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कोरिया/एमसीबी@राजनीति में नई परंपराः भीड़ से अलग ‘अपनी पहचान’ की तलाश

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  • राजनीति का बदलता स्वरूप…हर कार्यकर्ता अब अपनी अलग पहचान गढ़ने में जुटा
  • पार्टी कार्यक्रम हो या बड़े नेताओं का दौरा…स्वागत में भी दिख रही ‘व्यक्तिगत ब्रांडिंग’ की होड़…
  • भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के कोरिया आगमन पर भी दिखा नया चलन…कुछ कार्यकर्ता अलग खड़े होकर करते दिखे स्वागत
  • जिलाध्यक्ष के नेतृत्व वाले सामूहिक आयोजन से कुछ कार्यकर्ताओं ने बनाई दूरी, प्रदेश अध्यक्ष का अलग से
  • स्वागत कर दर्ज कराई ‘अपनी पहचान’

-रवि सिंह-
कोरिया/एमसीबी,30 नवंबर 2025 (घटती-घटना)। राजनीति का स्वरूप बदला है,अब दल,संगठन और सामूहिक अनुशासन पीछे छूट रहे हैं,और आगे बढ़ रही है व्यक्तिगत पहचान,व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और बड़े नेताओं तक सीधे पहुँच की चाहत,कोरिया जिले में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के आगमन के दौरान इसका सबसे साफ़ दृश्य सामने आया,जब संगठन के सामूहिक स्वागत कार्यक्रम के समानांतर कुछ कार्यकर्ताओं ने अपनी पहचान दर्ज कराने के लिए अलग से स्वागत आयोजन कर डाला,राजनीति में अब अनुशासन कहने की बात मात्र रह गई है,राजनीति में नई परंपरा की शुरुआत हुई है और वह है व्यक्तिगत पहचान की,व्यतिगत महत्वाकांक्षा सभी की अपनी इतनी हावी है कि हर कोई खुद की अलग पहचान और पार्टी में भी खुद के अलग स्थान के लिए प्रयासरत है और अब माध्यम के सहारे कोई नहीं रहना चाहता हर कोई व्यतिगत ही आगे की राजनीतिक राह तय करना चाहता है,भाजपा जैसे राष्ट्रीय राजनीतिक दल में भी अब अनुशासन केवल कहने की बात रह गई है और भाजपा में भी अब व्यक्तिगत महत्वकांक्षा और व्यक्तिगत पहचान और व्यक्तिगत स्थान के लिए प्रयास नजर आने लगा है,ऐसा ही मामला कोरिया जिले में भी देखने को मिला जब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष कोरिया जिले से गुजरने वाले थे और जिलाध्यक्ष भाजपा के नेतृत्व में पार्टी ने उनके स्वागत की भव्य तैयारी की थी और जिलेभर के भाजपाइयों का आह्वान किया था,एक तरफ भाजपा जिलाध्यक्ष का प्रदेश अध्यक्ष के सामूहिक स्वागत का आह्वान था एक तरफ व्यक्तिगत पहचान की तलाश थी,खुद के लिए स्थान की दरकार थी,भाजपा जिलाध्यक्ष ने जहां खरवत चौक में सामूहिक स्वागत का इंतजाम किया था वहीं एक गुट 10 लोगों का अलग से खरवत चौक से पहले खड़ा था,प्रदेश अध्यक्ष कोरिया जिले में प्रवेश किए और उन्होंने पहले 10 लोगों के स्वागत को रुककर स्वीकार किया और फिर आगे बढ़कर वह भाजपा जिलाध्यक्ष के द्वारा स्वागत लिए निर्धारित जगह पर पहुंचे और वहां उनका सैकड़ों भाजपाइयों ने स्वागत किया,कुल मिलाकर एक तरफ सैकड़ों की भीड़ थी इसलिए भी 10 लोगों ने प्रदेश अध्यक्ष को सैकड़ों की भीड़ से पहले रोका और स्वागत किया जिससे प्रदेश अध्यक्ष से उनकी मुलाक¸ात ऐसी मुलाकात साबित हो जहां वह अपनी पहचान बता सकें और उनके स्मरण में वह स्थान बना सकें,वैसे देखा जाए तो जिन्होंने प्रदेश अध्यक्ष का स्वागत पहले किया उन्होंने इसलिए भी ऐसा किया क्योंकि सैकड़ों की भीड़ में वह व्यक्तिगत परिचय से प्रदेश अध्यक्ष को अवगत नहीं करा पाते और भीड़ में केवल वह फुल गुलदस्ता देकर ही स्वागत कर पाते,अलग से स्वागत के दौरान उन्हें अपनी बातें खुलकर सामने रखने का मौका मिला होगा और इस दौरान नेतृत्व की कोई रोक टोक नहीं रही होगी जो उनके लिए सहजता का विषय रहा होगा।
राजनीति का नया रोग…व्यक्तिगत पहचान की भूख
भारतीय राजनीति हमेशा से सामूहिक सोच,संगठनात्मक अनुशासन और साझा नेतृत्व की नींव पर खड़ी मानी गई है,लेकिन पिछले कुछ वर्षों में राजनीति का चरित्र बदला है,और इतना बदला है कि अब यह बदलाव एक नए राजनीतिक रोग की तरह फैलता दिखाई दे रहा है,यह रोग है, व्यक्तिगत पहचान की भूख,पहले नेता भीड़ को संगठित करते थे,आज भीड़ के बीच अपनी अलग पहचान बनाए रखने की होड़ चल रही है। पहले दल तय करता था कि कौन कहाँ खड़ा होगा, कौन स्वागत करेगा, कौन भाषण देगा। आज हर व्यक्ति चाहता है कि नेता पहले उसे पहचाने, उसी की ओर देखे,और उसी को याद रखे।
नेता तक पहुँचने का शॉर्टकट…. भीड़ से अलग खड़े हो जाओ…
किसी बड़े नेता का दौरा हो,किसी पार्टी कार्यक्रम में भीड़ जुटे…अब तस्वीरें साफ दिखाई देती हैं, एक तरफ संगठन की भीड़ दूसरी तरफ 10-12 लोगों का छोटा समूह जो अलग से गाड़ी रोककर स्वागत करता है, इसी छोटे समूह का मकसद होता है बड़ा नेता मेरा चेहरा पहचान ले, यह कोई साधारण फोटो-ऑपरेशन नहीं है,बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान गढ़ने का नया फॉर्मूला बन चुका है, पार्टी का सामूहिक आह्वान अब केवल औपचारिकता रह गया है,जबकि असल राजनीतिक महत्वाकांक्षा अपनी स्वतंत्र जगह बनाना चाहती है।
कांग्रेस से भाजपा तक…गुट नहीं, ‘ब्रांड मैं’ का दौर
जिस परंपरा को कभी कांग्रेस की गुटबाजी कहा जाता था,आज वह भाजपा सहित हर दल में एक आम तस्वीर बन चुकी है, यह अब गुटबाजी नहीं है,यह है…व्यक्तिगत ब्रांड निर्माण की राजनीति हर कार्यकर्ता अपनी फोटो,अपना स्वागत,अपना गुलदस्ता,अपनी पहचान चाहता है, और नेता भीड़ में पहचान नहीं पाता…यह नई मानसिकता का ईंधन बन चुकी है।
युवाओं में सबसे तेज़…भीड़ नहीं बनेंगे, भीड़ के नेता बनेंगे
आज राजनीति युवाओं का पसंदीदा करियर है,लेकिन युवा अब विचारधारा से नहीं,पहचान से राजनीति शुरू करते हैं,उन्हें लगता है कि विधायक उन्हें पहचानें, मंत्री उन्हें पहचानें, प्रदेश अध्यक्ष उन्हें पहचानें, पहचान न मिली तो वे अलग खड़े हो जाएंगे, अलग आयोजन कर देंगे अलग स्वागत कर देंगे, इस मानसिकता ने राजनीति की पूरी संरचना को हिला दिया है।
संगठन का अनुशासन बनाम व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा
राजनीति में सामूहिकता एक ताकत है,व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा भी जरूरी है,लेकिन जब महत्वाकांक्षा संगठन पर हावी होने लगे,जब हर यात्रा पर दो-दो स्वागत हों,जब हर कार्यक्रम दो हिस्सों में बँट जाए,तो समझ लीजिए कि संगठन की शक्ति समाप्त होने लगी है और व्यक्तिगत पहचान का रोग गहराता जा रहा है, यह रोग भाजपा जैसी अनुशासित पार्टी के लिए भी एक चेतावनी है।
अब यह चलन कहाँ रुकेगा?
राजनीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां यह सवाल सबसे बड़ा है क्या राजनीतिक पहचान भीड़ में रहकर नहीं बनाई जा सकती? क्या संगठन की ताकत व्यक्तिगत आकांक्षाओं के आगे झुकती जाएगी? क्या हर नेता के दौरे पर अब दो-दो मंच बनेंगे? अगर यह चलन नहीं रुका, तो आने वाले समय में पार्टी कार्यक्रम नहीं होंगे, व्यक्तिगत स्वागत-सभा होंगी।
राजनीति में ‘मैं’ का उभार, ‘हम’ को कमजोर कर रहा है
व्यक्तिगत पहचान की भूख एक छोटे स्वार्थ से शुरू होती है लेकिन संगठन को अंदर से खोखला करने तक पहुँच जाती है, राजनीति ‘हम’ से चलती है, लेकिन आज का चलन ‘मैं’ की परिक्रमा कर रहा है, यह रोग फैलेगा तो संगठन टूटेंगे, अनुशासन समाप्त होगा, और राजनीति व्यक्तिगत ब्रांडिंग के बाजार में बदल जाएगी, यह समय है दल, संगठन और नेतृत्व को इस नई राजनीतिक बीमारी को पहचानने और रोकने का, वरना राजनीति का भविष्य सिर्फ एक शब्द में सिमट जाएगा…”मैं”।
पहले अलग स्वागत,फिर मुख्य आयोजन
जिलाध्यक्ष भाजपा के नेतृत्व में खरवत चौक पर भव्य स्वागत की तैयारी थी। परंतु उससे ठीक पहले, करीब 10 लोगों का अलग समूह प्रदेश अध्यक्ष के वाहन को रोककर उनका स्वागत करने खड़ा दिखाई दिया, प्रदेश अध्यक्ष ने पहले इन्हीं 10 लोगों का स्वागत स्वीकार किया, फिर आगे बढ़कर भाजपाइयों की बड़ी भीड़ वाले मुख्य कार्यक्रम में पहुंचे, दो स्वागत दो संदेश, संगठन का सामूहिक कार्यक्रम, व्यक्तिगत पहचान का समानांतर आयोजन यही वह बदलता राजनीतिक चलन है, जिसने अब भाजपा को भी अपनी चपेट में ले लिया है।
सैकड़ों की भीड़ में पहचान खोने का डर…अलग आयोजन में ‘डायरेक्ट कनेक्ट’-
विश्लेषक इसे एक साधारण गुटबाज़ी नहीं मानते। यह रणनीतिक कदम है, भीड़ में फूल देकर फोटो खिंचाना आसान है, पर व्यक्तिगत परिचय वहां संभव नहीं, अलग मंच पर प्रदेश अध्यक्ष से अपनी बात कहने,अपना परिचय देने, अपनी राजनीतिक भूमिका बताने का मौका सहजता से मिल जाता है, असल में, यह “नेता मुझे पहचाने” वाली महत्वाकांक्षा का आधुनिक सूत्र है।
परंपरा कांग्रेस से शुरू…अब भाजपा में भी वही मॉडल
इस प्रवृत्ति का बीज कांग्रेस शासनकाल में पड़ा था, जहाँ बड़े नेताओं के दौरे पर अलग-अलग स्वागत…अलग-अलग गुट…अलग-अलग मंच आम बात थी, अब भाजपा में भी वही परंपरा दिख रही है, यह सिर्फ गुटबाजी नहीं, बल्कि स्वतंत्र राजनीतिक पहचान गढ़ने का नया फॉर्मूला है।
युवा राजनीति में ‘सीधी पहचान’ की भूख
आज राजनीति युवाओं का सबसे पसंदीदा कैरियर बन चुका है, युवा अब भीड़ का हिस्सा नहीं, भीड़ का नेतृत्व बनना चाहते हैं, उन्हें लगता है कि मुख्यमंत्री हो, मंत्री हों या संगठन के बड़े नेता…सबको उनका चेहरा, उनका नाम याद रहना चाहिए, यह मनोविज्ञान उन्हें संगठनात्मक आह्वान से हटकर अलग आयोजन करने की तरफ धकेल रहा है, कोरिया का यह ताज़ा उदाहरण उसी मानसिकता का परिणाम है।
सवाल बड़ा है: यह चलन कहाँ जाकर रुकेगा?- भाजपा को हमेशा अनुशासन की मिसाल माना जाता रहा है, लेकिन अलग-अलग स्वागत, अलग अलग मंच, अलग-अलग पहचान वाले आयोजन पार्टी के सामूहिक ढांचे के लिए खतरा बनते जा रहे हैं, राजनीति में यह नई परंपरा कितनी आगे जाएगी, यह संगठन खुद भी अब नहीं कह सकता।
भीड़ में नेता नहीं पहचानते…इसलिए टुकड़ों में स्वागत का चलन बढ़ा
प्रदेश अध्यक्ष के इस दौरे ने एक बात बिल्कुल साफ कर दी अब राजनीतिक स्वागत सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत ब्रांडिंग का हथियार बन चुका है, जिलाध्यक्ष के सामूहिक कार्यक्रम से अलग 10 लोगों का अलग आयोजन इस बात का संकेत है कि नेता की नज़र में अपनी जगह बनाना, अब युवा राजनीति की सबसे बड़ी प्राथमिकता है, और यही वजह है कि आगे भी बड़े नेताओं के आगमन पर संगठनात्मक मंच अलग और व्यक्तिगत पहचान वाले छोटे-छोटे मंच नज़र आते रहेंगे।


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