- ग्राम विकास नहीं, कमीशन विकास: जनपद बैकुंठपुर की लड़ाई असल चेहरा सामने लाती है…
- विकास बनाम कमीशन,जन-प्रतिनिधि,अधिकारी कर्मचारी सभी हिस्सेदारी के लिए आमने सामने,मामला जनपद पंचायत बैकुंठपुर का…
- अध्यक्ष, उपाध्यक्ष,सदस्य सरपंच अपने हिस्से के लिए लामबंद,अधिकारी कर्मचारी अपने हिस्से के लिए एकजुट…
- जिलाधीश कोरिया के समक्ष दोनों ने की शिकायत,शिकायत का मजनून अलग, शिकायत के पीछे की वजह कमीशन की हिस्सेदारीःसूत्र
- अध्यक्ष,उपाध्यक्ष, सरपंच ने सीईओ की शिकायत की,सीईओ सहित कर्मचारियों ने जनप्रतिनिधियों की शिकायत की…
- क्या त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था में कमीशन ही निर्वाचित होने पदस्थ होने मुख्य उद्देश्य,ग्राम विकास मंशा नहीं?
- कलेक्टर कोरिया के समक्ष दोनों पक्ष पहुँचे शिकायत लेकर,लेकिन शिकायत का मूल कारण ‘कमीशन बंटवारा’ बताया जा रहा है…

-रवि सिंह-
कोरिया,08 नवंबर 2025
(घटती-घटना)।
कोरिया जिले के जनपद पंचायत बैकुंठपुर में एक बार फिर जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों-कर्मचारियों के बीच टकराव खुलकर सामने आ गया है,बाहर से देखने पर यह मामला प्रशासनिक मतभेद और कार्यप्रणाली पर असहमति का लगता है, लेकिन सूत्रों के अनुसार असली विवाद निर्माण कार्यों के कमीशन बंटवारे को लेकर है,स्थिति यह है कि जनप्रतिनिधि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष,सदस्य और सरपंच,एक ओर खड़े हैं, जबकि दूसरी ओर जनपद सीईओ सहित कर्मचारी लामबंद हैं,दोनों पक्षों ने जिलाधीश कोरिया के समक्ष एक-दूसरे के खिलाफ लिखित शिकायतें प्रस्तुत की हैं,जनपद पंचायत बैकुंठपुर में जिस तरह जनप्रतिनिधि और अधिकारी-कर्मचारी दो गुटों में आमने-सामने खड़े हैं, वह किसी एक कार्यालय का विवाद नहीं,बल्कि त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था के खोखले हो चुके चरित्र का खुला प्रदर्शन है, यह लड़ाई योजनाओं को बेहतर बनाने या गाँवों के विकास की दिशा तय करने को लेकर नहीं है, यह लड़ाई है ‘कौन कितना कमीशन खाएगा’ इसकी हिस्सेदारी की,और यदि यही त्रिस्तरीय शासन का असली चेहरा है तो यह लोकतंत्र का अपमान है। बता दे की कोरिया जिले के जिला मुख्यालय स्थित जनपद पंचायत कार्यालय बैकुंठपुर में फिर एक बार जनप्रतिनिधियों की अधिकारी और कर्मचारियों से रार ठनी हुई नजर आ रही है और यह रार जो बड़ी तकरार बनने जा रही है वह अपनी अपनी हिस्सेदारी वह भी निर्माण कार्यों के कमीशन की हिस्सेदारी है के लिए ठनी हुई बताई जा रही है जिसके कारण अब शिकायतों का दौर जारी है और जनप्रतिनिधि एक तरफ अधिकारी कर्मचारी एक तरफ इस तकरार में खड़े नजर आ रहे हैं, इस रार तकरार की सुगबुगाह कई महीनों से सुनाई दे रही थी जो अब धधक चुकी है और इसकी शुरुआत शिकायतों से हुई है जिसमें यह देखने को मिला कि एक तरफ जनप्रतिनिधियों ने कलेक्टर कोरिया से सीईओ की शिकायत की है वहीं दूसरी तरफ सीईओ ने कर्मचारियों के हस्ताक्षर सहित एक शिकायत पत्र प्रस्तुत किया है जिसमें उन्होंने जनप्रतिनिधियों की शिकायत की है, वैसे सूत्रों का दावा है कि लड़ाई साफ साफ सीधे सीधे कमीशन वाली है अधिकारी कर्मचारी अपने कमीशन पर अडिग हैं वहीं जनप्रतिनिधियों को कमीशन नहीं मिल रहा है और यह आग इसीलिए धधक रही है, वैसे जनपद पंचायत बैकुंठपुर की हालिया लड़ाई जो जनप्रतिनिधियों सहित अधिकारी एवं कर्मचारियों के बीच छिड़ी है वह पंचायतों सहित ग्राम जनों के विकास के लिए जारी लड़ाई या संघर्ष नहीं है वह सभी के लिए अपने विकास उद्देश्य से जारी लड़ाई है और जो यह बतलाती है कि आज एक तरफ निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की एकमात्र मंशा खुद का विकास है वहीं अधिकारियों और कर्मचारियों का भी पेट वेतन से नहीं भर रहा है उन्हें भी इसके अलावा पैसे की जरूरत है जो कमीशन से मिलना संभव है।
कांग्रेस शासनकाल से शुरू हुई परंपरा भाजपा शासनकाल में भी जारी
कांग्रेस शासनकाल से ही ऐसा देखने को मिला है कि त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था अंतर्गत निर्वाचित जनप्रतिनिधि और नगरीय निकाय अंतर्गत निर्वाचित जनप्रतिनिधि अधिकार विहीन हैं,तब से जारी आपसी टकराव जो अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के बीच जारी है वह अनवरत जारी है, कांग्रेस शासनकाल में भी यह देखने को मिला था कि बैकुंठपुर जनपद कार्यालय में जनप्रतिनिधियों सहित अधिकारी में नहीं जमती थी टकराव कायम था वहीं आज भाजपा शासनकाल में भी वैसी ही पुनरावृत्ति देखने को मिल रही है और टकराव आपसी अब सड़क पर आना बाकी है, कांग्रेस शासनकाल में भी मामला सड़क पर आया था कारण आज जैसा ही है तब भी विधायक तत्कालीन मौन थीं अन्य जनप्रतिनिधि मौन थे आज भी त्रिस्तरीय पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधि और नगरीय निकाय के जनप्रतिनिधि परेशान हैं और विधायक मौन हैं।
सभी विभागों के लिए विधायक व मंत्री ही जनप्रतिनिधि?
लगातार यह देखने को मिल रहा है कि अधिकारी केवल विधायकों के प्रति ही जिम्मेदार नजर आ रहे हैं या उन्हीं का आदेश निर्देश मान रहे हैं,अन्य जनप्रतिनिधि जैसे त्रिस्तरीय पंचायत के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की बात हो या नगरीय निकायों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की बात हो इनका अधिकारी कम ही या नहीं ही सुनते नजर आ रहे हैं,अब ऐसे में सवाल यह उठता है क्या केवल विधायक ही अधिकारियों की नजर में जनप्रतिनिधि हैं अन्य की आधिकारियों की नजर में कोई वक्त नहीं है।
पंचायत,जनपद, जिला पंचायत व नगरीय निकाय के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों कि यदि नहीं है सुनवाई फिर इनका चुनाव ही क्यों नहीं कर दिया जाता है बंद?
आज विधायक ही अधिकारियों की नजर में केवल जनप्रतिनिधि हैं,जिला पंचायत,जनपद पंचायत,पंचायत सहित नगरीय निकायों के जनप्रतिनिधियों को अधिकारी कुछ नहीं समझते क्योंकि सरकार ने ऐसी व्यवस्था बना दी है कि अब अन्य को कोई अधिकार या कोई स्वतंत्रता प्राप्त नहीं है,अब यदि केवल विधायक ही अधिकारियों की नजर में केवल जनप्रतिनिधि हैं तो अन्य के लिए निर्वाचन बंद क्यों नहीं देती सरकार यह बड़ा सवाल है।
किसकी शिकायत किसके विरुद्ध? अध्यक्ष,उपाध्यक्ष एवं कुछ जनप्रतिनिधियों ने…
सीईओ पर अनियमितता और मनमानी का आरोप लगाया है,सीईओ सहित कर्मचारियों ने—जनप्रतिनिधियों पर कार्यों में हस्तक्षेप और दबाव डालने का आरोप लगाया है,लेकिन सूत्र साफ कहते हैं,मामले का मजनून अलग है। विवाद का मूल कारण कमीशन की हिस्सेदारी है।
यह विकास की लड़ाई नहीं, ‘स्व-विकास’ की लड़ाई
इस पूरे घटनाक्रम में ग्राम विकास कहीं नहीं दिखता, न जनपद के योजनाओं की पारदर्शिता की चिंता,न ग्रामीण जनता की समस्याओं पर कोई चर्चा,यह साफ नजर आता है कि निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं,अधिकारी-कर्मचारी अपनी पुरानी हिस्सेदारी से पीछे हटना नहीं चाहते, जब तक हिस्सा तय नहीं, संघर्ष जारी रहने के आसार मानें जा रहे हैं।
इतिहास खुद को दोहरा रहा है…
बैकुंठपुर जनपद में यह स्थिति नई नहीं है,कांग्रेस शासनकाल में भी अध्यक्ष-उपाध्यक्ष बनाम सीईओ विवाद सड़क तक आ चुका है, तब भी विधायक मौन थीं, आज सत्ता बदल चुकी है,चेहरे बदल गए हैं पर परिस्थिति वही है,इस बार भी अध्यक्ष-कांग्रेस समर्थित और उपाध्यक्ष-भाजपा समर्थित हैं, लेकिन दोनों सीईओ के खिलाफ एकजुट हैं, अब देखना यह है कि विधायक किसके साथ खड़े होते हैं, यह अब तक स्पष्ट नहीं।
त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था क्यों विफल जैसी प्रतीत हो रही है?
यह व्यवस्था इसलिए बनी थी कि गाँवों का विकास गाँव के प्रतिनिधियों के हाथ में रहे, पर हुआ इसका उल्टा, अधिकारी ही दोनों व्यवस्था (पंचायत,नगरी निकाय) पर नियंत्रण बनाए बैठे हैं, निर्वाचित जनप्रतिनिधि सिर्फ आधिकारिक समारोहों तक सीमित होकर रह गए हैं,यही कारण है कि टकराव अब लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
बड़ा सवाल…?
यदि अधिकारी केवल विधायकों को ही जनप्रतिनिधि मानते हैं,और पंचायत/जनपद/जिला पंचायत/नगर निकाय के प्रतिनिधियों की सुनवाई ही नहीं होती, तो फिर इन पदों के लिए चुनाव कराने का औचित्य क्या है? सिर्फ दिखावे के लिए लोकतंत्र या वास्तविक सत्ता का केंद्रीकरण?
अंतिम बात सीधे शब्दों में…
जब तक ग्राम विकास की राशि को जनता के विकास की बजाय नेताओं-अधिकारियों के पेट की आग बुझाने का साधन माना जाएगा, तब तक गाँव वैसे ही रहेंगे अधूरे,उपेक्षित,टूटे हुए,और सत्ता किसके हाथ में रहे। विकास का नारा हमेशा एक धोखा ही साबित होगा। यह विवाद केवल बैकुंठपुर का नहीं यह पूरी त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली की मूल कमजोरियों को उजागर करता है। जब तक-अधिकारों की स्पष्टता नहीं होगी, पारदर्शी बजट प्रक्रिया नहीं होगी और कमीशन संस्कृति खत्म नहीं होगी, तब तक गाँव का विकास फाइलों और बैठकों तक ही सीमित रहेगा।
ऐसी लड़ाई एकबार पहले भी देखने को मिली थी जब सरकार कांग्रेस की थी…
बैकुंठपुर जनपद पंचायत कार्यालय में ऐसी लड़ाई एकबार पहले भी देखने को मिली थी जब सरकार कांग्रेस की थी और तब अध्यक्ष भाजपा समर्थित थीं और उपाध्यक्ष कांग्रेस समर्थित,आज स्थिति उसके उलट है और अध्यक्ष कांग्रेस समर्थित हैं और उपाध्यक्ष भाजपा समर्थक,तब भी अध्यक्ष उपाध्यक्ष एक बार एक सीईओ के खिलाफ लामबंद हुए थे जिसमें तब पक्ष विपक्ष एकजुट होकर आंदोलनरत हुआ था जिसमें तब विधायक ने साथ अधिकारी का दिया था फिर भी आंदोलन उपरांत विधायक की मंशा के विपरीत जाकर सीईओ को हटाया गया था और आज भी स्थिति वैसी ही बनती नजर आ रही है सीईओ के विरुद्ध अध्यक्ष उपाध्यक्ष दोनों हैं बस विधायक किसके साथ हैं यह इस बार अब तक स्पष्ट नहीं है,वैसे जनपद पंचायत कार्यालय सरकारी योजनाओं के जमीनी क्रियान्वयन का कार्य करता है और यदि वहां ही आपसी सामंजस्य कायम नहीं है यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार की योजनाएं धरातल तक नहीं पहुंच सकेंगी और त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था का उद्देश्य अपूर्ण रह जाएगा,जनप्रतिनिधियों सहित अधिकारी एवं कर्मचारियों की आपसी लड़ाई का अंजाम क्या होगा यह तो पता नहीं लेकिन माना जा रहा है कि जब तक आपस का कमीशन बंटवारा तय नहीं हो जाता यह लड़ाई खत्म नहीं होगी यह जारी रहेगी, वैसे मामले को लेकर एक अन्य स्थिति पर भी चर्चा आवश्यक है जो त्रिस्तरीय पंचायत व्यवस्था और नगरीय निकायों की व्यवस्था के विषय में है जहां यह देखने को मिल रहा है कि अधिकारियों की ही दोनों ही जगहों पर चलती है और दोनों ही जगहों में निर्वाचित जनप्रतिनिधि आज हाशिए पर हैं उन्हें अधिकार स्वरूप कोई भी ऐसी सुविधा नहीं है जिसके कारण अधिकारी उनकी सुने और यह भी एक कारण है कि आज दोनों ही जगहों पर आपसी टकराव सामने है।
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