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कोरिया@26 साल की सेवा पर पीछे छूट गई अनियमितताओं की भारी फाइल

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-रवि सिंह-
कोरिया,18 नवंबर 2025 (घटती-घटना)। जिले के अग्रणी और प्रतिष्ठित शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय में 26 वर्षों तक प्रभारी प्राचार्य रहे डॉ. अखिलेश चन्द्र गुप्ता के खिलाफ गंभीर वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें आज भी हवा में लटकी हैं, सेवानिवृत्ति के अंतिम महीनों में ही लाखों रुपये की खरीदी, कैशबुक में गड़बडि़यां,स्टॉक में हेराफेरी,फर्जी मजदूरी भुगतान,इन सबका विस्तृत विवरण दस्तावेजों सहित सामने आने के बावजूद कार्रवाई का नाम तक नहीं,सोचने वाली बात यह है कि सेवानिवृत्त होने के बाद भी डॉ. गुप्ता अनाधिकृत रूप से कॉलेज जाकर दस्तावेज जला देते है, और फिर भी विभाग चुप है,क्या यह नियमों का उल्लंघन नहीं? क्या सेवानिवृत्त कर्मचारी को अब भी विभागीय संरक्षण प्राप्त है? सरकारी कॉलेजों में मची वित्तीय अव्यवस्था,करोड़ों की खरीदी, फर्जी मजदूरी भुगतान, बिना हस्ताक्षर की कैशबुक,पत्नी को लाभ,बैकडेट एंट्री,और अनगिनत गड़बडि़यों की शिकायत राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री,मुख्य सचिव, आयुक्त,सचिव से लेकर कलेक्टर तक सभी बड़े अधिकारियों को भेजी गई लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि किसी एक भी संस्था ने आज तक न जांच शुरू की,न कार्रवाई ही किसे ने की,इतना ही नहीं, जिस अधिकारी पर गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप थे,उनके जीपीएफ भुगतान को भी बिना जांच पूर्ण करा दिया गया, शिकायतकर्ता ने इसे प्रशासनिक मिलीभगत बताया है।
बता दे की डॉ. अखिलेश्वर चंद गुप्ता के जीपीएफ खाते (सीईडी/310653) का अंतिम भुगतान रोके जाने को लेकर की गई शिकायत पर अब लेखा एवं सहकारी विभाग,महासमुंद ने अपना स्पष्ट पक्ष रखते हुए कहा है कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। विभाग ने पत्र जारी कर साफ लिखा है कि आवेदक द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर कोई कार्रवाई करना उनके अधिकार में नहीं आता, पत्र संख्या मि.नि./विधि/ 04/1987, दिनांक 7/11/25 में विभाग ने आवेदक द्वारा भेजे गए पत्र का जवाब देते हुए कहा।
दैनिक घटती घटना की खबरें, धारदार, दस्तावेज़ आधारित पर असर अब शून्य
दैनिक घटती घटना ने इस मामले पर लगातार रिपोर्टिंग की, फाइलों के तथ्य, आरटीआई से मिली जानकारी, कैशबुक के पन्ने, खरीदी के बिल, मजदूरी के भुगतान, स्टॉक एंट्री का विश्लेषण, सब कुछ प्रिंट किया लेकिन अंत परिणाम? सच की कोई सुनवाई नहीं, जब सरकार के पास वाले विभाग की सच्चाई भी असर न करे, तो ये सवाल उठना लाजमी है क्या अब इस सरकार में सच छापने से भी कुछ नहीं होने वाला?
विभाग मुख्यमंत्री के पास…पर कार्रवाई कहीं नहीं!
उच्च शिक्षा विभाग मुख्यमंत्री के पास है,फिर भी इस विभाग से जुड़ी शिकायतें वर्षों से लंबित हैं,इस मामले में कोई न जांच समिति बनी, न रिपोर्ट आई, न जवाबदेही तय हुई, क्या मुख्यमंत्री के विभाग पर भी अब किसी की पकड़ है? या फिर शिकायतें फाइलों में दबाना ही नया सिस्टम बन गया है?
प्रश्न उठता है…फिर इतना संरक्षण कहां से मिल रहा है?
दस्तावेजों में साफ-साफ वित्तीय गड़बडि़यों दर्ज,चार साल से कैशबुक में योग नहीं, बिना हस्ताक्षर के कटिंग–पेज कैंसिल, बैक डेट में स्टॉक एंट्री, फर्जी मजदूरी, लाखों का भुगतान पहले अपने खाते में, अंतिम महीने 40 लाख की खरीदी,नए कॉलेजों में मनमानी, पत्नी को अनियमित लाभ इनमें से कोई भी आरोप मामूली नहीं, फिर भी कार्रवाई ठंडे बस्ते में क्यों? क्या ऊपर तक संरक्षण मिलने से ही इतना आत्मविश्वास है? क्योंकि शिकायतकर्ता के अनुसार, डॉ. गुप्ता हमेशा कहते थे हम जो कहते हैं वो करके दिखाते हैं और सच यही है,इस मामले में भी उन्होंने वही कर दिखाया।
महालेखाकार का जवाब अंतिम चोट
महालेखाकार कार्यालय ने हाल ही में जवाब देते हुए साफ लिखा की शिकायत में उठाए गए मुद्दे हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं आते यानी न जांच,न पूछताछ,न कार्रवाई, इसका सीधा मतलब अब इस मामले में किसी कार्रवाई की उम्मीद खत्म,और इसलिए यह इस मामले पर ‘दैनिक घटती घटना’ की अंतिम खबर है,जब सच बोलना बहादुरी बन जाए और सच्चाई छापना बेअसर,जब भ्रष्टाचार करने वाले विजयी हो जाएं और दस्तावेज़ भी किसी को न हिला सकें तो वहाँ पत्रकारिता नहीं, व्यवस्था दोषी होती है,इसलिए यह स्पष्ट किया जा रहा है यह इस मामले में ‘दैनिक घटती-घटना’ की अंतिम खबर है क्योंकि सच का गला एक बार फिर उसी व्यवस्था ने दबा दिया जो आम जनता के पैसों और विश्वास से चलती है।
शिकायत में उल्लिखित बिंदु 1 से 6 इस कार्यालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं
महालेखाकर अधिकारी ने अपने जवाब में कहा है कि शिकायत में उठाए गए मुद्दे इस दफ्तर के अधिकार व कार्य-क्षेत्र में नहीं आते,इसलिए इन बिंदुओं पर किसी भी प्रकार की कार्रवाई संभव नहीं,विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि जीपीएफ अंतिम भुगतान की प्रक्रिया नियमों के अनुसार की जाएगी यानी जिस ‘अनियमितता’ या ‘रोक’ की शिकायत की गई थी, वह सीधे इस कार्यालय से संबंधित ही नहीं है।
नियमों के अनुसार ही होगा अंतिम भुगतान
पत्र के अंतिम भाग में यह उल्लेख है कि “जीपीएफ अंतिम भुगतान प्रकरण का निराकरण जीपीएफ नियमों के अंतर्गत किया जाएगा।” जिसका सीधा मतलब है कि फाइल अब नियमों के अनुसार आगे बढ़ेगी और भुगतान पूरी प्रक्रिया पूरी होने पर ही जारी होगा।
जब सच भी हार जाए… 26 वर्षों की अनियमितताओं पर चुप्पी—क्यों?
कोरिया जिले के सबसे पुराने महाविद्यालय में वर्षों तक चली वित्तीय गड़बडि़यों की शिकायतें आज भी फाइलों में बंद पड़ी हैं, सबसे विचलित करने वाली बात यह है कि सेवानिवृत्ति के अंतिम दिनों में लाखों की खरीदी, फर्जी मजदूरी, कैशबुक से हेरफेर जैसी गंभीर अनियमितताओं पर कोई कार्रवाई ही नहीं हुई।
सरकार का विभाग…पर जिम्मेदारी कौन लेगा?
उच्च शिक्षा विभाग मुख्यमंत्री के पास है तो क्या मुख्यमंत्री के विभाग में भी अब शिकायतों का यही हश्र होगा? क्योंकि यदि इतने बड़े आरोपों पर भी जांच न हो, तो यह संदेश स्पष्ट है शिकायतें सिर्फ औपचारिकता हैं, न्याय नहीं।
‘सच’ को भी अनसुना करने वाली व्यवस्था
‘दैनिक घटती-घटना’ ने महीनों तक दस्तावेज़ आधारित रिपोर्टिंग की, कैशबुक के पन्नों से लेकर खरीदी के बिल तक,हर सच्चाई सामने रखी, लेकिन सच की कीमत वही शून्य।
प्रश्न यही है—इतना संरक्षण कौन देता है?
जब सेवानिवृत्ति के बाद भी कोई व्यक्ति कॉलेज में जाकर दस्तावेज जला दे, और विभाग चुप रहे, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं यह संरक्षण है, और संरक्षण हमेशा नीचे से नहीं मिलता।
मामले पर कई सवाल भी खड़े हुए…
क्या शिकायत गलत विभाग को भेजी गई थी?
क्या आवेदक को गलत जानकारी दी गई थी?
भुगतान रोकने की वास्तविक वजह क्या है, प्रशासनिक देरी या तकनीकी कारण?


शिकायत में लगाए गए प्रमुख आरोप
दस्तावेज़ों और आरटीआई से मिली सूचनाओं के आधार पर किए गए आरोप इतने गंभीर हैं कि किसी भी विभाग को तत्काल जांच बैठानी चाहिए थी। लेकिन हुआ कुछ नहीं…

  1. 26 साल प्रभारी प्राचार्य,कैशबुक 4 साल तक योग नहीं,पीडी कैशबुक का योग न होना सीधे-सीधे वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है।
  2. कैशबुक में बड़े पैमाने पर कटिंग, कई पेज पूरे कैंसिल और सबसे चौंकाने वाली बात—कहीं भी हस्ताक्षर नहीं! सरकारी रजिस्टर में बिना हस्ताक्षर के सुधार करना गम्भीर अपराध माना जाता है।
  3. नियमों के खिलाफ प्राचार्य खुद कैशबुक लिखते थे जिन्हें लिपिक के प्रभार में होना चाहिए था,वह स्वयं लिखकर सारा नियंत्रण अपने पास रखते थे,ऐसे में त्रुटि के लिए जिम्मेदार कौन?
  4. पत्नी को भी लाभ,20 साल से उसी कॉलेज में पदस्थ,फिर नए कॉलेज पोड़ी बचरा में भी प्रभारी प्राचार्य,शिकायतकर्ता ने इसे “प्रशासनिक संरक्षण” बताया।
  5. क्रीड़ा व लैब सामग्री में लाखों की अनियमितता स्टॉक रजिस्टर और बिल मिलान में कई संदेह।
  6. सेवा निवृत्ति के महीने, जनवरी 2025 में 40 लाख की खरीदी, आखिरी महीने इतनी भारी खरीदी किस अनुमति से?
  7. नए महाविद्यालय शुरू होते ही इन्हें प्रभार और फिर शुरू होता था ‘खरीदी का खेल’,नागपुर,पटना और पोड़ी बचरा कॉलेज जहाँ भवन ही नहीं,मात्र 2–3 कमरे लेकिन लाखों की फर्नीचर, लैब, क्रीड़ा सामग्री की खरीदी।
  8. बैक-डेट में स्टॉक चढ़ाना नियमों का खुला उल्लंघन
  9. मजदूरी—लाखों रुपये निकाल लिए,मस्टर रोल या उपस्थिति रजिस्टर कुछ भी नहीं,सीधा-सीधा फर्जी भुगतान का संकेत।
  10. मजदूरी का पैसा पहले अपने खाते में लेकर, फिर ‘नकद भुगतान’ दिखाया गया,जबकि मनरेगा से लेकर सभी विभागों में मजदूरी का भुगतान सीधा खाते में होता है।
  11. 5,000 से अधिक के भुगतान वेंडर अकाउंट से होने चाहिए, परन्तु 1,50,000 तक अपने खाते से निकाले गए, बिलों पर पावती भी नहीं।
  12. छोटे जिले में असामान्य रूप से अधिक फंड यह भी जांच का विषय
    और इसलिए…यह अंतिम खबर है…
    क्योंकि जब सच बोलना असरहीन हो जाए, और भ्रष्टाचार करने वाले विजयी हो जाएं,तो पत्रकारिता सिर्फ दर्पण दिखा सकती है फैसला व्यवस्था को करना है।

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