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कोरिया/बैकुंठपुर@ प्रशासन की कठोरता या कर्मचारियों का उग्र आक्रोश?

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एमसीबी कलेक्टर के निलंबन आदेश के बाद ‘कलेक्टर मुर्दाबाद’ के नारे…
कोरिया/बैकुंठपुर,31 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ में कर्मचारियों की तीन दिवसीय हड़ताल के बीच प्रशासन और कर्मचारियों के संबंधों में तनाव खुलकर सामने आ गया है, एमसीबी जिले में आंदोलन के दौरान तीन कर्मचारियों को निलंबित किए जाने के बाद स्थिति और बिगड़ गई। इस निलंबन के विरोध में कोरिया जिले के बैकुंठपुर मुख्य चौक पर कर्मचारियों ने एमसीबी कलेक्टर मुर्दाबाद के नारे लगाए, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हलचल मच गई, एमसीबी कलेक्टर द्वारा निलंबन की कार्रवाई उन कर्मचारियों पर की गई, जिन पर आरोप है कि वे कार्य पर उपस्थित लिपिकों को आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रहे थे, प्रशासन ने इसे शासकीय कार्य में बाधा मानते हुए त्वरित कार्रवाई की। हालांकि, इस फैसले के बाद एमसीबी से अधिक तीखी प्रतिक्रिया कोरिया जिले में देखने को मिली। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि छत्तीसगढ़ में कर्मचारी आंदोलन अब केवल मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासन- कर्मचारी संबंधों की परीक्षा बन गया है, एक ओर प्रशासन अनुशासन और कामकाज की बात कर रहा है, दूसरी ओर कर्मचारी अपने संवैधानिक अधिकारों का हवाला दे रहे हैं, यदि संवाद का रास्ता नहीं खोला गया, तो ऐसे टकराव आगे और तीखे हो सकते हैं, और इसकी कीमत शासन व्यवस्था को चुकानी पड़ सकती है।
मुर्दाबाद के नारेः विरोध का नया चेहरा या अनुशासनहीनता?
यह प्रश्न अब सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है कि किसी जिले के जिलाधीश—जो जिला दंडाधिकारी भी होता है—के विरुद्ध मुर्दाबाद के नारे लगना क्या सामान्य कर्मचारी व्यवहार कहा जा सकता है? एक पक्ष इसे प्रशासनिक कठोरता और संवेदनहीनता का परिणाम मान रहा है, तो दूसरा पक्ष इसे कर्मचारियों के भीतर घटती विनम्रता और धैर्य से जोड़कर देख रहा है। सच यह है कि अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच संवाद की खाई लगातार गहरी होती दिख रही है।
आंदोलन का तरीका बदला, आक्रोश बढ़ा-
पूर्व के आंदोलनों में कर्मचारी अक्सर शासकीय आदेशों की प्रतियां जलाकर या शांतिपूर्ण धरने के माध्यम से विरोध दर्ज कराते थे। लेकिन एमसीबी की कार्रवाई के बाद जिस तरह व्यक्तिगत पद पर बैठे अधिकारी के खिलाफ नारेबाजी हुई, उसने आंदोलन की भाषा और दिशा—दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या आक्रोश की स्थिति में यह मानवीय भूल है, या फिर विरोध की मर्यादा लांघने का संकेत?
मोदी की गारंटी’ पूरी करने की मांग…
कर्मचारी संघ 11 सूत्रीय मांगों को लेकर हड़ताल पर हैं। उनका कहना है कि सरकार अपने ही चुनावी वादों को पूरा नहीं कर पा रही, मुख्य मांगों में शामिल हैं— महंगाई भत्ता,वेतन विसंगति दूर करना,पेंशन संबंधी सुधार,संविदा कर्मचारियों का नियमितीकरण, पिंगुआ समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करना कर्मचारियों का आरोप है कि दो वर्ष बीत जाने के बावजूद सरकार मौन है। इसी कारण आंदोलन तेज़ हो रहा है और आगे अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी भी दी जा रही है।
प्रशासनिक हठधर्मिता या गलत आचरण?
यह आंदोलन पूर्व घोषित था और इसकी सूचना प्रशासन को पहले ही दी जा चुकी थी। ऐसे में निलंबन की कार्रवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं क्या यह प्रशासन की हठधर्मिता थी? या फिर आंदोलन के नाम पर कार्यालयों में जाकर अन्य कर्मचारियों पर दबाव बनाना गलत आचरण था? सूत्रों के अनुसार निलंबित कर्मचारी संघ से जुड़े नेता थे, जो कार्यालयों में जाकर आंदोलन में शामिल होने का आग्रह कर रहे थे। यही टकराव की असली जड़ मानी जा रही है।


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