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कोरिया/पटना@तहसीलदार न्यायालय में अंगूठे वाली वसीयत के सामने हस्ताक्षर सहित शपथ आयुक्त से प्रमाणित वसीयत को नहीं मिली मान्यता…

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-न्यूज डेस्क-
कोरिया/पटना,22 सितंबर 2025 (घटती-घटना)। यदि किसी का कोई वारिस ना हो तो उसके चल- अचल संपत्ति पर जाल-साजिश होना राजस्व मामले में कोई बड़ी बात नहीं है। राजस्व न्यायालय के कई प्रकरण में फैसले को यदि देखें तो फैसला न्यायसंगत नहीं होते हालांकि इस तरह के फैसले प्रभावशील व्यक्तियों से प्रभावित होते हैं या फिर नोटों के वजन से कुछ ऐसा ही मामला पटना तहसील के राजस्व न्यायालय में बीते दिनों सामने आया है जिसके दस्तावेजों को अवलोकन पश्चात प्रथम दृष्टया यह कहना गलत नहीं होगा कि तहसीलदार ने जो फैसला दिया है वह किसी न किसी प्रभाव से प्रभावित है। चुकी यह खबर इसलिए भी ज्यादा प्रभाव रखती जब इसमें छत्तीसगढ़ शासन में वर्तमान एक मंत्री के परिजन द्वारा क्रेता बनकर विवादित जमीन विक्रेता द्वारा लिया गया। स्टेट हाईवे की कीमती भूमि लेने में मंत्री के साख का हवाला हो सकता शायद इसलिए तहसीलदार ने दिन को रात कर दिया होगा। न्याय से असंतुष्ट पीडि़त का आरोप है कि मामला दो सालों से पटना तहसील कार्यालय में नामांतरण और फौती दर्ज करने का चल रहा था। यह मामला एक ऐसे व्यक्ति का था जिसके अपने वंश वारिश कोई नहीं थे कुल मिलाकर अपने बच्चे नहीं थे,जिस व्यक्ति की जमीन थी वह व्यक्ति चार भाई और एक बहन थे अपने माता पिता के,वहीं जो व्यक्ति अब इस दुनिया में नहीं है और उसकी पत्नी भी उसके पहले ही जा चुकी थी,और मृतक अपने एक भाई के साथ एक ही घर में रह रहा था, उसका भाई और बेटा उसकी सेवा कर रहा था,उस समय जब मृतक लकवा से ग्रसित था और काफी परेशान था,लकवा के ग्रसित होने से पहले उसकी सेवा करने वाले भाई के बेटे के नाम उसने सारी वसीयत लिख दी थी यह वसीयत 2018 में लिखी गई थी और 2019 में वह लकवा से ग्रसित हो गया था और 2023 में उनकी मृत्यु हो गई और उसकी मृत्यु के बाद उनका एक और भाई उनकी मृत्यु से तीन दिन पहले अपने एक बेटे के नाम और वसीयत तैयार कर लिया और उसमें एक जमीन अपने बेटे के नाम वसीयत कर ली जो जमीन काफी कीमती थी और स्टेट हाईवे की जमीन थी, उस जमीन का प्रकरण फौती नामांतरण के लिए पटना तहसील कार्यालय में चल रहा था, सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि पहला मामला उस व्यक्ति ने फौती नामांतरण का लगाया जिसकी वसीयत 2018 की थी, जब यह बात दूसरे को पता चली तो उसने मृत्यु के तीन दिन पहले का वसीयत बनवाकर आपत्ति दर्ज कराते हुए प्रकरण दर्ज कराया एक वसीयत मृत्यु से 5 साल पहले बनी थी और दूसरी वसीयत मृत्यु के तीन दिन पहले बनी थी अब ऐसे में कौन सी वसीयत सही है इसका बिना सही निर्णय लिए तहसीलदार ने एक तरफा फैसला दे दिया ऐसा पीडि़त रोहित का आरोप है, वहीं फैसले वाली जमीन बिक्री भी तत्काल हुई और वह जमीन खरीदने वाले मंत्री के पिता व भाई निकले, यह जमीन लगभग 25 लाख रुपए में खरीदी गई है, अब सवाल यह उठता है कि क्या मंत्री के दो भाई को जमीन खरीदना था इस वजह से तहसीलदार ने जल्दबाजी में फैसला एक पक्ष में सुना दिया है?

क्या है पूरा मामला…
तहसीलदार के कारनामा तब जानने को मिला जब प्लाट नंबर 710/3 रकबा 0.080 की बिक्री हुई। हालांकि भूमि के क्रय-विक्रय तो सामान्य बात है पर यह मामला इसलिए खास है कि इस भूमि के क्रेता मंत्री के परिजन है। जब शिकायतकर्ता रोहित राजवाड़े उनकी पत्नी निवासी गिरजापुर ने अपनी आप बीती बताते हुए कहा कि मृतक गंगाराम राजवाड़े जो एक कॉलरीकर्मी रहे मेरे चाचा है। पटना तहसील के गिरजापुर में मेरे पिताजी यानी गंगाराम के भाई के यहां निवास करता था। गंगाराम के कोई संतान नहीं होने के साथ उनकी पत्नी का भी देहांत गंगाराम से पहले हो गया रहा। और मृतक अपने एक भाई के साथ एक ही घर में रह रहा था, जिसकी संपूर्ण सेवा,देखरेख उसके भाई के बेटे यानी उसके भतीजे की रही। भतीजा रोहित उसकी सेवा कर रहा था,साथ ही गंगाराम लकवाग्रस्त रहा जिसकी सेवा और उसका संपूर्ण क्रियाकर्म रोहित और उसकी पत्नी ने किया उसके इसी सेवा से अपने जीवित रहते 2018 में एक वसीयत निष्पादित किया। जिसमें उसके नाम से समस्त अचल संपति का ब्योरा देते हुए संपति रोहित के नाम कर दिया रहा। 2023 में गंगाराम के मृत्यु पश्चात इसके भूमि फौती,नामांतरण का प्रकरण पटना तहसील गया। वहीं इसी तहसील में गंगाराम के दूसरे भाई के बेटे रमेश राजवाड़े ने भी एक वसीयत पेश करते हुए प्लाट नंबर 710/3 के लिए फौती, नामांतरण के लिए इसी पटना तहसील न्यायालय में प्रकरण दर्ज हुआ। रोहित ने बताया कि गंगाराम का पूरा देखरेख तथा मृत्युपरांत काम क्रिया संस्कार मेरे घर में पूरा हुआ। गंगाराम के एक भाई जगतराम के पुत्र रमेश राजवाड़े ने फर्जी वसीयत के आधार पर अपने आप को वारिस बता कर ने स्टेट हाईवे में स्थित 20 डिसमिल भूमि तहसीलदार के मिली भगत से अपने नाम करवाकर उसे लगभग 25 लाख में क्रय किया जिसे लेने वाले छत्तीसगढ़ शासन के मंत्री के मायके पक्ष है। शिकायतकर्ता ने अपनी आपबीती बताते हुए बताया कि पिछले दो सालों से पटना तहसील में इसी मामले का केश चल रहा था पर पर प्रभावशील लोगों के आने से तहसीलदार ने बिना दस्तावेज जांच के फर्जी वसीयत के आधार पर रमेश राजवाड़े को भूमि आबंटित किया और विक्रय करने में मदद करते हुए आपत्ति के बावजूद नामांतरण भी कर दिया गया।
क्या तहसीलदार 2018 के वसीयत को मानने से किए इनकार और मृत्यु से तीन दिन पहले बने वसीयत को किए स्वीकार?
मामले में एक सवाल यह भी है कि क्या तहसीलदार ने वर्ष 2018 में बनी वसीयत को अमान्य किया और मृत्यु से केवल तीन दिन पहले बने वसीयत को मान्य किया? यदि ऐसा है तो क्या उन्होंने ने मामले के सभी पक्षकारों को आपत्ति का अवसर दिया उनकी आपत्ति स्वीकार कर क्या उन्होंने उन्हें संतुष्ट किया? वैसे शिकायतकर्ता जब शिकायत कर रहा है मतलब आपत्ति धरी की धरी रह गई और नामांतरण सहित जमीन बेच दी गई, अब जमीन मंत्री के रिश्तेदारों की है जो प्रभाव और पैसे से मंत्री के कारण इतने सम्पन्न हो चुके हैं कि उन्हें या उनसे मुकाबला कर पाना किसी के बस में नहीं है ऐसा शिकायतकर्ता का कहना है।
फर्जी दस्तावेज भी यदि लेकर जाएं तो उसके भी पक्ष को ध्यान में रखते हुए नहीं करते किसी को निराश?
पटना तहसील के तहसीलदार फर्जी दस्तावेज के आधार पर भी फैसला सुनाने के लिए तैयार रहते हैं, यदि कोई फर्जी दस्तावेज लेकर जाता है तो वह उससे अपनी बात बताते हैं और यदि वह मान जाता है उसे उसके हक में फैसला मिल जाता है, फैसला कब होगा कितनी जल्द होगा यह इस आधार पर तय होता है कि वह व्यक्ति जिसे अपने हक में फैसला चाहिए वह किस स्तर तक तहसीलदार की बातों से सहमत है,पटना तहसील एक फैसले बाद सुर्खियों में है और यह सुर्खियां अच्छे कामकाज या त्वरित निराकरण के आधार पर मिली सुर्खियां नहीं बल्कि यह तहसीलदार की कार्यप्रणालियों की सुर्खियां हैं। बताया जाता है कि पटना तहसीलदार को फैसले के दौरान फरियादी के वजन मापने की आदत है, जैसा जिसका वजन वैसा फैसला, ऐसा करने में उन्हें मजा आता है, बताया जाता है कि सब कुछ मजे के आधार पर होता है तहसील में। कौन वजनदार है कौन खाली है यह जांचकर तय किया जाता है कि किसे फैसले से खुश किया जाए। तहसीलदार वजन नहीं होने पर फैसले में रुचि भी प्रदर्शित नहीं करते हैं।

मंत्री के रिश्तेदार को खरीदनी थी जमीन इसलिए जल्दबाजी में तहसीलदार ने दिया फैसला?
जिस जमीन की बात हो रही है उसे मंत्री के रिश्तेदार को खरीदनी थी और उन्होंने ही खरीदी भी वहीं केवल इसलिए ही तहसीलदार ने जल्दबाजी में फैसला बिना आपत्ति स्वीकार किए सुना दिया। शिकायतकर्ता की माने तो वह जब वर्ष 2018 की असली वसीयत देकर नामांतरण का प्रयास कर रहा था तब तहसील कार्यालय से निर्णय नहीं आया वहीं जब मामले में मंत्री के रिश्तेदारों का हस्तक्षेप हुआ तहसीलदार ने तत्काल निर्णय उस व्यक्ति के पक्ष में दे दिया जो फर्जी वसीयत रखे हुए है,यह पटना तहसीलदार का ऐसा फैसला है जिसमें पैसे सहित प्रभाव का इस्तेमाल किया गया और जमीन मंत्री पिता पुत्र को मिल गई। प्रभाव सहित पैसे का खेल नहीं हुआ होता जमीन उसी की होती यह शिकायतकर्ता का कहना है। उसके अनुसार मामले में स्टेट हाइवे की जमीन की लक्ष्य थी मंत्री के रिश्तेदारों की जो उन्हें मिल गई पैसे सहित प्रभाव की ताकत से जिसमे वह हार गया और अपनी जमीन अब गंवा बैठा।
एक जमीन के दो वसीयत एक में हस्ताक्षर तो दूसरे में अंगूठा, एक शपथ आयुक्त, दूसरे में शपथ तक नहीं
इसी तारतम्य में शिकायतकर्ता ने दस्तावेज दिखाते हुए बताया कि मृतक गंगाराम ने अपने जीते जी 2018 में वसीयत बनाया जो शपथ के द्वारा सत्यापित है। जिसमें गंगाराम के नाम में दर्ज समस्त भूमि का प्लाट नंबर और खसरा नंबर के साथ उल्लेख है और इन तमाम भूमि को रोहित रजवाड़े के नाम किया गया। पर चौंकाने वाला तथ्य तब आया जब गंगाराम के मृत्यु 03.02.2023 में हुआ तो दूसरा दावेदार रमेश ने दावा किया कि उसके पास भी वसीयत है और गंगाराम ने उसे स्टेट हाईवे से लगा 20 डिसमिल का प्लॉट उसे दिया है। जब यह विवाद गहराया तो पूरा मामला पटना तहसील न्यायालय पहुंचा पर राजस्व में जैसा होता चला आ रहा है ठीक वैसा हुआ। जबकि प्रथम दृष्टि में दोनों वसीयत देखने पर पता लगता है कि 2018 में बना वसीयत सत्य के करीब है वहीं गंगाराम के ठीक मृत्यु के 3 दिन पहले बना वसीयत कई खामियां है। एक तो यह वसीयत बिना शपथ आयुक्त है सामान्य स्टांप में सिर्फ एक प्लाट की भूमि दर्ज है जो स्टेट हाईवे में है। और गंगाराम का यही वह जमीन है जो महंगी है। इस वसीयत के एक और बात मोटे तौर में समझ आई कि पूर्व के वसीयत में गंगाराम के हस्ताक्षर है तो मृत्यु के तीन दिन पहले बने वसीयत में अंगूठे का निशान है। इसी बात को शिकायतकर्ता रोहित ने बताया कि गंगाराम मृत्यु से पहले लकवाग्रस्त थे और उनका पूरा देखरेख मेरे द्वार किया जा रहा था। इस बीच रमेश ने एक बार भी घर नहीं आया तो कैसे गंगाराम मरने से पहले अंगूठा लगा सकता है जबकि वह अपने पूरे जीवनकाल में हस्ताक्षर किया। इन तमाम बातों को तहसीलदार ने नजरअंदाज किया और अंततः भूमि को रमेश के नाम कर भूमि विक्रय करने के मदद किया।
जब मृतक रहता था रोहित के साथ,2018 में लिख दी थी उसने वसीयत तो फिर रमेश मृत्यु से तीन दिन पहले कहां से लाया वसीयत?
मृतक भाई व भतीजे रोहित के साथ अंतिम साँस तक रहता था,उसकी सेवा पूरी तरह से रोहित और उसकी पत्नी किया करते थे,मृतक मृत्यु पूर्व लकवा ग्रस्त भी था और उससे मिलने अन्य कोई रिश्तेदार नहीं आता था। रोहित के अनुसार जिसके नाम जमीन हुआ है वह कभी भी मिलने से लेकर मृतक के क्रिया कर्म मे तक नहीं आया फिर तहसीलदार द्वारा कैसे दूसरे बने वसीयत को आधार मानकर जमीन उसके नाम किया गया। शिकायतकर्ता ने बताया मृतक गंगाराम ने तो एक वसीयत किया फिर कैसे दूसरा वसीयत आना और उसे वैध बतना बड़ा सवाल है। मृतक की पहली वसीयत सही और दूसरी वाली फर्जी है और संभवतः अंगूठा का निशान भी फर्जी हो सकता है ऐसा शिकायतकर्ता रमेश का कहना है,रमेश के अनुसार यह अन्याय है उसके साथ क्योंकि उसके पास की वसीयत ही असली है जिसे मानने से तहसीलदार पटना ने इनकार कर दिया है।


पंजीयक ने आपत्ति दर्ज करने की 250 की रशीद कटाई पर आपत्ति स्वीकार नहीं की…
किसी भूमि में विवाद की स्थिति हो या यह अंदेशा हो कि विवाद निराकरण से पहले भूमि का विक्रय हो सकता है तो आपत्तिकर्ता पंजीयक कार्यालय में अपना आपत्ति दर्ज कर सकता है और विक्रय होने वाले भूमि को क्रय विक्रय से रोका जा सकता है। उपपंजीयक कार्यालय में आपत्ति दर्ज करने का राशि देकर रसीद काट कर आपत्ति स्वीकार तो की जाती है पर आपत्ति मानी नहीं जाती। प्लाट नंबर 710/3 के क्रय विक्रय पर आपत्ति दर्ज करने के बाद भी बिना निराकरण आखिर कैसे हुआ इस भूमि का विक्रय? मामले में शिकायतकर्ता के अनुसार रजिस्ट्री के समय पंजीयक ने 250 की रसीद कटवाई और आपत्ति के अवसर की बात कही लेकिन जब आपत्ति दर्ज करानी चाही गई आपत्ति दर्ज नहीं की गई, पंजीयक के यहां भी सेटिंग होने की बात कहते हैं शिकायतकर्ता, अब शिकायतकर्ता कहां जाए जब उसे हर जगह निराशा ही हांथ लगती है। पंजीयक ने आपत्ति क्यों दर्ज नहीं की यह भी बड़ा सवाल है।
तहसीलदार का नाम सहित मंत्री के भाई का नाम न आए इसके लिए अखबार के कोरिया जिला प्रतिनिधि सहित कई प्रभावी लोग बचाव करते नजर आए
यह मामला दैनिक घटती-घटना कार्यालय तक पहुंची तो इस प्रकरण में शामिल लोगों ने कई अलग-अलग लोगों से फोन कराया गया की खबर का प्रकाशन न हो। कई महानुभाव ने कहा कि देख लो पर किसी ने यह नहीं बताया कि किसे देखना है तहसीलदार को? विक्रेता को? या फिर मंत्री का नाम न आए? भूमि रजिस्ट्री के साथ नामांतरण तो हो गया पर इस प्रकरण में यदि तहसीलदार का कोई लेना-देना नहीं तो उन्हें खबर से दूर रखने के लिए क्यों पैरवी हो रही है? कई ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं जिनसे यह कहलवा जा रहा है,खबर के प्रकाशन से पहले स्थानीय जिला प्रतिनिधि भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए उसी लाइन में खड़े हो गए,खबर स्थानीय जिला प्रतिनिधि सहित कई ऐसे व्यक्तियों का फोन आया जिन्होंने यह कहा कि देख लेना,प्रश्न यह कि आखिर किसे देखे? जो दिखा जो समझ आया कि जो न्याय के लिए पदस्थ है वह अपने काम में ईमानदार नहीं,यही प्रकरण किसी प्रभावी व्यक्ति का नहीं होता तो क्या यही तहसीलदार ऐसा काम करता? पटना तहसीलदार का यह फैसला सीधे तौर पर लाभ पहुंचाने के लिए किया गया फैसला है जो गलत के पक्ष में लाभ पहुंचाना साबित करता है। तहसीलदार ने सब कुछ जानते हुए भी जमीन का फैसला ऐसे व्यक्ति के पक्ष में सुनाया जो मृतक के अंतिम संस्कार में भी सभी मौके पर मौजूद नहीं था। भूमि रजिस्ट्री के साथ नामांतरण तो हो गया पर इस प्रकरण में यदि तहसीलदार का कोई लेना-देना नहीं तो उन्हें खबर से दूर रखने के लिए क्यों पैरवी हो रहा? कई ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति है जिनसे यह कहलवा जा रहा है। खबर के प्रकाशन से पहले कई व्यक्तियों का फोन आया उन्होंने यह कहा कि देख लेना। प्रश्न यह कि आखिर किसे देखे? जो दस्तावेज दिखा,शिकायतकर्ता ने बताया तो समझ आया कि जो न्याय के लिए पदस्थ है वह अपने काम में ईमानदार नहीं। यही प्रकरण किसी ऐसे व्यक्ति का होता जो न तो पैसा दे पता,न तो नेतागिरी तब क्या यही तहसीलदार ऐसा काम करता?
मामले से जुड़ा सवाल?
सवाल: जब मृतक गंगाराम ने दो वसीयत रखा तो किस आधार पर तहसीलदार ने मृत्यु के तीन दिन पहले वाला वसीयत को माना वैध?
सवाल: पांच साल पहले के वसीयत के आधार पर नाम परिवर्तन और फौती क्यों नहीं किया?
सवाल: एक वसीयत में हस्ताक्षर तो दूसरे में अंगूठा तहसीलदार ने कैसे जाना अंगूठा मृतक का है?
सवाल: पंजीयक के आपत्ति स्वीकार करने के बाद आखिर कैसे हुआ भूमि का विक्रय?
दैनिक घटती-घटना समाचार का परीक्षित स्वर और चेतावनी
यह रिपोर्ट आवेदक के दावों और स्थानीय स्रोतों पर आधारित है। दैनिक घटती-घटना की रिपोर्ट का उद्देश्य किसी व्यक्ति को बिना प्रमाण बदनाम करना नहीं है पर सार्वजनिक हित में यह आवश्यक है कि रेवेन्यू विभाग और शासन-स्तर पर यह स्पष्ट किया जाए कि क्या ऐसे आरोप सत्य हैं और किस तरह की सुधारात्मक कार्रवाई की जाएगी। जब तक त्वरित और पारदर्शी जांच नहीं होती,तब तक जमीन मालिकों का भरोसा बहाल नहीं हो पाएगा।


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