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कोरिया@भाजपा कार्यालय घेरने निकली कांग्रेस, मलबे को घेरकर लौटी

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  • कोरिया में विरोध नहीं,संगठनात्मक भटकाव का प्रदर्शन
  • जिस कार्यालय का घेराव घोषित,वह मिला ही नहीं कांग्रेस को
  • भाजपा कार्यालय समझकर कांग्रेस ने घेरा…टूटा भवन
  • प्रशासन असली कार्यालय पर बैरिकेडिंग करता रहा
  • मलबे पर नारे, सोशल मीडिया पर मज़ाक
  • मुद्दा मनरेगा का, चर्चा कांग्रेस की चूक की
  • विरोध की राजनीति में पता ही गुम, कांग्रेस घेर आई मिट्टी-ईंट

-रवि सिंह-
कोरिया,18 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)।
मनरेगा के नाम पर केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने का दावा करने वाली कांग्रेस कोरिया में खुद अपने ही ऐलान का रास्ता भूल बैठी,प्रदेश कांग्रेस के आवाहन पर भाजपा कार्यालय घेराव की घोषणा तो बड़े जोश-खरोश से की गई,लेकिन हकीकत में जो हुआ,उसने कांग्रेस संगठन की तैयारियों की पोल खोल दी,जिस भाजपा कार्यालय के घेराव का ऐलान किया गया था,कांग्रेस कार्यकर्ता वहां पहुंचे ही नहीं,घेराव हुआ टूटे हुए भाजपा कार्यालय के मलबे,ईंटों और मिट्टी का।
बता दे कोरिया की राजनीति में गुरुवार को एक नया अध्याय जुड़ गया घेराव विदाउट ऑफिस,कांग्रेस ने बड़े आत्मविश्वास से ऐलान किया भाजपा कार्यालय का घेराव होगा,प्रशासन ने भी भरोसा किया,बैरिकेड लगाए,पुलिस तैनात की, अफसर धूप में खड़े हो गए,लेकिन कांग्रेस ने सबको चौंकाते हुए कार्यालय को छोड़ मलबे को चुन लिया,अब सवाल यह नहीं कि मनरेगा से गांधी जी का नाम हटेगा या नहीं,सवाल यह है कि कांग्रेस का गूगल मैप अपडेट है या नहीं? जहां भाजपा का अस्थायी कार्यालय चालू था,वहां पुलिस इंतजार करती रही,और जहां भाजपा का कार्यालय कभी था, वहां कांग्रेस घेराव करती रही, शायद यह नया राजनीतिक प्रयोग था प्रतीकात्मक विरोधः कार्यालय न सही,उसकी यादें तो हैं,ईंटें थीं,मिट्टी थी,मलबा था बस भाजपा नहीं थी, घेराव की परिभाषा भी बदल गई,अब विरोध सत्ता से नहीं,खाली जमीन से होता है,कहा जाता है राजनीति में दूरदर्शिता चाहिए,पर यहां तो दिशा ज्ञान ही लापता निकला,अगर अगली बार कांग्रेस दिल्ली का घेराव घोषित करे,तो कहीं ऐसा न हो कि जंतर-मंतर छोड़कर किसी बंद पड़े स्मारक पर धरना दे बैठे, क्योंकि कोरिया ने यह सिखा दिया है तैयारी नहीं हो, तो विरोध भी मलबा बन जाता है।

घेराव नहीं,राजनीतिक भटकाव
कांग्रेस जिला अध्यक्ष (जिन्हें यथावत जिला अध्यक्ष कहा जाता है) के नेतृत्व में कांग्रेसी राजीव भवन से निकले,सूचना सार्वजनिक थी,समय तय था, स्थान तय था,प्रशासन ने भी उसी सूचना के आधार पर कॉलेज के सामने बैरिकेडिंग कर ली थी,पुलिस बल तैनात था,अधिकारी मुस्तैद थे,लेकिन कांग्रेस का जुलूस उस स्थान पर गया ही नहीं,वह पहुंच गया उस जगह,जहां भाजपा कार्यालय पहले था,अब नहीं है,जहां सिर्फ मलबा पड़ा है,और वहीं खड़े होकर नारे लगाए गए,प्रदर्शन किया गया और घेराव की औपचारिकता निभा दी गई।
प्रशासन तैयार,कांग्रेस भ्रमित
एक तरफ प्रशासन वास्तविक भाजपा कार्यालय के सामने घेराव की आशंका में घंटों इंतजार करता रहा,दूसरी तरफ कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता ऐसी जगह प्रदर्शन करते रहे,जहां न कार्यालय था,न ताला,न झंडा सिर्फ ध्वस्त ढांचा,नतीजा यह हुआ कि प्रशासन की रणनीति बेकार गई, कांग्रेस का विरोध हास्यास्पद बन गया और पूरा जिला एक सवाल पूछने लगा इतनी बड़ी पार्टी को अपने ही जिले में भाजपा कार्यालय का पता तक नहीं?
मुद्दा मनरेगा का था, चर्चा मलबे की हो गई
मनरेगा और महात्मा गांधी का नाम कोई हल्का विषय नहीं है,यह ग्रामीण रोजगार,संविधान और सामाजिक न्याय से जुड़ा सवाल है,लेकिन कोरिया में कांग्रेस इस मुद्दे को उठाने के बजाय अपनी अयोग्यता और अव्यवस्था को केंद्र में ले आई,आज चर्चा यह नहीं है कि मनरेगा पर केंद्र सरकार क्या कर रही है,बल्कि यह है कि कांग्रेस ने कार्यालय नहीं, मलबा घेर लिया।
जब विरोध दिशा खो दे तो राजनीति तमाशा बन जाती है…
घेराव राजनीति का गंभीर औजार होता है यह सत्ता को चुनौती देने का प्रतीक है,संगठन की ताकत दिखाने का माध्यम है, लेकिन कोरिया में कांग्रेस ने साबित कर दिया कि बिना तैयारी का विरोध, विरोध नहीं—मजाक बन जाता है, जिस पार्टी को जिले की राजनीति संभालनी है, जिसे सरकार को घेरने का दावा है,अगर उसे यह भी नहीं पता कि विपक्षी पार्टी का कार्यालय कहां है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है क्या संगठन ज़मीन से कट चुका है? क्या फैसले सिर्फ कागज़ों में हो रहे हैं? क्या नेतृत्व सिर्फ घोषणा तक सीमित रह गया है? मलबे का घेराव सिर्फ एक घटना नहीं है, यह कांग्रेस की जमीनी पकड़ के टूटने का प्रतीक है, राजनीति में नारा काफी नहीं होता, पता भी होना चाहिए, वरना विरोध भी उसी मलबे में दब जाता है, जिसे घेरने आप खुद पहुंच जाएं।


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