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रायपुर@ 2025 की अंतिम शाम और 2026 की पहली सुबह

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एक वर्ष का हिसाब,नए सवेरे का संकल्प
रायपुर 31 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)।
समय कभी रुकता नहीं,वह बस चुपचाप एक शाम को समेटता है और अगली सुबह के साथ नई उम्मीदें खोल देता है,2025 की अंतिम शाम भी कुछ ऐसी ही है, डूबते सूरज के साथ बीते साल की थकान,अधूरे वादे, अधूरी योजनाएँ और कुछ हासिल की गई उपलब्धियाँ मन में उतर आती हैं, और फिर, उसी क्षितिज पर 2026 की पहली सुबह उगती है नई रोशनी, नई दिशा और नए संकल्पों के साथ।
2025 हमारे लिए मिला-जुला साल रहा, कहीं उम्मीदों ने आकार लिया,तो कहीं अपेक्षाएँ ठिठक कर रह गईं, विकास की बातें हुईं, योजनाएँ बनीं, पर कई मोर्चों पर रफ्तार सुस्त रही, कुछ अधूरे निर्माण आज भी सवाल पूछते हैं कब पूरे होंगे? कुछ नीतियाँ कागज़ों से आगे बढ़ीं,तो कुछ ज़मीन पर उतरते-उतरते थक गईं। यह शाम हमें आईना दिखाती है, ताकि हम भूलें नहीं,बल्कि सीखें। लेकिन सुबह का स्वभाव अलग होता है, वह शिकायत नहीं करती,अवसर देती है, 2026 की पहली सुबह हमें याद दिलाती है कि हर नया साल सिर्फ तारीख़ नहीं बदलता, वह सोच बदलने का मौका देता है,यह वह क्षण है जब हम तय कर सकते हैं कि पिछली गलतियों को दोहराना है या उनसे आगे निकलना है, क्या विकास केवल घोषणाओं में रहेगा, या समय-सीमा के साथ ज़मीन पर दिखेगा? क्या शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पानी और रोज़गार सिर्फ मांग बनकर रहेंगे, या समाधान बनेंगे? यह सुबह नागरिकों और प्रशासन—दोनों से सवाल भी पूछती है और जिम्मेदारी भी देती है, नागरिकों से कि क्या हम भागीदारी निभाएँगे, जवाबदेही माँगेंगे, और सकारात्मक दबाव बनाएँगे? प्रशासन से,कि क्या वह पारदर्शिता,गति और गुणवत्ता को प्राथमिकता देगा? जब ये दोनों साथ चलते हैं, तब सुबह सचमुच उजली होती है। नई सुबह का अर्थ केवल उम्मीद नहीं,अनुशासन भी है समय पर काम,सही योजना,और परिणाम पर नज़र। यह वह समय है जब अधूरे काम पूरे हों,ठंडे बस्ते की फाइलें गरम हों,और निर्णयों में साहस दिखे। यह वह घड़ी है जब विकास का मतलब केवल इमारतें नहीं,बल्कि बेहतर जीवन हो, 2025 की अंतिम शाम हमें ठहरकर सोचने का अवसर देती है; 2026 की पहली सुबह आगे बढ़ने का हौसला। अगर हम इस सुबह को संकल्प में बदल सकें—तो आने वाला साल सिर्फ नया नहीं, बेहतर होगा। क्योंकि अंततः, हर शाम का अर्थ सुबह से है—और हर सुबह की कीमत हमारे कर्म से।


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