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कोरिया/अंबिकापुर@ फर्जी प्रमाण-पत्र,शासकीय नौकरी और सिस्टम की चुप्पी

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फर्जी दस्तावेजों से वन विभाग में नौकरी का आरोप…
कोरिया वनमंडल बैकुंठपुर में पदस्थ कर्मचारी के खिलाफ जांच के निर्देश…
अगर आरोप सही हैं,तो यह केवल एक व्यक्ति नहीं-पूरे तंत्र की विफलता है…
-न्यूज डेस्क-
कोरिया/अंबिकापुर,19 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)।
कोरिया वनमंडल बैकुंठपुर अंतर्गत उपवन क्षेत्रपाल के पद पर कार्यरत शमीम शाह उर्फ आजम अली मोहम्मद के विरुद्ध फर्जी दस्तावेजों के आधार पर शासकीय नौकरी प्राप्त करने का गंभीर मामला सामने आया है, इस संबंध में प्रधान मुख्य वन संरक्षक, छत्तीसगढ़ के कार्यालय से औपचारिक पत्र जारी कर मुख्य वन संरक्षक,सरगुजा वृत्त (अंबिकापुर) को नियमानुसार जांच कर कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
छत्तीसगढ़ में शासकीय नौकरी केवल रोजगार नहीं, विश्वास और संविधानिक जिम्मेदारी का विषय है, लेकिन जब सरकारी दस्तावेजों में यह सवाल उठे कि कोई कर्मचारी फर्जी शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों के सहारे विभाग में दाखिल हुआ,तो मामला केवल एक नौकरी तक सीमित नहीं रहता वह पूरे सिस्टम की साख पर चोट करता है, कोरिया वनमंडल बैकुंठपुर में पदस्थ शमीम शाह उर्फ आजम अली मोहम्मद को लेकर जो दस्तावेज सामने आए हैं, वे गंभीर सवाल खड़े करते हैं, आरोप है कि 1982 की पूर्व माध्यमिक परीक्षा के प्रमाण-पत्र में कूट रचना कर,अपने भाई के दस्तावेजों का उपयोग कर शासकीय सेवा प्राप्त की गई। यदि यह सही है, तो यह सीधा-सीधा धोखाधड़ी, जालसाजी और सरकारी तंत्र को गुमराह करने का मामला है।
सबसे बड़ा सवालः
सिस्टम सोता कैसे रहा?

यह प्रकरण केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि नियुक्ति के समय प्रमाण-पत्रों का सत्यापन किसने किया? सेवा के वर्षों में किस स्तर पर आंखें मूंदी गईं? क्या यह लापरवाही थी या संरक्षण का खेल? अगर 1982 के प्रमाण-पत्र में नाम,कटिंग और ओवरराइटिंग जैसी बातें दस्तावेजों में स्पष्ट दिखती हैं, तो फिर वर्षों तक यह व्यक्ति सेवा में कैसे बना रहा?
अब कार्रवाई हुई,लेकिन क्यों इतने साल बाद?
चौंकाने वाली बात यह भी है कि शिकायत अब नहीं,बल्कि पहले भी अलग-अलग स्तरों पर की गई,जिला शिक्षा अधिकारी से लेकर वन विभाग के उच्च अधिकारियों तक पत्राचार के प्रमाण मौजूद हैं,फिर भी कार्रवाई तब शुरू होती है,जब मामला प्रधान मुख्य वन संरक्षक (सतर्कता/शिकायत) के स्तर तक पहुंचता है,यह सवाल उठना लाजमी है क्या बिना सार्वजनिक दबाव के ऐसे मामलों में सिस्टम स्वतः हरकत में आता है? धाराएं लिखना काफी नहीं, अमल जरूरी है पत्र में जिन धाराओं 319, 323, 338, 339, 340 का उल्लेख है,वे मामूली नहीं हैं। ये धाराएं सीधे कूट रचना, छल और धोखाधड़ी से जुड़ी हैं,लेकिन छत्तीसगढ़ का अनुभव बताता है कि अक्सर धाराएं लिख दी जाती हैं,पर कार्रवाई फाइलों में दम तोड़ देती है,अब जब 15 दिन में जांच रिपोर्ट मांगी गई है, तो असली परीक्षा यहीं से शुरू होती है,अगर आरोप सही निकले, तो क्या होगा? अगर जांच में यह सिद्ध होता है कि फर्जी दस्तावेजों से नौकरी ली गई और वर्षों तक उसी आधार पर वेतन व पद का लाभ लिया गया तो फिर सवाल उठेगा क्या सिर्फ विभागीय कार्रवाई होगी? या आपराधिक प्रकरण, सेवा से बर्खास्तगी और वसूली भी होगी? और सबसे अहम जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी,जिन्होंने सत्यापन किया?
यह एक व्यक्ति नहीं,नजीर बने मामला होना चाहिए : छत्तीसगढ़ में हजारों युवा योग्यता के बावजूद नौकरी से वंचित हैं। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति फर्जी दस्तावेजों से सिस्टम में घुसा हो, तो यह ईमानदार अभ्यर्थियों के साथ सीधा अन्याय है, यह मामला अगर सही दिशा में निष्कर्ष तक पहुंचता है, तो यह केवल एक कर्मचारी की जांच नहीं, बल्कि पूरे नियुक्ति तंत्र की शुद्धि की शुरुआत बन सकता है।
अब निगाहें जांच पर : अब गेंद प्रशासन के पाले में है, जांच केवल औपचारिकता बनी, तो यह फाइल भी सैकड़ों अन्य फाइलों की तरह दफन हो जाएगी, लेकिन यदि निष्पक्ष कार्रवाई हुई, तो यह संदेश जाएगा कि शासकीय नौकरी अब फर्जी कागजों से नहीं, जवाबदेही से चलेगी।
क्या है पूरा मामला
दस्तावेजों के अनुसार,आरोप है कि संबंधित कर्मचारी ने पूर्व माध्यमिक परीक्षा वर्ष 1982 के प्रमाण-पत्र में कूट रचना (कटिंग/ओवरराइटिंग) कर अपने भाई के शैक्षणिक दस्तावेजों का दुरुपयोग किया और उसी आधार पर वन विभाग में नौकरी प्राप्त की, शिकायत में कहा गया है कि वास्तविक अभ्यर्थी का नाम बदलकर दस्तावेजों में हेरफेर किया गया।
आईपीसी की गंभीर धाराओं का उल्लेख
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (सतर्कता/शिकायत) कार्यालय द्वारा जारी पत्र में आरोपों को भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 319, 323, 338, 339, 340 के अंतर्गत दंडनीय अपराध की श्रेणी में माना गया है, पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाते हैं तो आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जा सकता है।
15 दिन में जांच रिपोर्ट अनिवार्य
जारी आदेश के अनुसार, मुख्य वन संरक्षक, सरगुजा वृत्त को निर्देशित किया गया है कि शिकायत में उल्लिखित सभी तथ्यों की नियमित विभागीय जांच कराई जाए,जांच के पश्चात स्पष्ट अभिमत सहित रिपोर्ट 15 दिनों के भीतर प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय को प्रस्तुत की जाए।
शिकायतकर्ता और पूर्व पत्राचार
मामले की शुरुआत अंबिकापुर नगर निगम पार्षद व वरिष्ठ भाजपा नेता अलोक दुबे द्वारा की गई शिकायत से हुई,जिसमें उन्होंने शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों की सत्यता पर सवाल उठाए,इससे पूर्व भी इस विषय में जिला शिक्षा अधिकारी,अंबिकापुर द्वारा शैक्षणिक अभिलेखों की जांच से संबंधित पत्राचार और दस्तावेज संलग्न पाए गए हैं, जिनका उल्लेख फाइल में किया गया है।
अब सबकी निगाहें जांच पर…
यह मामला सामने आने के बाद वन विभाग में हलचल मची हुई है,अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं या नहीं,और यदि सही पाए जाते हैं तो विभागीय एवं आपराधिक स्तर पर क्या कार्रवाई होती है,यह समाचार दस्तावेजों में दर्ज शिकायत, पत्र और आदेशों पर आधारित है, संबंधित अधिकारी/कर्मचारी का पक्ष जांच पूर्ण होने तक लंबित है।


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