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रायपुर/कोरिया@क्या महालेखाकार कार्यालय में भी बढ़ रही है अनियमितता की गंध?

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-रवि सिंह-
रायपुर/कोरिया,13 नवंबर 2025 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में सरकारी लेखा प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं, कोरिया जिले के एक शासकीय महाविद्यालय में वित्तीय अनियमितता की शिकायत लंबित रहने के बावजूद संबंधित अधिकारी को जीपीएफ (भविष्य निधि) राशि जारी किए जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है,इस निर्णय ने महालेखाकार कार्यालय की कार्यप्रणाली को लेकर कई गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं,शिकायतकर्ता द्वारा प्रधानमंत्री कार्यालय तक शिकायत भेजे जाने के बावजूद जांच की गति बेहद धीमी है। विभागीय स्तर पर स्पष्ट रिपोर्ट न आने से अब महालेखाकार कार्यालय की भूमिका पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगे हैं।
बता दे की कोरिया जिला मुख्यालय स्थित शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव अग्रणी महाविद्यालय बैकुंठपुर में वित्तीय अनुशासन और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों में यह सामने आया है कि विगत छह वर्षों से महाविद्यालय की कैशबुक का ऑडिट नहीं हुआ, और कई स्थानों पर एंट्री अधूरी है, हस्ताक्षर गायब है, तथा संख्यात्मक विसंगतियाँ पाई गई थी पर आज तक शिकायत के बाद भी जांच पूरी नहीं हुई।


जांच लंबित होने पर भी भुगतान, क्या यह नियमों के विपरीत है?
वित्तीय नियमों के अनुसार यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध अनियमितता या भ्रष्टाचार की जांच लंबित हो, तो उसकी सेवा से जुड़ी वित्तीय देनदारियों (जैसे जीपीएफ, ग्रेच्युटी या पेंशन) का भुगतान जांच पूर्ण होने तक रोका जाना चाहिए। लेकिन इस मामले में,जांच लंबित रहते हुए भुगतान आदेश जारी किए जाने की जानकारी सामने आने से वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठ रहे हैं।
जनता की मांग,पारदर्शी जांच और जवाबदेही
जनता और स्थानीय नागरिक संगठनों का कहना है कि उच्च शिक्षा विभाग को इस मामले में जल्द से जल्द जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए, ताकि महालेखाकार और शिक्षा विभाग दोनों की विश्वसनीयता बनी रहे, यदि जांच लंबित रहते हुए भुगतान प्रक्रिया पूरी हो जाती है, तो यह वित्तीय प्रशासनिक जवाबदेही पर गहरा प्रश्नचिह्न छोड़ जाएगी।

कर्मचारी संगठनों ने मांगी स्पष्ट
कर्मचारी संगठनों और शिक्षाविदों ने इस पूरे प्रकरण में जांच की पारदर्शिता और समय सीमा तय करने की मांग की है, उनका कहना है कि यदि जांच लंबी खींचती रही और बीच में भुगतान की प्रक्रिया पूरी हो गई, तो भविष्य में ऐसे मामलों के लिए गलत परंपरा स्थापित हो सकती है। एक शिक्षा कर्मी ने कहा जांच अधूरी रहते हुए भुगतान होना यह संकेत देता है कि प्रशासनिक नियमों की गंभीरता कम हो रही है। जांच पूरी होने तक किसी भी आर्थिक भुगतान पर रोक लगनी चाहिए।
विभागीय सूत्रों की प्रतिक्रिया
विभागीय सूत्रों का कहना है कि जांच रिपोर्ट उच्च शिक्षा विभाग को भेजी गई है, लेकिन अभी तक किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा गया है, सूत्रों के अनुसार,जांच में देरी का कारण दस्तावेजों की पुष्टि और वित्तीय अभिलेखों की जटिलता बताई जा रही है।
जांच में विलंब से बढ़ रहा अविश्वास
कई सामाजिक संगठनों ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या जांच को जानबूझकर विलंबित किया जा रहा है ताकि संबंधित व्यक्ति को अपने पक्ष में राहत मिल सके, सूत्रों के अनुसार, आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों में वित्तीय अनियमितता की कुछ बातें सामने आई हैं,जिनकी जांच होना आवश्यक है।
शिकायत अभी जांच के अधीन,फिर भी भुगतान आदेश क्यों?
सूत्रों के अनुसार,संबंधित महाविद्यालय के एक सेवानिवृत्त प्रभारी अधिकारी पर वित्तीय अनियमितता और दस्तावेजों के दुरुपयोग की शिकायत लंबित है, जिसकी जांच उच्च शिक्षा विभाग के माध्यम से की जानी है। परंतु जांच पूरी हुए बिना ही महालेखाकार कार्यालय से उनके जीपीएफ भुगतान का आदेश जारी कर दिया गया। प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ वित्तीय जांच लंबित है, तो नियमों के अनुसार जीपीएफ या पेंशन भुगतान रोकना आवश्यक होता है, जब तक कि जांच रिपोर्ट स्पष्ट न हो जाए।
महालेखाकार कार्यालय की भूमिका पर उठे सवाल
महालेखाकार कार्यालय भारत सरकार के नियंत्रण में कार्य करता है और इसका उद्देश्य ही सरकारी वित्तीय अनुशासन की निगरानी करना है, ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब विभाग के पास संबंधित व्यक्ति के खिलाफ वित्तीय अनियमितता की शिकायत दर्ज है,तो बिना जांच पूर्ण हुए भुगतान का आदेश क्यों? वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ऐसी प्रक्रिया बिना जांच के पूरी की जाती हैं, तो यह वित्तीय प्रशासन की पारदर्शिता पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं और गलत उदाहरण स्थापित करती हैं।
ऑडिट रिपोर्ट छह वर्षों से लंबित-
दस्तावेजों के अनुसार, 2019 के बाद से महाविद्यालय की कैशबुक का ऑडिट नहीं हुआ है, कैशबुक में बैंक व ट्रेजरी टोटल भी नहीं है, जिससे आय-व्यय का संतुलन स्पष्ट नहीं हो पा रहा, कई पन्नों में हस्ताक्षर अनुपस्थित हैं और कुछ प्रविष्टियाँ वर्षों बाद दर्ज की गई हैं, विशेषज्ञों का कहना है कि यह वित्तीय अनियमितता का संकेत हो सकता है और इसकी जांच आवश्यक है।
सेवानिवृत्ति के बाद कैश बुक पूरी करने की कोशिश
सेवानिवृत्ति के छह महीने बाद पूर्व प्रभारी प्राचार्य द्वारा कैश बुक का टोटल और ऑडिट करवाने के लिए अनुमति मांगे जाने की सूचना ने और सवाल खड़े कर दिए हैं। नियमों के अनुसार, वित्तीय वर्ष की समाप्ति के बाद ऑडिट रिपोर्ट समय पर प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य होता है, वर्षों बाद कैश बुक को पुनः संशोधित या टोटल करने का प्रयास, प्रक्रिया की पारदर्शिता पर संदेह पैदा करता है।
जीपीएफ भुगतान प्रक्रिया पर भी संदेह
सामाजिक संगठनों और कर्मचारी प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि ऑडिट और जांच लंबित हैं, तो किसी भी प्रकार का सेवानिवृत्ति भुगतान, विशेषकर जीपीएफ (भविष्य निधि) तब तक नहीं किया जाना चाहिए, जब तक जांच पूरी न हो जाए। जानकारों के अनुसार, उच्च शिक्षा विभाग के 4 जुलाई 2025 के संशोधित आदेश के तहत, ऐसे मामलों में भुगतान तब तक स्थगित रहेगा जब तक वित्तीय अनियमितता से जुड़ी जांच पूरी न हो जाए। एक शिक्षाविद् ने कहा “यदि जांच पूरी होने से पहले भुगतान कर दिया जाता है, तो यह विभागीय नियमों की अवहेलना होगी और भविष्य में जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाएगा।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिनिधियों की मांग
भाजपा नेता और सामाजिक कार्यकर्ता शारदा प्रसाद गुप्ता ने इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, सचिव उच्च शिक्षा विभाग, और कलेक्टर कोरिया को पत्र भेजा था,पत्र में पिछले 15 वर्षों के वित्तीय दस्तावेजों की उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय में राजनीतिक खींचतान और प्रभार विवाद के चलते प्रशासनिक व वित्तीय अनुशासन प्रभावित हुआ है।
जनता की मांग, स्वतंत्र जांच हो…
स्थानीय शिक्षकों, विद्यार्थियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि शासन को इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र जांच समिति गठित कर कैशबुक, ऑडिट रिपोर्ट और वित्तीय लेनदेन का भौतिक सत्यापन करवाना चाहिए, जनता का कहना है कि जब महाविद्यालय जैसी शैक्षणिक संस्था में पारदर्शिता पर प्रश्न उठने लगें,तो यह केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि नैतिक विफलता का भी संकेत है।
जनता और प्रशासनिक हलकों में चर्चा…
इस पूरे मामले ने स्थानीय प्रशासनिक हलकों में हलचल मचा दी है। कई कर्मचारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि क्या महालेखाकार कार्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में भी अब प्रभाव और पहुँच के आधार पर निर्णय लिए जा रहे हैं? जनता के बीच यह धारणा बन रही है कि यदि वित्तीय अनुशासन की निगरानी करने वाला ही विभाग नियमों की अनदेखी करेगा, तो जवाबदेही की उम्मीद कहाँ से की जाएगी।
पारदर्शी जांच की मांग…
स्थानीय स्तर पर अब इस पूरे प्रकरण की पारदर्शी जांच की मांग उठ रही है, सामाजिक संगठनों और कर्मचारी संघों का कहना है कि शासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जांच लंबित मामलों में किसी प्रकार का भुगतान न हो, ताकि भविष्य में भ्रष्टाचार या प्रभावशाली हस्तक्षेप की गुंजाइश न रहे।
प्रमुख विसंगतियाँ (आरटीआई से मिली जानकारी के अनुसार)
2019 के बाद से ऑडिट रिपोर्ट उपलब्ध नहीं…
कई वर्षों के बैंक व ट्रेजरी टोटल अनुपस्थित…
कई पन्नों पर हस्ताक्षर गायब…
कटिंग और सुधार बिना सत्यापन हस्ताक्षर के…
सेवानिवृत्ति के बाद भी कैश बुक अधूरी…
जनभागीदारी एवं पी.डी. खाते का लेखा असंतुलित…


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