लागत शून्य, मुनाफा हजारों का
सोनहत,28 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)। जहां एक ओर किसान पारंपरिक फसलों पर हजारों रुपये खर्च करने के बाद भी लागत निकालने के लिए जूझ रहे हैं,वहीं एक ऐसा खरपतवार ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए वरदान बनकर उभरा है,जिस पर न बीज का खर्च,न खाद,न सिंचाई,और फिर भी मुनाफा नकद। इस खरपतवार का नाम है चकौड़ा।
वर्षाकाल में खाली पड़ी जमीन पर अपने-आप उग आने वाला चकौड़ा इन दिनों सोनहत क्षेत्र के गरीब किसानों,मजदूरों और आदिवासी परिवारों के लिए आमदनी का भरोसेमंद जरिया बन गया है,चकौड़ा अब सूख चुका है और इसके बीज निकालकर ग्रामीण व्यापारीयों को बेच रहे हैं।
धान से ज़्यादा भाव, वो भी बिना खर्च…
ग्रामीणों के मुताबिक,चकौड़ा के बीज 25 से 30 रुपये प्रति किलो बिक रहे हैं, तुलना करें तो जिस धान की फसल पर किसान बीज, खाद, पानी और मजदूरी में भारी खर्च करते हैं,उसी धान का समर्थन मूल्य और बोनस मिलाकर भी औसतन 31 रुपये प्रति किलो तक सिमट जाता है,जबकि निजी मंडियों में यह 20-25 रुपये ही रह जाता है, यानी बिना फूटी कौड़ी खर्च किए चकौड़ा, कई फसलों से ज़्यादा शुद्ध मुनाफा दे रहा है।
लाखों रुपये का कारोबार
स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि बीते एक माह से बाजार में चकौड़ा बीज की आवक तेज है, शुरुआत में भाव 20 रुपये किलो था, जो अब 25-30 रुपये किलो तक पहुंच गया है। अलग-अलग व्यापारियों के यहां अब तक लाखों रुपये का चकौड़ा बीज खरीदा-बेचा जा चुका है—वो भी पूरी तरह नकद भुगतान के साथ।
वनांचल के परिवारों को राहत…
वनांचल के ग्रामीण बताते हैं कि साग-सब्जी या दूसरी नकदी फसलों में मेहनत और लागत दोनों ज्यादा हैं। समय पर मजदूर नहीं मिलना, पानी की कमी और बाजार का जोखिम इन सबके चलते उत्पादन प्रभावित होता है। इसके उलट, चकौड़ा संग्रह में न लागत है,न जोखिम,जंगल और खाली खेतों से बीज इकट्ठा कर सीधे बेच देने से घर की जरूरतें पूरी हो रही हैं।
खरपतवार से अवसर तक…
जिस चकौड़ा को अब तक बेकार समझा जाता था, वही आज ग्रामीणों के लिए संजीवनी बन गया है, यह कहानी बताती है कि संसाधनों की कमी के बीच भी प्रकृति किस तरह बिना लागत के आजीविका के नए रास्ते खोल देती है, बस पहचान और बाजार की जरूरत होती है।
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