कोटेशन का पता नहीं पर बिल भुगतान होते गए, कुछ लोग तो ऐसे हैं जिन्हें भुगतान हुआ नहीं पर महाविद्यालय के कैश बुक में भुगतान दिख रहा है।
कैश बुक व स्टॉक रजिस्टर ऐसे लग रहे हैं कि रफ कॉपी के पन्ने हैं, जहां पाए वहां एंट्री कर दिए?
जिस दिन में बिल मंगाया…उसी दिन में आदेश हो गया…उसी दिन में ट्रेजरी चला गया और भुगतान भी हो गया…क्या दुकानदार सामान लेकर महाविद्यालय के बाहर खड़ा था?
महाविद्यालय के दस्तावेज चीख चीखकर यह बता रहे हैं की तत्कालीन सेवानिवृत्त प्रभारी प्राचार्य अखिलेश चंद्र गुप्ता ने अपने कार्यकाल में बड़ा भ्रष्टाचार किया है

-रवि सिंह-
कोरिया,26 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। अग्रणी महाविद्यालय बैकुंठपुर के सेवानिवृत्त प्राचार्य के 26 साल भ्रष्टाचार के लिए बेमिसाल यह कहना गलत नहीं होगा, क्योंकि जो दस्तावेज सूचना के अधिकार के तहत दैनिक घटती घटना के हांथ लगे हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि सिर्फ भ्रष्टाचार ही महाविद्यालय के सेवानिवृत प्रभारी प्राचार्य 26 सालों में किए हैं? रामानुज प्रताप सिंहदेव महाविद्यालय बैकुंठपुर के तत्कालीन सेवानिवृत्त प्रभारी प्राचार्य सिर्फ इमानदार अपने जुबान के हैं हरकतें उनकी पूरी बेइमानी की हैं, कुछ ऐसा ही अब उनके महाविद्यालय से जाने के बाद चर्चा है, जो जानकारी सूचना के अधिकार के तहत मिली है उसमें इतनी खामियां हैं कि उसकी यदि उच्च स्तरीय जांच कर दी जाए तो महाविद्यालय बैकुंठपुर के सबसे बड़े भ्रष्टाचार से पर्दा उठ जाएगा, जहां कैश बुक व स्टॉक रजिस्टर दिन व समय के साथ चलते हैं वहां उन रजिस्टरों को देखकर ऐसा लगता है कि वह कोई रफ कॉपी के पन्ने हैं जहां पाए वहां एंट्री कर दिया और खाना पूर्ति कर लिया, अनाप-शनाप खरीदी हुई और सब बिल फर्जी तरीके से लगाकर बिना कोटेशन के पैसे निकाल लिए गए, मजदूरी भुगतान भी फर्जी हस्ताक्षर पर दिए गए हैं यदि उन मजदूरों की खोजबीन हो जाए तो प्रभारी प्राचार्य कहां से ऐसे मजदूर लाएंगे यह भी बड़ा सवाल है, एक बिल तो ऐसा भी दिखा जिसे देखकर ऐसा लगा कि दुकानदार सामान लेकर महाविद्यालय के बाहर खड़ा था तुरंत आदेश हुआ तुरंत बिल लगा और तुरंत समान डिलीवर भी हो गया और महाविद्यालय के ट्रेजरी से उसका भुगतान भी हो गया सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि सारे भुगतान आखिर नकद में कैसे हो रहे थे, फर्म के खाते में भुगतान क्यों नहीं हो रहा था, सारे भुगतान कि यदि बात की जाए तो सभी भुगतान सिर्फ नगद में थे, कोई भी भुगतान अकाउंट ट्रांसफर या फिर संबंधित को नहीं किए गए जिससे खरीदी की गई। यहां तक की मरम्मत कार्य से लेकर सारी सामग्री के पैसे महाविद्यालय के कैश बुक से नगद में दिए गए कहीं पर भी ना तो चेक का उपयोग हुआ ना आरटीजीएस हुआ और ना ही ट्रांसफर की प्रक्रिया आजमाई गई, क्या यह नगद लेनदेन वह भी शासकीय पैसों का सही था? लगभग शासकीय पैसे का लेनदेन अकाउंट ट्रांजैक्शन पर ही सही माना जा रहा है फिर महाविद्यालय नगद में कैसे चल रहा था, इसके पीछे भ्रष्टाचार की बहुत बड़ी बु आ रही है पर इसकी जांच करेगा कौन या तो अब इस जांच के लिए सूचना के अधिकार से मिले दस्तावेजों को लेकर न्यायालय जाना पड़ेगा या फिर क्या विभाग खुद इस मामले की जांच कर कर इस पर एफआईआर दर्ज कराएगा?

जितनी मिट्टी की ढुलाई का भुगतान हुआ है उतने में तो पूरा कॉलेज ही फीलिंग हो जाता पर आखिर मिट्टी गई कहां
महाविद्यालय में मिट्टी पटाई के नाम पर भी भुगतान किया गया है,यह मिट्टी कहां डाली गई इसका पता नहीं लेकिन लाखों रुपए अर्थ फिलिंग के नाम पर आहरित किए गए। जितने रुपयों की मिट्टी महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य ने ढुलाई कराई उतने में तो पूरा महाविद्यालय ही पट जाता ऐसा कहना गलत नहीं होगा, वैसे यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि यह राशि केवल इसलिए मिट्टी ढुलाई के नाम से दिखाई गई क्योंकि यह भ्रष्टाचार का सबसे आसान तरीका होता है जब मिट्टी के नाम पर शासकीय राशि निकाली जाती है, मिट्टी पाटने के नाम पर इसलिए भी बिल लगाए जाते हैं क्योंकि इसके लिए जांच में तथ्य सामने नहीं आते और कभी भी इस तरह के मामले से बच निकलना आसान होता है, बताया जाता है कि मिट्टी की आवश्यकता महाविद्यालय परिसर में नहीं के बराबर होती थी फिर भी उसके नाम पर पैसे निकाले गए जो कहीं न कहीं तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य की जेब में गए। वैसे भ्रष्टाचार का गढ़ बना हुआ था 26 साल तक जिले का अग्रणी महाविद्यालय जहां मिट्टी तक के नाम पर भ्रष्टाचार किया गया है।
शासकीय कैश बुक व स्टॉक रजिस्टर क्या सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य के लिए रफ कॉपी थे?
अग्रणी महाविद्यालय के कैश बुक और स्टॉक रजिस्टर को देखकर केवल यही आभास होता है कि वह रफ कापी मात्र थे तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य की नजर में। कैशबुक और स्टॉक रजिस्टर को क्या वह सच में रफ कॉपी मानते थे, दोनों पंजीयों को देखकर यह कहना गलत नहीं होगा, दोनों पंजीयों का रखरखाव रफ कॉपी जैसा किया गया है उनके कार्यकाल में,जहां मन किया एंट्री कर दी गई ,जहां मन किया कुछ भी लिख दिया गया,एक उच्च शिक्षण संस्थान में पंजीयों के रखरखाव के लिए क्या कोई दिशानिर्देश जारी नहीं होते क्या कोई ऐसा प्रशिक्षण नहीं होता जिससे पंजीयों का सही संधारण किया जाए। अग्रणी महाविद्यालय के मामले में ऐसा ही लगता है,वैसे एक छोटे से छोटे कार्यालय में भी अभिलेखों पंजीयों के संधारण के लिए प्रशिक्षण होता है और उनके संधारण का परीक्षण भी होता है,क्या उच्च शिक्षण संस्थान होने के बावजूद ऐसा महाविद्यालय विषय में नहीं पालन होता था। अग्रणी महाविद्यालय के पंजियों को देखकर यही लगता है कि केवल अपने अनुसार वहां पंजीयो का संधारण तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य किया करते थे जिसमें किसी भी प्रकार का जांच कभी होना नहीं था यह उन्हें ज्ञात था।
5000 से ऊपर की खरीदी आखिर बिना कोटेशन के कैसे की गई?
सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारियों के अनुसार यह देखने में आया कि भंडार क्रय नियम का पालन अधिकांश समय नहीं किया गया जब खरीदी की गई,शासकीय विभागों में कार्यालयों में खरीदी के समय भंडार क्रय नियम का पालन करना अनिवार्य होता है और यह नियम खरीदी में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए होता है, 5000 से अधिक राशि की खरीदी के लिए बाकायदा कोटेशन निकालने का नियम होता है और कोटेशन के आधार पर ही कम राशि में सामग्री प्रदान करने के वचन के साथ कोटेशन डालने वाले फर्म को खरीदी के लिए चयनित किया जाता है, बैकुंठपुर के अग्रणी महाविद्यालय के कैशबुक और स्टॉक पंजी के अनुसार जो सूचना के अधिकार अधिनियम अंतर्गत प्राप्त किए गए हैं को देखने के बाद यह पता चलता है कि 26 साल तक महाविद्यालय में प्रभारी प्राचार्य रहे तत्कालीन प्राचार्य ने भ्रष्टाचार करने के लिए भंडार क्रय नियम का कहीं पालन नहीं किया और उन्होंने कई बार 5000 से अधिक राशि की खरीदी बिना कोटेशन आमंत्रित किए की है। अब ऐसी छूट उन्हें क्या उच्च शिक्षा संस्थान के बड़े कार्यालयों से मिली हुई थी यह बड़ा सवाल है।
सारे कैश बुक व स्टॉक रजिस्टर को देखने के बाद बहुत बड़ी वित्तीय अनियमितता दिख रही है
सूचना के अधिकार अधिनियम अंतर्गत महाविद्यालय के कैशबुक और स्टॉक पंजी की सत्यापित छायाप्रति दैनिक घटती घटना को प्राप्त हुई है,छायाप्रति को देखकर केवल यही कहा जा सकता है कि 26 साल तक एक प्रभारी प्राचार्य ने अपने ही गृह नगर के उस महाविद्यालय को अपने लिए भ्रष्टाचार का चारागाह बनाए रखा जहां उसी के क्षेत्र के छात्र छात्राएं उच्च शिक्षा के लिए आया करते थे, अभिलेख और पंजियाँ चीख चिखकर यह कह रही है कि बड़े स्तर पर अनियमितता की गई है बड़ा भ्रष्टाचार किया गया है। अपनी जेब भरने के लिए तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य ने हर स्तर कर जाकर भ्रष्टाचार किया है। वैसे कोई ऐसा व्यक्ति ऐसा करता जो इस शहर या क्षेत्र का नहीं होता समझ में आता ऐसा उसने किया है जो यहीं का निवासी है और जिसने कहीं न कहीं घर में ही सेंध लगाने का काम किया है।
क्या इतने समाचार प्रकाशित होने के बाद उच्च शिक्षा विभाग इस मामले पर कोई कठोर कार्यवाही या जांच करेगा?
दैनिक घटती घटना ने कोरिया जिले के अग्रणी महाविद्यालय के 26 साल तक प्रभारी प्राचार्य की भूमिका निभाने वाले वर्तमान में सेवा निवृत्त प्रभारी प्राचार्य के 26 सालों के भ्रष्टाचार को लगातार कई समाचारों के माध्यम से उजागर किया है, भ्रष्टाचार जो उजागर किया गया है उससे भी बड़ा है ऐसा बताया जाता है जो केवल किसी विधिवत जांच उपरांत ही सामने आ सकता है,और यह जांच कोई समाचार पत्र नहीं कर सकता वह केवल सच्चाई सामने ला सकता है शेष काम शासकीय संस्था के विभाग का है,अब सवाल यह है कि क्या उच्च शिक्षा विभाग पूरे मामले में जांच दल गठित कर विधिवत जांच करता है और जांचकर क्या वह कार्यवाही करता है? जांच और कार्यवाही का अधिकार इस मामले में उच्च शिक्षा विभाग का है और यदि वह मौन रह जाता है और जांच नहीं होती है तो यह मानना गलत नहीं होगा कि मामला हिस्सेदारी का है और जांच और कार्यवाही होना असंभव है।
क्या जीपीएफ के पैसे का भुगतान करने से पहले प्राचार्य के कार्यकाल की जांच होगी?
26 साल तक अपने गृह नगर के महाविद्यालय को दीमक की तरह खोखला करने वाले वर्तमान में सेवानिवृत्त प्रभारी प्राचार्य के जीपीएफ के पैसे का भुगतान उच्च शिक्षा विभाग को करना है, अब देखना है कि क्या भुगतान से पहले उनके कार्यकाल के वित्तीय मामलों की जांच उच्च शिक्षा विभाग करता है,क्या वह जांच कर कार्यवाही करते हुए उनके दोषी पाए जाने पर जीपीएफ भुगतान को रोकता है?
खरीदी में नहीं हुआ नियमों का पालन
बड़े राशि की खरीदी करने पर भण्डार क्रय नियम पालन करते हुए समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करना पड़ता है, लेकिन डॉ. ए.सी. गुप्ता द्वारा टुकड़ों में खरीदी की गई है।शासन के नियमानुसार 5000 से अधिक का भुगतान वेण्डर पेमेन्ट किया जाता है, लेकिन अखिलेश गुप्ता द्वारा जनवरी माह में अनुरक्षण के बिलों में 1.50 लाख तक के बिलों को अपने खातों में लिया गया है एवं भुगतान नहीं किया गया है। एक बिजली दुकानदार का कहना है कि सामान तो हमने दिया है लेकिन पैसा हमें नहीं मिला, सेवा निवृत्त के समय कहा गया था कि- पत्नी प्रीति गुप्ता प्राचार्य बनेगी तो आपकी राशि एडजस्ट हो जाएगी, लेकिन उनका लगभग 1.50 लाख का भुगतान आज दिनांक तक नहीं हुआ है। बिल देखने पर स्पष्ट हो जाएगा कि राशि प्राचार्य के खाते में आया है ,यदि नगद दिया गया है तो बिल में पावती क्यों नहीं है।
कोरोना कल में महाविद्यालय बंद फिर भी हुई खरीदी
कोरोना काल में जब विद्यालय एवं महाविद्यालय बन्द थे तब भी अखिलेश गुप्ता द्वारा लैब का सामान, मजदूरी कार्य, फर्नीचर आदि की खरीदी के बिल लगाए जा रहे थे। नए महाविद्यालय नागपुर में भी कोरोना काल में खरीदी की गई, जबकि उस समय स्वयं का भवन भी नागपुर महाविद्यालय के पास नहीं था। आई. टी. में सभी बिल उन्हीं के एक रिश्तेदार गुप्ता जी के लगे हुए है। शायद बैकुण्ठपुर में कम्प्यूटर का एक ही दुकान होगी। आरटीआई में हुआ उल्लेख कि बिना स्टॉक एवं बिना डिस्पेज के भी बहुत सारे राशि का आहरण किया गया है। यह आपदा में अवसर का भी मामला है जब सरकार और लोग परेशान थे जान बचाने की चिंता थी तब तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य आहरण कर खरीदी कर रहे थे।
शासकीय राशि का नगद भुकतान क्यों
किसी भी शासकीय भुगतान की एक प्रकिया होती है और प्रायः नकद की जगह बैंकों के माध्यम से भुगतान का नियम है, मनरेगा में भी जहां मजदूरी भुगतान मजदूर के खाते में किया जाता है वहीं डॉ0 गुप्ता द्वारा महाविद्यालय के लाखों रूपये मजदूरी के नाम पर नगद निकाला गया है। सबसे बड़़ी एवं आश्चर्यजनक बात कि- ऑर्डर जिस दिन दिया गया है, उसी दिन सामग्री भी सप्लाई हुआ एवं बिल का दिनांक भी वही है और जिला कोषालय में बिल बनकर लगने की तिथि भी वही है। मतलब ऐसा सामान तो आसानी से राज्य स्तर पर मिलना मुश्किल है ऐसा सामान ऑर्डर के दिन ही उपलब्ध हो जाना कई सन्देह को जन्म देता है। जनवरी 2025 के सामानों का भुगतान किया गया है लेकिन कई बिलों में स्टॉक तक इण्ट्री नहीं है। जिसके कारण माह- जनवरी 2025 में लगभग 40 लाख रूपये की खरीदी की गई है। कोरिया जिला बाकी जिलों की तुलना में काफी छोटा जिला है, लगभग डेढ़ ब्लॉक का जिला है। ऐसे में इस छोटे से जिले के उन सभी कॉलेजों में जिनमें डॉ0 गुप्ता रहे है वहां बहुत ज्यादा फण्ड आया है, इतना फण्ड तो राजधानी के महाविद्यालय में भी नहीं आता है। यह भी एक जांच का विषय है।
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