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बैकुंठपुर/पटना@क्या पटना तहसील ने नहीं ली सबक?फिर अनाधिकृत व्यक्तियों से सरकारी काम…

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  • पहले तहसीलदार की आईडी से हुआ था धान घोटाला,अब वही गलती दोहराई जा रही है,जवाबदेही से बचने का नया तरीका…
  • स्थानीय निवासी कर्मचारी का तहसील कार्यालय में क्या काम,क्या न्यायिक व्यवस्था प्रभावित नहीं होगा?
  • 2 महीने के लिए स्थानांतरण होता है फिर वापस अपनी सुविधा अनुसार राजनीतिक पकड़ पर आ जाते हैं कर्मचारी गृह क्षेत्र


-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/पटना,07 नवंबर 2025
(घटती-घटना)।

कोरिया जिले की पटना तहसील एक बार फिर विवादों में है,कुछ माह पहले जिस तरह तहसीलदार की लॉगिन आईडी से धान खरीदी के दौरान रकबा हेरफेर और फर्जीवाड़े का मामला सामने आया था, अब वही खेल एक बार फिर दोहराया जा रहा है, तहसील में अब भी अनाधिकृत व्यक्तियों से सरकारी कार्य करवाए जा रहे हैं, और यह सब कुछ अधिकारियों की जानकारी में हो रहा है।
बता दे की कोरिया जिले के पटना तहसील से एक बार फिर ऐसी जानकारी सामने आ रही है जो यह साबित कर रही है कि तहसील कार्यालय में अनाधिकृत व्यक्तियों का ही राज है और उन्हीं की मंशा से या तो काम हो रहा है या फिर अनाधिकृत व्यक्ति से कार्य लेकर अंत में गड़बड़ी का किसी उसी पर आरोप डालकर अधिकारियों का बच निकलने का यह नया एक हथकंडा है,बताया जाता है कि पहले भी ऐसा हुआ है और जब गड़बड़ी सामने आई तब अनाधिकृत व्यक्तियों पर आरोप लगाकर मामले में खुद को पाक साफ बता ले गए थे अधिकारी, वर्तमान समय धान खरीदी की शुरूआत का समय है,15 नवंबर से धान खरीदी की जानी है और इस समय शासन गिरदावरी अभियान भी चलाती है जिसमें यह तय किया जाता है कि किसान कितने रकबे में धान की फसल लगाया है,गिरदावरी में यदि रकबा खेती का कम पाया जाता है तो फिर धान बिक्री की सीमा कम की जाती है और यही से फिर खेल शुरू होता है रकबा सुधार का, हाल फिलहाल में पटना तहसील में अनाधिकृत व्यक्ति ही काम करते नजर आ रहे हैं जिन्हें माना जा रहा है इसी कार्य के लिए रखा गया है, जबकि पूर्व में जनवरी 2023 में पटना तहसील से बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ था, एक किसान ने अपनी जमीन का रकबा तहसील रिकॉर्ड में बढ़वाकर अधिक धान बेचा था, और बाद में रकम आहरण के पश्चात रकबा पुनः घटा दिया गया था। यह पूरा खेल तहसीलदार की आईडी से हुआ था, जांच में सामने आया कि किसान अजय कुमार कुशवाहा, उसके भाई अरविंद कुशवाहा और तहसील में कार्यरत निजी व्यक्ति की मिलीभगत से यह हेरफेर किया गया था। पुलिस ने धारा 409, 420, 120बी, 467, 468, 471 भादवि एवं 66(घ) आईटी एक्ट के तहत अपराध पंजीबद्ध किया था, परंतु आश्चर्यजनक रूप से उस समय तहसीलदार को आरोपपत्र से बाहर रखा गया, जबकि वही आईडी उनके नाम से पंजीकृत थी। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, एनआईसी के तकनीकी विशेषज्ञों ने बार-बार रकबा परिवर्तन को देखकर इस फर्जीवाड़े का खुलासा किया था।

पूर्व में तहसीलदार की आईडी से चला था फर्जीवाड़ा
साल 2023 में पटना तहसील से एक बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ था। किसान अजय कुमार कुशवाहा ने अपनी जमीन का रकबा तहसील रिकॉर्ड में बढ़ाकर ज्यादा धान बेचा और रकम आहरण के बाद रकबा घटा दिया, जांच में पता चला कि यह पूरा खेल तहसीलदार की लॉगिन आईडी से किया गया था। इसमें किसान के साथ उसका भाई अरविंद कुशवाहा और तहसील का निजी ऑपरेटर शामिल थे,एनआईसी के तकनीकी विशेषज्ञों ने जब एक ही खाते में बार-बार रकबा बढ़ने और घटने की गतिविधि देखी, तब यह मामला उजागर हुआ, मामले में एफआईआर तो दर्ज हुई, परंतु तहसीलदार को आरोपपत्र से बाहर रखा गया, जिससे प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठे।
अब फिर वही तरीका, निजी लोगों को सौंप दी आईडी
धान खरीदी का सीजन शुरू होने से पहले अब फिर से गिरदावरी और रकबा सुधार के नाम पर गड़बडि़यों की खबरें आ रही हैं, सूत्रों के अनुसार तहसीलदार अपनी लॉगिन आईडी और पासवर्ड निजी व्यक्तियों को सौंप देते हैं, ये व्यक्ति राजस्व अभिलेखों में परिवर्तन कर रहे हैं, जबकि यह कार्य केवल शासकीय अधिकारियों को ही करने का अधिकार है, स्थानीय सूत्रों का कहना है कि यह सब उच्चाधिकारियों की जानकारी में है,जब कोई फर्जीवाड़ा पकड़ में आता है तो ठीकरा इन्हीं अनाधिकृत लोगों पर फोड़कर अधिकारी खुद को बचा लेते हैं।
राजनीतिक संरक्षण बना सुरक्षा कवच
कहा जा रहा है कि पटना तहसील में कुछ कर्मचारियों की राजनीतिक पकड़ इतनी मजबूत है कि स्थानांतरण के बावजूद वे जल्द ही वापस लौट आते हैं, इस कारण न तो अधिकारी कार्रवाई कर पाते हैं, न ही भ्रष्टाचार पर अंकुश लग पाता है,स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजनीतिक संरक्षण के बिना ऐसी हिम्मत संभव ही नहीं है।
हाईकोर्ट के आदेश की खुलेआम अवहेलना
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर ने स्पष्ट रूप से कहा है कि किसी भी शासकीय कार्यालय में अनाधिकृत व्यक्ति से कार्य कराना अवैध है, इसके बावजूद पटना तहसील में निजी कंप्यूटर ऑपरेटर काम कर रहे हैं और अधिकारी उन्हें अपनी आईडी तक सौंप रहे हैं,यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही है बल्कि आपराधिक जिम्मेदारी भी बनती है।
स्थानीय व्यक्तियों का प्रभाव और राजनीतिक संरक्षण
स्थानीय लोगों का कहना है कि तहसील में कुछ कर्मचारियों की पकड़ इतनी मजबूत है कि उनका स्थानांतरण भी केवल औपचारिकता रह गया है, अक्सर ऐसे कर्मचारी दो महीने के भीतर ही राजनीतिक संरक्षण के दम पर वापस गृह क्षेत्र में लौट आते हैं।
कौन करेगा जवाबदेही तय?
जब तहसीलदार की आईडी से फर्जीवाड़ा होता है, तो सवाल उठता है, अगर अधिकारी खुद अपनी आईडी की सुरक्षा नहीं कर पा रहे, तो जनता की जमीन का रिकॉर्ड कैसे सुरक्षित रहेगा? पिछले प्रकरण में केवल तीन निजी लोगों पर एफआईआर दर्ज की गई, जबकि तहसीलदार और अन्य जिम्मेदार अधिकारी आज भी पदस्थ हैं। इससे यह संदेह और गहरा हो जाता है कि क्या कार्रवाई केवल दिखावे के लिए की जा रही है?
स्थानीय लोगों की मांग,उच्चस्तरीय जांच जरूरी
स्थानीय नागरिकों और किसान संगठनों ने राज्य शासन से उच्च स्तरीय जांच की मांग की है, उनका कहना है कि जब तक जिम्मेदार अधिकारी खुद जवाबदेह नहीं ठहराए जाएंगे, तब तक पटना तहसील में ‘अनाधिकृत शासन’ चलता रहेगा।
क्या पटना तहसील ने अब भी सबक नहीं लिया?
धान खरीदी, रकबा सुधार और आईडी के दुरुपयोग से जुड़ा यह प्रकरण केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा प्रश्न है, अगर शासन ने अब भी कठोर कदम नहीं उठाए, तो आने वाले समय में यह सवाल और प्रबल होगा, क्या पटना तहसील ने अब भी सबक नहीं लिया?
2 महीने के लिए होता है तबादला, फिर राजनीतिक पकड़ से लौट आते हैं गृह क्षेत्र
प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार,कई बार ऐसे कर्मचारियों का औपचारिक रूप से स्थानांतरण तो किया जाता है,परंतु दो महीने से भी कम समय में वे राजनीतिक दबाव या स्थानीय संरक्षण के बल पर फिर अपने गृह क्षेत्र में वापस लौट आते हैं,यह न केवल कलेक्टर व कमिश्नर की कार्यवाही को कमजोर करता है,बल्कि पूरे तहसील प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब तबादला केवल औपचारिकता बन जाए और राजनीतिक हस्तक्षेप व्यवस्था का हिस्सा बन जाए,तो निष्पक्ष प्रशासन की उम्मीद करना व्यर्थ है।
स्थानीय निवासी कर्मचारी का तहसील कार्यालय में क्या काम? क्या न्यायिक व्यवस्था प्रभावित नहीं होगी?
पटना तहसील में पदस्थ कई कर्मचारी उसी क्षेत्र के निवासी हैं,जहाँ वे राजस्व मामलों में प्रत्यक्ष रूप से निर्णय लेते हैं,इससे हितों का टकराव की स्थिति बनती है क्योंकि वही कर्मचारी, जिनके परिवार या परिचितों के नाम पर भूमि विवाद लंबित हैं,उसी कार्यालय में नाप-जोख,सीमांकन और रकबा सुधार जैसे कार्य करते हैं,स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थिति न्यायिक निष्पक्षता को सीधे प्रभावित करती है,जब कर्मचारी स्वयं अपने ही क्षेत्र में अधिकारी बन जाएँ, तो सामान्य जनता निष्पक्ष न्याय की उम्मीद कैसे करे? यह सवाल अब ग्रामीणों के बीच गूंज रहा है।वैसे यह कर्मचारी अपने नाम से जमीन भी बना रहे हैं ऐसा सूत्रों का दावा है।


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