देश्य?- सबसे संवेदनशील सवाल वित्तीय प्रभार को लेकर है, क्या पटना नगर पंचायत में अधिक फंड की संभावित आवक को देखते हुए ही एक ही अधिकारी को वित्तीय जिम्मेदारी सौंपी गई है? क्या यह सिर्फ प्रशासनिक निर्णय है, या फिर जहां ज्यादा राशि, वहीं वही अधिकारी जैसा संदेश देने वाला फैसला?
सुशासन बनाम जुगाड़, फैसला कौन करेगा?- यदि नगरीय प्रशासन विभाग के पास सीएमओ की संख्या पर्याप्त है, तो फिर एक स्थानीय अधिकारी को गृह जिले में दो-दो नगरीय निकायों का प्रभार देना समझ से परे है, यह निर्णय सुशासन की मंशा से लिया गया या स्थानीय जुगाड़ और प्रभाव के कारण, इसका जवाब अब प्रशासन को देना होगा।
वित्तीय प्रभार पर खास नजर- इस पूरे घटनाक्रम में ‘वित्तीय प्रभार’ शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में है, राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह सवाल तैर रहा है कि क्या पटना नगर पंचायत में अधिक फंड आने की संभावना को देखते हुए ही यह प्रभार सौंपा गया? क्या एक ही अधिकारी के हाथ में दो नगरीय निकायों का वित्तीय नियंत्रण देना उचित है? यदि पारदर्शिता और जवाबदेही सर्वोपरि है, तो ऐसे मामलों में स्वतंत्र पदस्थापना ही बेहतर मानी जाती है।
सवाल जो जवाब चाहते हैं-
- क्या यह निर्णय सुशासन की भावना से लिया गया है?
- या फिर स्थानीय प्रभाव और जुगाड़ का परिणाम है?
- क्या नगरीय प्रशासन विभाग इस फैसले की समीक्षा करेगा?
- और सबसे अहम—पटना नगर पंचायत की व्यवस्था किस भरोसे सुधरेगी?
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