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कोरिया@बिन बुलाए मंच पर ठसने की नई संस्कृति, आत्ममुग्धता या कदाचार?

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  • अक्सर मंचों पर बिन बुलाए मेहमान आयोजकों के लिए नया सरदर्द,
  • सोशल मीडिया पर हीरो बनने की ललक ने बढ़ाई यह प्रवृत्ति…चर्चा है…
  • आत्ममुग्ध होकर स्वयं को विशिष्ट मानने वालों की सोच…


-रवि सिंह-
कोरिया,05नवंबर 2025
(घटती-घटना)।

आज समाज में एक नई प्रवृत्ति पनप रही है स्वयं को विशेष और विशिष्ट मान लेने की,यह प्रवृत्ति न केवल हास्यास्पद है, बल्कि सार्वजनिक आयोजनों की गरिमा को भी प्रभावित कर रही है, किसी भी सांस्कृतिक,सामाजिक या प्रशासनिक आयोजन में यह तय होता है कि मंच पर कौन बैठेगा। आमंत्रण पत्र में मुख्य अतिथि,विशिष्ट अतिथि और अन्य आमंत्रित जनों के नाम स्पष्ट रूप से प्रकाशित रहते हैं। आयोजन समिति उन्हें विधिवत आमंत्रित करती है, सम्मानपूर्वक मंच पर स्थान देती है, यही हमारी लोकरीति रही है, लेकिन जैसे ही कार्यक्रम शुरू होता है, उसी क्षण कुछ स्वयंभू “श्रेष्ठ जन” मंच की ओर बढ़ते नज़र आते हैं। न किसी ने बुलाया, न नाम सूची में है, फिर भी वे मंच पर ठस जाते हैं, मानो वही आयोजन के केंद्र बिंदु हों।
अब असली परेशानी होती है आयोजकों को क्योंकि स्वागत-सत्कार, नाश्ता-पानी और मोमेंटो की व्यवस्था आमंत्रित अतिथियों के अनुसार ही होती है। पर ये अनौपचारिक अतिथि सबसे आगे बैठकर न केवल बुके की प्रतीक्षा करते हैं, बल्कि स्मृति चिन्ह की मांग तक कर डालते हैं,फोटो सेशन में मुख्य भूमिका निभाना और बाद में सोशल मीडिया पर फलां कार्यक्रम में अतिथि बतौर शामिल हुआ जैसी पोस्ट डालना इनका प्रिय कर्म है,ऐसे स्वघोषित विशिष्ट जन समाज में सम्मान नहीं, बल्कि उपहास अर्जित करते हैं, यह आत्ममुग्धता नहीं तो और क्या है कि बिना किसी योगदान या निमंत्रण के व्यक्ति स्वयं को हीरो सिद्ध करने पर आमादा हो जाए,मंच की गरिमा तब बनती है जब वह आमंत्रित अतिथियों के सम्मान से सुसज्जित हो, न कि जब वह आत्मप्रचार के शिकार लोगों से भर जाए। इस प्रवृत्ति को रोकने का पहला कदम है — आत्मसंयम। जब मंच पर आपका नाम नहीं है, तो वहीं नीचे दीर्घा में बैठकर ताली बजाना कहीं अधिक गरिमामय है, कभी-कभी नीचे बैठ जाना ही व्यक्ति को ऊँचा बना देता है, और जब मंच पर जबरन ठसना व्यक्ति को छोटा कर देता है — सपरिवार याद किया जाता है,पर अच्छे शब्दों में नहीं।


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