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रायपुर@क्या सिर्फ राजनीति करने वालों को है छत्तीसगढ़ से प्रेम या जनता में भी है स्थापना दिवस का उत्साह?

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  • राजनीति के मंचों से लेकर गाँव की चौपालों तक,सवाल यही कि किसका पर्व है ‘छत्तीसगढ़ स्थापना दिवस’?
  • स्थापना दिवस पर खर्च तो करोड़ों का, पर जनता कहाँ?
  • सरकारी शान के साए में जनता की भागीदारी गायब, आखिर ये आयोजन किसके लिए हैं?

रवि सिंह-
रायपुर,03 नवम्बर 2025 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ राज्य की स्थापना को पच्चीस वर्ष पूरे हो चुके हैं,इस अवसर पर इस वर्ष प्रदेश की सरकार रजत जयंती वर्ष मना रही है,यह दिन न केवल एक प्रशासनिक उपलब्धि का प्रतीक है, बल्कि उस जनता की आकांक्षाओं का भी, जिसने वर्षों तक अपने राज्य के सपने को साकार करने के लिए संघर्ष किया,परंतु आज यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है,क्या यह दिवस अब केवल राजनीति का अवसर बनकर रह गया है? क्या आम नागरिकों में अब भी वही आत्मीय उत्साह शेष है,जो राज्य निर्माण के समय देखा गया था? राजनीतिक दल इस दिन को अपनी योजनाओं और भाषणों के माध्यम से प्रदर्शित करते हैं, मंच सजते हैं,घोषणाएँ होती हैं, और राज्य के गौरव का उल्लेख किया जाता है, पर जब गांव में बच्चे छत्तीसगढ़ महतारी की आरती करते हैं, महिलाएँ पारंपरिक पोशाकों में लोकगीत गाती हैं,और विद्यालयों में ‘अरपा पैरी के धार’ की ध्वनि गूंजती है तब यह साफ झलकता है कि छत्तीसगढ़ की आत्मा अभी जीवित है,राजधानी में उत्सव भले औपचारिकता में बदल गया हो, लेकिन ग्रामीण हृदय आज भी इस दिन को गर्व से मनाता है, यही सच्चा छत्तीसगढ़ है जहाँ राजनीति नहीं, बल्कि मिट्टी की सुगंध,लोकभाषा का अपनापन और लोगों की आस्था बसती है, राजनीति करने वालों के लिए यह दिवस सत्ता और मंच का प्रतीक हो सकता है,पर आम जनता के लिए यह अपने हक,अपनी पहचान और अपने अस्तित्व का पर्व है।


प्रशासन को आत्ममंथन करना होगा कि आखिर यह कार्यक्रम ‘लोक उत्सव’ है या केवल ‘लोक-प्रदर्शन ‘?
छत्तीसगढ़ की स्थापना दिवस को लेकर प्रदेशभर में भव्य सरकारी आयोजन किए गए, मंच सजाए गए, पोस्टर लगे, मंचों पर भाषण हुए, और सरकारी धन का उदार खर्च हुआ, लेकिन एक सवाल जो हर वर्ष की तरह इस बार भी गूंजा, इन आयोजनों तक जनता आखिर पहुंचती क्यों नहीं? सरकार करोड़ों रुपये कार्यक्रमों पर खर्च करती है ताकि जनता राज्य की उपलब्धियों को देख सके, संस्कृति को महसूस कर सके और गर्व के साथ अपनी पहचान का उत्सव मना सके, लेकिन जब आयोजन स्थल की कुर्सियां खाली रह जाती हैं और तालियां केवल अधिकारियों के बीच गूंजती हैं,तो यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि क्या यह पर्व अब जनता से दूर हो गया है? स्थापना दिवस का उद्देश्य जनता और सरकार के बीच संवाद का पुल बनना था, परंतु अब यह दिन अधिकतर सरकारी औपचारिकता बनकर रह गया है,जनता को आमंत्रित करने की प्रक्रिया सीमित रह जाती है, प्रचार सिर्फ सरकारी दफ्तरों की दीवारों पर सिमट जाता है, और आम नागरिक केवल समाचारों में उत्सव देखता रह जाता है,जब आयोजन जनता के बिना हों, तो भव्य मंच,रोशनी और भाषण सब बेमानी लगते हैं। प्रशासन को आत्ममंथन करना होगा कि आखिर यह कार्यक्रम ‘लोक उत्सव’ हैं या केवल ‘लोक-प्रदर्शन ‘?
जिला स्तरीय आयोजन 2 नवंबर को क्यों? 1 नवंबर को अवकाश, लोग घरों में फिर राज्योत्सव का उत्सव जनता से दूर क्यों हुआ?
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की रजत जयंती का वर्ष,प्रदेश भर में उत्सव,सजावट और सरकारी आयोजन,लेकिन इस बार जिला स्तरीय राज्योत्सव के आयोजन की तिथि ने ही बड़ा सवाल खड़ा कर दिया,आखिर जिला स्तरीय आयोजन 1 नवंबर की जगह 2 नवंबर को क्यों किया गया? 1 नवंबर को राज्य स्थापना दिवस पर शासन ने सामान्य अवकाश घोषित किया था। लोग घरों में थे, बच्चे भी स्कूल से छुट्टी पर थे। ऐसे में यदि जिला स्तरीय आयोजन उसी दिन होते, तो बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल हो सकते थे। परंतु जब आयोजन अगले दिन यानी 2 नवंबर को रखे गए,तब अधिकांश लोग अपने कार्यस्थलों पर लौट चुके थे और बच्चों की पढ़ाई का दबाव भी लौट आया था, यही कारण रहा कि प्रदेश के अधिकांश जिलों में जिला स्तरीय आयोजन खाली कुर्सियों के बीच संपन्न हुए,मंचों पर जनप्रतिनिधि,अधिकारी और कर्मचारी तो मौजूद थे,लेकिन जनता की उपस्थिति नगण्य रही।
प्रचार-प्रसार की कमी ने बढ़ाई दूरी
कई जिलों में आम लोगों को आयोजन की जानकारी तक नहीं थी, प्रशासन की ओर से पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं किया गया,न आमंत्रण, न सार्वजनिक अपील,नतीजा यह हुआ कि आयोजन केवल शासकीय विभागों और सत्तापक्ष तक सीमित रह गया,स्थानीय लोगों का कहना है कि ‘अगर पहले से जानकारी होती, या आयोजन 1 नवंबर को होता, तो लोग पूरे परिवार के साथ जुड़ते।
विपक्ष को नहीं मिला आमंत्रण, सवाल और गहरे
कई जिलों से यह शिकायत सामने आई कि राज्योत्सव के जिला स्तरीय आयोजन में विपक्षी नेताओं को आमंत्रण नहीं मिला, राज्य निर्माण का दिवस किसी पार्टी विशेष का नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ की जनता का पर्व है, फिर विपक्षी दलों को आमंत्रण न देना क्या लोकतंत्र की भावना के विपरीत नहीं है? राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि “राज्योत्सव को सर्वदलीय और सर्वजन उत्सव बनाया जाना चाहिए, न कि एकपक्षीय आयोजन।”
चकाचौंध में जनता गायब, क्या जनता से दूर हो गया उत्सव?
मंचों की रौनक और सजावट में प्रशासनिक उत्साह तो झलका, लेकिन जनता की भागीदारी गायब रही, नेताओं और अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद आम लोगों की अनुपस्थिति ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या यह उत्सव जनता से दूर होता जा रहा है? जब कोई राज्य अपने स्थापना दिवस पर जनता को शामिल करने में नाकाम रहता है, तो उत्सव का अर्थ भी अधूरा रह जाता है।


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