- क्या छत्तीसगढ़ में विपक्ष अब एक व्यक्ति का नाम रह गया है? क्या सचमुच कांग्रेस में सवाल पूछने वाला एक ही चेहरा बचा है?
- भूपेश बघेल अकेले क्यों पड़े? कांग्रेस की चुप्पी पर बड़ा सवाल
- एक बोल रहा है…बाकी देख रहे हैं…क्या यही विपक्ष है?
- भाजपा के लिए ‘मौन कांग्रेस’ सबसे बड़ा वरदान
- विपक्ष की खामोशीः बिना लड़े 2028 की राह?
- कांग्रेस बनाम कांग्रेस : अंदरूनी राजनीति
- का पोस्टमॉर्टम सत्ता गई…संघर्ष भी गया?


न्यूज डेस्क
रायपुर,25 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)। भूपेश बघेल ने 1980 के दशक में छात्र राजनीति और युवा कांग्रेस से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की,वे उन नेताओं में माने जाते हैं जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए संगठन को जीवित रखा और सत्ता में रहते हुए निर्णय लेने का साहस दिखाया,आज भी छत्तीसगढ़ कांग्रेस की राजनीति में वे एक केंद्रीय धुरी बने हुए हैं चाहे समर्थन में हों या सवालों के केंद्र में, छत्तीसगढ़ की मौजूदा राजनीति को देखें तो यह सवाल सिर्फ भावनात्मक नहीं,बल्कि राजनीतिक हकीकत से जुड़ा हुआ दिखता है,15 वर्षों तक भाजपा की सत्ता के दौर में जिस नेता ने लगातार सरकार को घेरा,सड़कों से लेकर सदन तक सवाल उठाए, संगठन को जि़ंदा रखा, वह थे भूपेश बघेल, प्रदेश अध्यक्ष रहते हुए उन्होंने सत्ता-विरोध को एक आंदोलन का रूप दिया। नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस 15 साल बाद सत्ता में लौटी और वही नेता मुख्यमंत्री बने, छत्तीसगढ़ की राजनीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां एक असहज लेकिन ज़रूरी सवाल सामने आता है, क्या सत्ता से सवाल पूछने का साहस अब सिर्फ एक ही नेता में बचा है? और अगर हाँ, तो बाकी विपक्ष आखिर कर क्या रहा है? पूर्वमुख्यमंत्री भूपेश बघेल केंद्र बिंदु बने हुए महादेव सट्टा ऐप मामला, कोयला लेवी घोटाला और हाल में घोटाले के आरोप में पुत्र की गिरफ्तारी के साथ खुद भुपेश बघेल पर कई आरोपो बावजूद बघेल के तेवरों में कोई कमी नहीं आई है, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बघेल ‘रक्षात्मक’ होने के बजाय ‘आक्रामक’ राजनीति का रास्ता चुन चुके हैं, भूपेश बघेल ने हाल के दिनों में न केवल राज्य सरकार बल्कि केंद्र सरकार और केंद्रीय जांच एजेंसियों को भी सीधे निशाने पर लिया है,बघेल लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि ED और CBI जैसी एजेंसियां राजनीतिक प्रतिशोध के तहत काम कर रही हैं। वे सार्वजनिक मंचों से कहते रहे हैं कि उन्हें डराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन वे ‘डरने वाले नहीं हैं’, छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद प्रदेश कांग्रेस में एक अजीब सी खामोशी देखी जा रही है, जहां एक समय पार्टी के पास दिग्गजों की पूरी फौज हुआ करती थी,वहीं अब विष्णुदेव साय सरकार के खिलाफ विरोध की कमान अकेले पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने थाम रखी है। राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से गूंज रहा है बाकी बड़े नेता कहां हैं?
भूपेश अकेले क्यों पड़े?
यह महज़ संयोग नहीं है कि छत्तीसगढ़ में सत्ता से टकराने की आवाज़ एक चेहरे तक सिमट गई है, सवाल यह नहीं कि भूपेश बघेल क्यों बोल रहे हैं, सवाल यह है कि बाकी क्यों नहीं बोल रहे? कांग्रेस के भीतर आज एक अघोषित व्यवस्था चल रही है जो नेता पूर्व मंत्री रहे, आज ‘अनुभव’ का ताज पहनकर चुप हैं, जो संगठनात्मक पदों पर हैं, वे प्रेस नोट तक सीमित हैं, जो विधानसभा में हैं, वे सवाल पूछने से ज़्यादा संख्या गिनने में व्यस्त हैं, नाम क्यों नहीं बोलते? क्योंकि बोलने से सुविधा छिनती है, चुप रहने से सुरक्षा मिलती है और इस समीकरण में भूपेश बघेल फिट नहीं बैठते,क्योंकि वह जांच एजेंसियों के दबाव में हैं, राजनीतिक तौर पर सबसे असुरक्षित हैं और फिर भी सत्ता से टकरा रहे हैं यह अकेलापन नेतृत्व की कमजोरी नहीं,सामूहिक कायरता का आईना है, अगर कांग्रेस में 1 बोल रहा है, 10 देख रहे हैं,20 इंतज़ार कर रहे हैं तो यह विपक्ष नहीं,स्वार्थों का क्लब बन जाता है।
भाजपा के लिए यह चुप्पी कितनी फायदेमंद है?
राजनीति में विरोधी की सबसे बड़ी ताकत उसका कमज़ोर विपक्ष होता है, और आज भाजपा को छत्तीसगढ़ में वही वरदान मिला है,भाजपा को क्या मिल रहा है? बिना संघर्ष की सरकार,न सड़क पर दबाव, न सदन में चुनौती,एजेंसी नैरेटिव पर एकाधिकार,भूपेश अकेले निशाने पर, बाकी कांग्रेस ‘डैमेज कंट्रोल’ में नहीं,‘सेल्फ़ सेव’ में, विपक्ष की फूट का लाभ भाजपा को हमला करने की ज़रूरत नहीं, कांग्रेस खुद अपने नेताओं को अकेला छोड़ रही है,जनता में भ्रम अगर विपक्ष ही नहीं बोलेगा, तो सरकार गलत कैसे होगी? साफ़ शब्दों में कहे तो कांग्रेस की चुप्पी भाजपा के लिए सबसे सस्ती और सबसे असरदार रणनीति बन चुकी है,भाजपा को न आंदोलन से निपटना पड़ रहा है, न विपक्षी एकजुटता से,बस इंतज़ार है कि एक नेता थके,टूटे या फँसे, और खेल खत्म।
क्या कांग्रेस खुद अपने पतन की पटकथा लिख रही है?
इतिहास खुद को दोहराता है लेकिन कांग्रेस हर बार उससे सीखने से इनकार कर देती है,लक्षण साफ़ हैं सत्ता जाने के बाद संगठन सुस्त, मुद्दों पर प्रतिक्रिया नहीं,सिफऱ् प्रतिक्रिया की औपचारिकता,नेतृत्व से ज़्यादा ‘सेफ़्टी’ की चिंता, संघर्ष से ज़्यादा ‘अगले समीकरण’ की प्रतीक्षा,यह वही कांग्रेस है जिसने 15 साल संघर्ष के बाद सत्ता पाई और अब 1-2 साल में ही संघर्ष से थक चुकी है,अगर पार्टी यह मान चुकी है कि एक नेता लड़ लेगा,हम बाद में क्रेडिट ले लेंगे,तो यह राजनीति नहीं, आत्मघाती रणनीति है,क्योंकि नेता अकेले नहीं जीतते,आंदोलन अकेले नहीं बनते,और सत्ता वापसी बिना जोखिम के नहीं होती।
भूपेश के बाद कौन? नेतृत्व शून्य का असहज सच…
यह सवाल आज कांग्रेस के भीतर फुसफुसाहट नहीं, भयानक सन्नाटा बन चुका है, छत्तीसगढ़ में अगर आज पूछा जाए भूपेश बघेल के बाद कांग्रेस का चेहरा कौन? तो जवाब में नाम नहीं, नज़रें झुक जाती हैं, क्योंकि सच यह है कि कोई सर्वमान्य नेता नहीं, कोई जमीनी स्वीकार्यता वाला चेहरा नहीं,कोई ऐसा नेता नहीं जो सत्ता से टकराने का जोखिम उठा रहा हो भूपेश बघेल से असहमति हो सकती है,उनके कार्यकाल पर बहस हो सकती है,लेकिन एक तथ्य निर्विवाद है,आज कांग्रेस में उनके कद का कोई दूसरा नेता मैदान में खड़ा ही नहीं है, यह नेतृत्व का संकट नहीं, नेतृत्व निर्माण की विफलता है, जो पार्टी 5 साल सत्ता में रही,वह एक भी दूसरा जन-नेता तैयार नहीं कर पाई यह केवल चूक नहीं,राजनीतिक अपराध है।
संघर्ष अकेला भी इतिहास बनाता है
भूपेश बघेल पर आरोप हो सकते हैं, उनके कार्यकाल पर बहस हो सकती है, उनकी नीतियों से असहमति भी हो सकती है,लेकिन एक बात नकारना मुश्किल है आज छत्तीसगढ़ में सत्ता से टकराने का साहस सबसे ज़्यादा उन्हीं में दिखता है,जब बाकी नेता सुरक्षित चुप्पी ओढ़े हुए हैं,तब कठिन परिस्थितियों में भी मुखर रहना उन्हें सिर्फ नेता नहीं, एक जुझारू जन-राजनीतिक चेहरा बनाता है, इतिहास गवाह है सत्ता कभी चुप्पी से नहीं बदलती,सत्ता बदलती है सवालों से, और अगर सवाल पूछने वाला अकेला रह जाए, तो यह उसकी कमजोरी नहीं, बाकी सबकी राजनीतिक कायरता का प्रमाण होता है।
विपक्ष नहीं बच सिर्फ एक आदमी बचा है
छत्तीसगढ़ की राजनीति आज एक असहज सच्चाई से जूझ रही है विपक्ष नाम की संस्था लगभग मृतप्राय है,और उसके शव पर सिर्फ एक आदमी खड़ा दिखता है, वह आदमी है,भूपेश बघेल, सत्ता से सवाल पूछना अब अपराध हो गया है? आज छत्तीसगढ़ में सत्ता से सवाल पूछना, गलत नीतियों पर आवाज़ उठाना,आदिवासी-किसान-युवा के हक की बात करना राजनीति नहीं,जोखिम बन चुका है,और यही वजह है कि कांग्रेस का बड़ा हिस्सा जो सत्ता में रहते समय क्रांतिकारी हुआ करता था, आज या तो ड्रॉइंग रूम पॉलिटिक्स में है,सत्ता से ‘सेटिंग’ में है या फिर इस इंतज़ार में है कि जो फँसा है, वही लड़े; हम क्यों बोलें?
जिसे सबसे ज़्यादा डरना चाहिए,वही सबसे निडर क्यों है?
विडंबना देखिए जिस नेता पर सबसे ज़्यादा जांचें हैं,जिसके कार्यकाल को रोज़ कटघरे में खड़ा किया जाता है,जिसका बेटा जेल जा चुका है, जिसके बारे में रोज़ अफ़वाह उड़ती है कि अब नंबर लगेगा,वही नेता सबसे ज़्यादा बोल रहा है, और जिन नेताओं पर कोई जांच नहीं,कोई एजेंसी नहीं,कोई व्यक्तिगत खतरा नहीं वे या तो मौन व्रत में हैं, या सत्ता के साथ सभ्य दूरी बनाकर चल रहे हैं, यह चुप्पी डर की नहीं, स्वार्थ की उपज है।
कांग्रेस में आज सबसे सुरक्षित वही है जो कुछ नहीं बोलता
आज कांग्रेस में एक अघोषित फ़ॉर्मूला चल रहा है जो जितना चुप, वह उतना सुरक्षित और इस फ़ॉर्मूले में भूपेश बघेल फिट नहीं बैठते,क्योंकि वह सवाल पूछते हैं, और सवाल सत्ता को सबसे ज़्यादा चुभते हैं।
सवाल सीधा है, जवाब कड़वा
अगर कांग्रेस में सिफऱ् एक नेता बोल रहा है, सिफऱ् एक नेता लड़ रहा है,सिर्फ एक नेता जोखिम उठा रहा है,तो फिर बाकी नेता किस बात के हैं? क्या विपक्ष सिर्फ भूपेश का निजी शौक बन गया है? या फिर कांग्रेस ने सामूहिक रूप से तय कर लिया है कि जो फँस रहा है, वही लड़े हम अगली सरकार में देखेंगे।
सत्ता गई, सलाहकार भी गए क्या यही है छत्तीसगढ़ की असली राजनीति?
छत्तीसगढ़ की राजनीति में आज एक दृश्य बेहद साफ़ दिखाई देता है सत्ता के साथ भीड़ आती है,सत्ता जाते ही सन्नाटा छा जाता है,यह दृश्य किसी आम नेता का नहीं,एक ऐसे नेता का है जो कुछ समय पहले तक प्रदेश का मुख्यमंत्री था भूपेश बघेल, जब सत्ता थी,तब सलाहकार भी थे मुख्यमंत्री रहते हुए भूपेश बघेल के इर्द-गिर्द सलाहकारों की एक पूरी फौज थी, कोई रणनीतिकार कहलाता था,कोई मीडिया मैनेजर, कोई पॉलिसी एक्सपर्ट, कोई ‘ऑल राउंडर’ इन सलाहकारों के नाम चलते थे, फोन व्यस्त रहते थे, दफ्तरों में रुतबा था, अफसर, नेता, कारोबारी सब संपर्क में रहते थे,कांग्रेस सरकार के दौर में ये सलाहकार खुद सत्ता का प्रतीक बन चुके थे,आज वही सलाहकार कहां हैं? आज हालात बदले हैं, भूपेश बघेल मुख्यमंत्री नहीं हैं,वह विपक्ष में हैं, संघर्ष में हैं,जांच,दबाव और राजनीतिक हमलों से घिरे हुए हैं,और ऐसे समय में सवाल उठता है वे सलाहकार कहां हैं? क्या कर रहे हैं? किसके साथ हैं? जवाब चौंकाने वाला है किसी को नहीं पता,जो चेहरे कभी हर मीटिंग,हर रणनीति,हर बयान के केंद्र में रहते थे आज न वे भूपेश बघेल के आसपास हैं, न पार्टी की लड़ाई में दिखते हैं।
सत्ता के सलाहकार, संघर्ष के नहीं?
यह संयोग नहीं है,यह चरित्र है राजनीतिक सलाहकार संस्कृति का, सत्ता में हो तो सलाहकार,सत्ता गई तो दूरी,संघर्ष आया तो गुमनामी इनमें से अधिकांश,वैचारिक नहीं थे,प्रतिबद्ध नहीं थे,संगठन से जुड़े नहीं थे वे सिफऱ् एक चीज़ से जुड़े थे वह है सत्ता से,और जैसे ही सत्ता गई,उनका ‘राजनीतिक नैतिक दायित्व’ भी चला गया,यही है स्वार्थ की राजनीति का असली चेहरा आज अगर भूपेश बघेल जांच एजेंसियों से घिरे हैं,व्यक्तिगत दबाव में हैं,राजनीतिक रूप से सबसे कठिन दौर में हैं,तो यह वही समय होता है, जब सच्चे साथी खड़े दिखते हैं, लेकिन यहाँ न सलाहकार हैं,न रणनीतिक टीम,न सत्ता-काल की चमक यह बताता है कि छत्तीसगढ़ की राजनीति में अब लोग नेता नहीं, सत्ता चुनते हैं, कांग्रेस ही नहीं,पूरी राजनीति का संकट यह समस्या सिर्फ कांग्रेस की नहीं है, यह समस्या है,राजनीतिक अवसरवाद की, सत्ता-आधारित वफादारी की, और जब तक फायदा,तब तक साथ वाली संस्कृति की आज भूपेश बघेल के साथ जो हो रहा है,कल किसी और के साथ होगा, क्योंकि यहाँ नेता अस्थायी हैं, सत्ता स्थायी लालच है।
कांग्रेस बनाम कांग्रेस…अंदरूनी राजनीति का पोस्टमॉर्टम
छत्तीसगढ़ कांग्रेस की सबसे बड़ी लड़ाई भाजपा से नहीं है,उसकी असली लड़ाई है कांग्रेस बनाम कांग्रेस, भीतर क्या चल रहा है? एक खेमा चाहता है टकराव, दूसराखेमा चाहता है समझौता,तीसरा खेमा चाहता है ‘देखते हैं’ परिणाम? कोई स्पष्ट लाइन नहीं, कोई सामूहिक रणनीति नहीं,कोई साझा आंदोलन नहीं,पार्टी में आज तीन किस्म के नेता हैं,लड़ने वाले बहुत कम,संतुलन साधने वाले ज़्यादा,मौन साधक सबसे ज़्यादा और राजनीति में मौन सबसे बड़ा सहयोग होता है सत्ता के लिए, यह अंदरूनी राजनीति धीरे-धीरे भूपेश बनाम बाकी कांग्रेस में बदलती जा रही है, और जब पार्टी का एक धड़ा यह सोच ले कि अगर यह फँसेगा तो रास्ता साफ होगा तो समझ लीजिए, पार्टी खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं, आरी चला रही है।
क्या भाजपा बिना लड़े 2028 की राह साफ कर चुकी है?
यह सवाल अतिशयोक्ति नहीं,रणनीतिक यथार्थ है,भाजपा को क्या करना पड़ रहा है? न बड़े आंदोलन से निपटना, न सशक्त विपक्ष को जवाब देना,न वैकल्पिक नेतृत्व की चिंता पर क्यों? क्योंकि कांग्रेस का विपक्ष बिखरा हुआ है, कांग्रेस का नेतृत्व भ्रम में है,कांग्रेस का संगठन इंतजार में है, राजनीति में इससे बेहतर स्थिति किसी सत्तारूढ़ दल को नहीं मिलती, भाजपा आज यह देख रही है, एक नेता बोल रहा है,बाकी पार्टी चुप है,जनता के मुद्दे बिना आंदोलन के ठंडे पड़ रहे हैं अगर यही स्थिति 2026-27 तक बनी रही, तो 2028 में भाजपा को लड़ाई लड़नी ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि चुनाव से पहले विपक्ष का टूटना, चुनाव जीतने से आधा काम पहले ही कर देता है।
सत्ता बदली,पर विपक्ष का चरित्र नहीं बदला?
2023 के बाद सत्ता फिर भाजपा के पास है,स्वाभाविक था कि कांग्रेस एक मजबूत, आक्रामक विपक्ष की भूमिका निभाए, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि कांग्रेस के अधिकांश पूर्व मंत्री और बड़े संगठनात्मक नेता या तो खामोश हैं,या फिर सत्ता के साथ ‘कार्य-समंजन’ की सुरक्षित राजनीति में लगे दिखते हैं,जनता से जुड़े मुद्दे महंगाई,बेरोजगारी,धान खरीदी,आदिवासी अधिकार, प्रशासनिक मनमानी इन पर संगठित विपक्षी आवाज नजर नहीं आती।
कठिन परिस्थितियों में भी मुखर क्यों हैं भूपेश?
यह विडंबना ही है कि जिन पर सबसे ज़्यादा जांच,दबाव और आरोप हैं,जिनके परिवार तक पर कार्रवाई हो चुकी है, जिनके बारे में रोज ‘जेल जाने की अटकलें’ चलाई जाती हैं,वही नेता सबसे ज्यादा मुखर है, भूपेश बघेल सत्ता की नीतियों पर खुलकर सवाल करते हैं,सड़क से सदन तक बयान देते हैं, और यह जोखिम जानते हुए भी चुप नहीं बैठते कि अगला निशाना वे खुद हो सकते हैं,इसके उलट जो नेता अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं, जिन पर कोई दबाव नहीं है,जिनके पास संसाधन और संगठन दोनों हैं उनकी भूमिका सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित दिखती है।
सवाल सिर्फ भूपेश का नहीं,कांग्रेस की आत्मा का है…
यह बहस किसी एक व्यक्ति को महिमामंडित करने की नहीं है, सवाल यह है कि क्या विपक्ष का धर्म निभाना अब ‘जोखिम’ बन चुका है? क्या सत्ता से टकराने के बजाय सत्ता से तालमेल ही नई राजनीति है? और क्या कांग्रेस में सत्ता में वापसी की चाह सिर्फ भाषणों तक रह गई है? अगर विपक्ष सिर्फ इंतजार करे कि सत्ता खुद गलती करे और अगला चुनाव आ जाए,तो यह विपक्ष नहीं,सुविधा की राजनीति कहलाएगी।
अकेली आवाज भी आईना होती है…
आज की तारीख़ में यह कहना असहज जरूर है, पर झूठ नहीं छत्तीसगढ़ में विपक्ष की धार सबसे साफ़ तौर पर भूपेश बघेल की आवाज में ही सुनाई देती है, हो सकता है उन पर आरोप हों, हो सकता है उनके कार्यकाल पर सवाल हों लेकिन विपक्ष में रहकर सत्ता से सवाल पूछने का साहस उन्हें आज भी एक बड़ा जननेता बनाता है,बाकी नेताओं को तय करना होगा, क्या वे सिर्फ सत्ता आने का सुख भोगना चाहते हैं,या सत्ता लाने के लिए संघर्ष भी करना चाहते हैं, क्योंकि लोकतंत्र में चुप विपक्ष, सत्ता के लिए सबसे बड़ा वरदान होता है।
सत्ता गई…लेकिन संघर्ष नहीं गया…
2023 में सत्ता फिर भाजपा के पास चली गई,आम तौर पर माना जाता है कि सत्ता से बाहर गया नेता या तो चुप हो जाता है,या सुरक्षित कोने में बैठकर हालात का इंतजार करता है,लेकिन छत्तीसगढ़ में तस्वीर उलटी है, आज भी पूर्व मुख्यमंत्री होने के बावजूद,अपने कार्यकाल को लेकर लगातार जांचों के घेरे में, अपने बेटे की गिरफ्तारी जैसी व्यक्तिगत पीड़ा झेलते हुए, रोज ‘अब जेल जाएंगे’ जैसी चर्चाओं का सामना करते हुए भूपेश बघेल चुप नहीं हैं, वह आज भी सरकार की नीतियों पर खुलकर सवाल करते हैं,आदिवासी मुद्दों पर सड़क से संसद तक बोलते हैं, किसान, धान खरीदी, बेरोजगारी, प्रशासनिक मनमानी पर मुखर हैं,सत्ता को यह एहसास दिलाते हैं कि विपक्ष अभी जिंदा है, और बाकी कांग्रेस कहा? यहीं से असली सवाल शुरू होता है,जहां एक नेता जांच एजेंसियों के निशाने पर है व्यक्तिगत, राजनीतिक और पारिवारिक दबाव झेल रहा है,फिर भी सत्ता से टकरा रहा है,वहीं दूसरी ओर दर्जनों पूर्व मंत्री, संगठन के बड़े चेहरे, सत्ता में रहते समय ‘क्रांतिकारी’ दिखने वाले नेता आज या तो मौन हैं, या फिर सत्ता के साथ ‘समंजस्य’ बैठाकर अपने-अपने व्यापार, ठेके और हितों में व्यस्त हैं…ना आंदोलन…ना रणनीति…ना सड़क…ना सदन…ऐसे में सवाल उठता है क्या कांग्रेस में विपक्ष की जिम्मेदारी सिर्फ एक व्यक्ति पर छोड़ दी गई है?
क्या विपक्ष का मतलब अब सिर्फ सत्ता का इंतजार है?
लोकतंत्र में विपक्ष का काम सिर्फ चुनाव का इंतजार करना नहीं होता,विपक्ष का काम होता है सत्ता को असहज करना,गलत नीतियों पर रोक लगाना,जनता की आवाज बनना और जोखिम उठाना अगर विपक्ष सिर्फ यह सोच ले कि जब सत्ता आएगी, तब देखेंगे,तो यह राजनीति नहीं, स्वार्थ की साझेदारी कहलाती है।
भूपेश बनाम “साइलेंट कांग्रेस” — तुलना तालिका
| मुद्दा | भूपेश बघेल | साइलेंट कांग्रेस |
| सत्ता में रहते समय | आक्रामक, सड़क–सदन दोनों में सक्रिय | सत्ता का सुख, संगठन गौण |
| सत्ता जाने के बाद | खुला विरोध, निरंतर बयान | खामोशी, रणनीतिक मौन |
| जांच/एजेंसी दबाव | ED–CBI–पुलिस का सामना | लगभग शून्य |
| व्यक्तिगत नुकसान | बेटा जेल, राजनीतिक हमला | सुरक्षित, अप्रभावित |
| सरकार की नीतियों पर रुख | सीधा, तीखा, सार्वजनिक | अस्पष्ट या अनुपस्थित |
| किसान–आदिवासी मुद्दे | नियमित हस्तक्षेप | प्रतीकात्मक बयान |
| विपक्ष की भूमिका | फ्रंटफ़ुट पर | बैकफ़ुट पर |
| राजनीतिक जोखिम | सबसे अधिक | लगभग नहीं |
| लक्ष्य | सत्ता को जवाबदेह बनाना | “सही समय का इंतज़ार” |
| जनसंघर्ष | निरंतर | नाममात्र |
एक नज़र भूपेश बघेल के राजनीतिक जीवन पर- भूपेश बघेल का राजनीतिक सफ़र छत्तीसगढ़ की राजनीति में संघर्ष,संगठन और सत्ता—तीनों का प्रतिनिधित्व करता है। छात्र राजनीति से शुरू होकर वे प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक पहुँचे और आज भी कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। उनका करियर केवल पदों की सूची नहीं, बल्कि विपक्ष में जूझने और सत्ता में निर्णय लेने की कहानी है।
सरकारी एवं संवैधानिक पद
मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़ : दिसंबर 2018 – दिसंबर 2023 छत्तीसगढ़ के तीसरे मुख्यमंत्री,इस कार्यकाल में उन्होंने किसान केंद्रित योजनाओं,ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक हस्तक्षेप के लिए पहचान बनाई।
कैबिनेट मंत्री,छत्तीसगढ़ शासन (2000): राज्य गठन के बाद पहली सरकार (अजीत जोगी मंत्रिमंडल) में-
– राजस्व मंत्री
– लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री
– पुनर्वास मंत्री
कैबिनेट मंत्री, अविभाजित मध्य प्रदेश (1999) दिग्विजय सिंह सरकार में परिवहन मंत्री
राज्य मंत्री, अविभाजित मध्य प्रदेश (1998)
– मुख्यमंत्री से संबद्ध राज्य मंत्री
– जन शिकायत निवारण विभाग (स्वतंत्र प्रभार)
विधायक,पाटन विधानसभाः 1993, 1998, 2003, 2013, 2018 और 2023 छह बार जनता का भरोसा जीतना, उनकी जमीनी पकड़ का प्रमाण है।
विपक्ष के उपनेता, छत्तीसगढ़ विधानसभा : 2003 – 2008 भाजपा के 15 वर्षीय शासनकाल में सत्ता के विरुद्ध सबसे मुखर आवाज़ों में एक।
संगठनात्मक भूमिकाएँ : अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी
2014 – 2019, उनके नेतृत्व में कांग्रेस ने 15 साल बाद छत्तीसगढ़ में सत्ता में वापसी की—यह उनकी सबसे बड़ी संगठनात्मक उपलब्धि मानी जाती है।
राष्ट्रीय महासचिव, अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी
वर्तमान में पंजाब राज्य के प्रभारी
जिला अध्यक्ष, युवा कांग्रेस (दुर्ग)
1990 – 1994
उपाध्यक्ष, मध्य प्रदेश युवा कांग्रेस
1994 – 1995
अन्य महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ : निदेशक, मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड
1993 – 2001
सदस्य, मध्य प्रदेश लोक लेखा समिति सहित अन्य संसदीय समितियाँ
अंतिम बात (जो शायद चुभे)- लोकतंत्र में सत्ता को सबसे ज़्यादा डर उस विपक्ष से लगता है जो चुप नहीं रहता, आज छत्तीसगढ़ में अगर सत्ता असहज है, तो उसकी वजह कोई संगठन नहीं, कोई सामूहिक रणनीति नहीं सिफऱ् एक व्यक्ति की आवाज़ है, और अगर इतिहास ने कुछ सिखाया है, तो वह यह कि सत्ता कभी ‘साइलेंट नेताओं’ से नहीं बदलती, सत्ता बदलती है उन लोगों से जो मुश्किल में भी बोलने की हिम्मत रखते हैं, चाहें कांग्रेस समझे या न समझे भूपेश बघेल आज विपक्ष नहीं, विपक्ष की आखिरी रेखा बनते जा रहे हैं…
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