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कोरिया@ जन्मदिवस की राजनीति और जनसेवा का सच

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भव्य उत्सव बनाम गरीबों को कंबल वितरण,शिवपुर चरचा का असली जनसेवक कौन ?
-रवि सिंह-
कोरिया,02 जनवरी 2026(घटती-घटना)।
राजनीति में जन्मदिवस अब निजी उत्सव नहीं रहे,वे शक्ति प्रदर्शन,भीड़ जुटाने और सोशल मीडिया की चमक का अवसर बन चुके हैं, बड़े-बड़े मंच,पोस्टर,केक,आतिशबाज़ी और जयकारों के बीच एक संदेश देने की कोशिश होती है देखिए,मेरे साथ कितने लोग हैं,लेकिन इसी शोरगुल के बीच शिवपुर चरचा में एक दूसरा दृश्य भी दिखा—जहाँ जन्मदिवस को गरीबों को कंबल वितरण जैसे शांत, मानवीय काम से जोड़ा गया,यही से असली सवाल जन्म लेता है जनता के लिए नेता कौन है? जो अपने जन्मदिवस पर जश्न मनवाए, या कोई दूसरा ऐसे ही या अन्य किसी विशेष दिवस के दिन किसी ठिठुरते गरीब को राहत दे?
सेवा दिखावे से बड़ी होती है : भव्य आयोजन क्षणिक होते हैं, मंच उतरते ही भीड़ छंट जाती है, पोस्टर उतर जाते हैं और उत्सव यादों में सिमट जाता है,लेकिन सर्द रात में ओढ़ा गया कंबल केवल कपड़ा नहीं होता—वह सम्मान, संवेदना और भरोसे का प्रतीक होता है, जनसेवा का असली मूल्य वहीं दिखाई देता है, जहाँ कोई कैमरा न हो, कोई नारा न हो—सिर्फ ज़रूरत और समाधान हो।
शिवपुर चरचा में तुलना स्वाभाविक है : जब एक ओर जन्मदिवस को शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाया जाए और दूसरी ओर किसी विशेष दिन किसी के चेहरे पर राहत की मुस्कान लाई जाए,तो तुलना होना स्वाभाविक है,यह तुलना किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि राजनीति की प्राथमिकताओं के खिलाफ है। क्या जनसेवा का मतलब केवल साल में एक दिन दिखना है? या फिर हर दिन, हर परिस्थिति में लोगों के साथ खड़ा रहना?
नगर पालिका अध्यक्ष ने जन्मदिवस को बनाया नगर उत्सव का विषय : शिवपुर चरचा नगर पालिका में 1 जनवरी 2026 का दिन किसी उत्सव से कम नजर नहीं आया,जिलेभर के भाजपा नेताओं का हुजूम शिवपुर चरचा में नजर आया,अवसर नगर पालिका के अध्यक्ष के जन्मदिवस का था और यह किसी उत्सव से कम नहीं आया।
जनता सब देखती है…
आज का मतदाता सिर्फ भाषण नहीं सुनता,वह व्यवहार देखता है। वह यह समझता है कि कौन अवसर को उत्सव बनाता है और कौन अवसर को सेवा में बदल देता है,शिवपुर चरचा की जनता के सामने यह सवाल अब खुलकर खड़ा है नेता वही जो जन्मदिन पर माला पहने,या वह जो उसी दिन किसी जरूरतमंद को कंबल ओढ़ाए? जन्मदिवस हर किसी का होता है,लेकिन उसे कैसे मनाया जाए, यही चरित्र बताता है, जनसेवा मंच से नहीं, मंशा से होती है, और अंततः इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो शोर नहीं,सहारा बनते हैं,तो सवाल आज भी वही है, शिवपुर चरचा का असली जनसेवक कौन?


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