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कोरिया@दान की भूमि पर बने विद्यालय के क्रीड़ा परिसर में ग्रामीणों का अवैध अतिक्रमण क्यों ?

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कोरिया,19अगस्त 2025 (घटती-घटना)। सकीय भूमि पर अवैध कब्जा अक्सर देखने सुनने को मिल जाता है। रसूखदार राजस्व विभाग के कर्मचारियों अधिकारियों से मिली भगत कर कई बार शासकीय भूमि को निजी भूमि के रूप में दर्ज करा लेते हैं,तो कई बार बिना निजी स्वामित्व प्राप्त किए बगैर ही सालों-साल कब्जा बनाए रखते हैं। कमोवेश यह स्थिति हर स्थान पर देखने को मिलती है,परंतु अवैध कब्जे, अवैध अतिक्रमण और अवैध नामांतरण अक्सर उन्हीं शासकीय संपदाओं का होता है,जिसकी निगरानी नहीं हो पाती। परंतु शासकीय संपदा यदि किसी व्यक्ति, निकाय या संस्था की निगरानी में हो और उस पर अवैध अतिक्रमण की घटना हो, तो यह बड़ी ही चिंता जनक बात है। और उस पर यह की निगरानीशुदा व्यक्ति को अवैध अतिक्रमण करने या बेजा इस्तेमाल करने वाले जब धमकी देने लगें, उल्टी शिकायत करने लगें, तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। ताजा मामला कोरिया जिले के बैकुंठपुर विकासखंड अंतर्गत शासकीय प्राथमिक पाठशाला खुटरापारा ग्राम पंचायत कसरा का है, जहां विगत 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस को विद्यालय के खेल मैदान की भूमि पर अवैध अतिक्रमण और बेजा इस्तेमाल करने से विद्यालय के शिक्षकों द्वारा ग्रामीणों को मना करने पर विवाद की स्थिति निर्मित हो गई। और मामला थाने तथा जिला कलेक्टर तक पहुंच गया।
ज्ञातव्य हो कि शासकीय प्राथमिक शाला खुटरापारा ग्राम पंचायत कसरा में शाला भवन और खेल मैदान के लिए शासकीय भूमि उपलध न होने पर ग्राम के ही स्वर्गीय सोनसाय के द्वारा लगभग 50 डिसमिल की भूमि दान की गई है, जिस पर विद्यालय भवन निर्मित है। और पीछे की ओर खेल का मैदान है। इस मैदान पर लंबे समय से कुछ ग्रामीण अपने मवेशियों को बांधने का कार्य करते आ रहे हैं। हद तो तब हो गई जब इस बार एक ग्रामीण ने विद्यालय के खेल मैदान की भूमि पर सब्जी की फसल लगा दी और लकड़ी के लठ रख दिए, जबकि मवेशियों को बांधने का कार्य तो पूर्व से ही चला आ रहा था। शिक्षकों द्वारा कई बार इस कृत्य को करने से मना किया गया और लकड़ी के लठ को हटाने के लिए निर्देशित किया गया, ताकि खेल मैदान में बच्चों के साथ किसी प्रकार की कोई दुर्घटना घटित न होने पाए। परंतु ग्रामीणों द्वारा विद्यालय में पदस्थ शिक्षकों की बात अनसुनी कर दी गई। विगत 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस को जब राष्ट्रीय पर्व मनाने विद्यालय के शिक्षक, छात्र समेत पंचायत के जनप्रतिनिधि और ग्रामीण जनता उपस्थित थी, तो इस मामले को शिक्षकों ने पुनः सब के समक्ष उठाया और कहा कि भूमि विद्यालय के बच्चों के खेलकूद के लिए आरक्षित है,अतः इस पर अवैध अतिक्रमण न किया जाए। जो मवेशी यहां बांधे जाते हैं उन्हें अन्यत्र व्यवस्थापित किया जाए, जो लकड़ी ग्रामीणों द्वारा रखी गई है, उसे हटा दिया जाए, ताकि कोई छात्र चोटील ना हो और सजी की फसल जिस ग्रामीण द्वारा लगाई गई है, उसे भी भविष्य के लिए ऐसा करने से मना किया जाए। इस पर एक ही समाज के कुछ ग्रामीण भड़क गए और शिक्षकों पर स्वतंत्रता दिवस के दिन अपमान का आरोप लगाते हुए विद्यालय परिसर में घुसकर शिक्षकों के साथ अनर्गल बहसबाजी करते हुए धमकाने लगे कि, पहले के शिक्षकों को कोई परेशानी नहीं होता था। अब आप लोग यहां नवीन पदस्थापना लिए हैं, तो आप लोगों को ज्यादा परेशानी हो रहा है, दूसरे जगह से यहां आकर ड्यूटी कर रहे हैं, हमारे हिसाब से रहें, नहीं तो आप सभी को हटवा देंगे। इसको लेकर विद्यालय के शिक्षकों ने अप्रिय घटना होने के अंदेशे में थाना पटना में एक आवेदन प्रस्तुत किया है, और आवश्यक कार्यवाही की मांग की है।
विद्यालय में पदस्थ शिक्षकों का ग्रामीणों ने ट्रांसफर कराने की दी धमकी…कलेक्टर से की शिकायत
सार्वजनिक कार्यक्रम में एकत्रित भीड़ के सामने अवैध अतिक्रमण न करने की हिदायत देना,पशुओं को अन्यत्र विस्थापित करने की बात करना और विद्यालय के खेल परिसर को मुक्त करने के लिए कहना शिक्षकों पर ही भारी पड़ गया। और जिन लोगों ने विद्यालय के खेल मैदान पर अवैध उपयोग की नियत बना रखी है,उन्होंने एकजुट होकर विद्यालय परिसर में घुसकर शिक्षकों पर ही स्वतंत्रता दिवस के दिन अपमान का आरोप लगाते हुए बहसबाजी शुरू कर दी। और शिक्षकों के अन्यत्र स्थानांतरण को लेकर धमकी भी देने लगे। बात यहीं तक नहीं रुकी,बल्कि ग्रामीणों द्वारा एक राय होकर जिला कलेक्टर के समक्ष विद्यालय के शिक्षकों द्वारा राष्ट्रीय पर्व के दिन अपमानित करने का आरोप लगाकर अन्यत्र स्थानांतरण एवं उचित कार्यवाही की शिकायत भी कर दी गई। मामले की जब पड़ताल की गई तो यह बात सामने आया कि वास्तव में शिक्षकों ने खेल मैदान को स्वतंत्र करने की बात कही थी, जो कुछ ग्रामीणों को नागवार गुजरी। क्योंकि इसके पूर्व विद्यालय में पदस्थ शिक्षकों ने खेल मैदान के निजी उपयोग के लिए किसी ग्रामीण को टोका टाकी नहीं की थी। और यही बात ग्रामीणों को नागवार गुजरी, जिससे शिकायत की नौबत आ गई।
विद्यालय की शासकीय भूमि पर अवैध अतिक्रमण का यह अकेला मामला नहीं, कई स्थानों पर दबंग और ग्रामीण हैं अवैध काबिज
जिले में विद्यालयों के नाम पर दर्ज भूमि और खेल मैदान पर अवैध अतिक्रमण और कब्जे का यह कोई इकलौता और नया मामला नहीं है। कमोवेश अधिकांश स्थान पर यही स्थिति है, कि जितना रकबा विद्यालय के नाम पर दर्ज है,उसमें से अधिकांश रकबे पर ग्राम के ही रसूखदारों और ग्रामीणों ने या तो अवैध कब्जा बनाए रखा है,या निजी उपयोग में इस्तेमाल कर रहे हैं। यदि राजस्व विभाग द्वारा विद्यालयों के नाम पर दर्ज शासकीय भूमियों का सीमांकन किया जाए तो दर्जनों ऐसे मामले आसपास ही मिल जाएंगे,जिनमें शासकीय भूमियों पर अवैध अत्तिक्रमण पाया जाएगा। इन सभी भूमियों के संरक्षक और संरक्षण की जिम्मेदारी विद्यालय में पदस्थ कर्मचारियों की होती है। परंतु अधिकांश स्थानों पर विद्यालय में पदस्थ कर्मचारी जो की सामान्यतः बाहरी होते हैं, वह ग्रामीणों का विरोध झेलना नहीं चाहते। और इसी कारण से यह कर्मचारी ग्रामीणों का विरोध नहीं करते और लोगों की मनमानी चलती रहती है। आलम यह है कि पर्याप्त भूमि होते हुए भी अधिकांश विद्यालयों के पास सर्व सुविधायुक्त खेल का मैदान नहीं होता, क्योंकि विद्यालय के समय के उपरांत वह भूमि उस ग्राम के ग्रामीणों के विभिन्न प्रयोजनों के लिए उपयोग में आती है। प्रायः देखा यह गया है कि अधिकांश स्थानों पर ऐसी भूमि गोचर के रूप में परिवर्तित हो जाती है,जहां मवेशी बांधने एवं चराए जाते हैं। और यही सबसे बड़ा कारण है कि विद्यालय परिसर में पर्याप्त भूमि होने के बाद भी वृक्षारोपण तो हर वर्ष होता है,परंतु पौधे कभी वृक्ष बन नहीं पाते।


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