- सेवानिवृत होने के 6 महीने बाद उन्हें कैश बुक का ऑडिट करने की याद आई अब वर्तमान प्राचार्य से मांग रहे अनुमति…
- सेवानिवृत होने के दिन भी उन्होंने खर्च किए 98 हजार,कैश बुक में है काफी वित्तीय अनियमितता जांच की उठ रही मांग…
- कैश बुक में जहां एंट्री आगे बढ़ता है वहां उनकी एंट्री पीछे भी देखने को मिली
- 2023 में 2022 का भी भुगतान देखने को मिला आखिर कैश बुक कौन हैंडल कर रहा था?
- क्या सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य कैश बुक अपने पास रखते थे और खुद उसे भरते थे क्या यह काम भी उन्हीं का था?
- राजनीति और भ्रष्टाचार का केंद्र बन गया है शासकीय अग्रणी महाविद्यालय: शारदा गुप्ता
- भाजपा नेता शारदा गुप्ता ने मुख्यमंत्री,समेत अन्य अधिकारियों को लिखा पत्र
- 6 साल तक महाविद्यालय के कैश बुक का नहीं हुआ ऑडिट और ना ही ऑडिट रिपोर्ट हुआ जमा

-रवि सिंह-
कोरिया,05 अगस्त 2025 (घटती-घटना)। शासकीय रामानुज प्रताप सिंहदेव अग्रणी महाविद्यालय बैकुंठपुर के सेवानिवृत्त प्रभारी प्राचार्य की वित्तीय अनियमितता सामने आई है,सूचना के अधिकार के तहत मिले कैश बुक में इतनी अनियमिताएं हैं कि उसकी जांच हो जाए तो कार्यवाही होना तय है,वित्तीय अनियमितताओं में यह भी देखा गया कि कैश बुक में तीन-चार साल से बैंक/ट्रेजरी टोटल ही नहीं हुआ है,क्या सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य के पास कैलकुलेटर नहीं था जिस वजह से वह टोटल नहीं कर पाए? सूत्रों का यह भी कहना है कि कैश बुक सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य ही रखते थे और स्वयं ही भरते थे, क्या यह काम भी प्रभारी प्राचार्य का है या फिर कार्यालय के किसी बाबू का? क्या प्रभारी प्राचार्य का काम भी है कैश बुक लिखना? कैश बुक में इतना कटपिट है कि ऐसा लग रहा है कि कैश बुक में फर्जीवाड़ा करने का प्रयास किया गया है, सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि 6 सालों में कैश बुक का ऑडिट नहीं करवाया गया और ना ही उच्च शिक्षा विभाग ने इसकी ऑडिट रिपोर्ट इन से मांगी,जबकि ऑडिट रिपोर्ट हर साल होना अनिवार्य है 6-7 सालों तक ऑडिट रिपोर्ट क्यों नहीं करवाई गई यह भी बड़ा सवाल है, कहीं ना कहीं कैश बुक को देखकर यह आभास होता है कि इस कैश बुक में काफी झोलझाल है यदि इस कैश बुक की जांच सूक्ष्मता से हो जाए तो वित्तीय अनियमितता जरूर मिलेगी। सूचना के अधिकार के तहत पीडी कैश बुक की जो जानकारी हाथ लगी है उसे देखकर व अवलोकन करने के बाद ऐसा लग रहा है की वित्तीय अनियमितता भी महाविद्यालय में जमकर हुई है, पीडी कैश बुक एवं जनभागीदारी कैश बुक महाविद्यालय में लिपिक होने के बाद भी प्राचार्य डॉ. अखिलेश चंद्र गुप्ता खुद अपने पास रखते थे और स्वयं कैश बुक को लिखते थे,अब महाविद्यालय का प्राचार्य ही यदि कैश बुक लिखेगा तो फिर लिपिक का वहां पर क्या काम है? क्या ऐसा वित्तीय अनियमितता करने के लिए किया गया था? कैश बुक में यह भी देखा गया कि लगभग 4 वर्षों से कैश बुक में बैंक व ट्रेजरी टोटल नहीं है,क्या टोटल करने के लिए उनके पास कैलकुलेटर उपलध नहीं थे या फिर टोटल करना नहीं चाह रहे थे? सीधे सेवानिवृत्त होने के बाद ही वह टोटल होगा और सेवानिवृत होने के बाद भी टोटल नहीं हुआ और अब उसके लिए अनुमति क्यों मांगी जा रही है? जब आपको पता था कि आपकी सेवानिवृत्ति की तिथि क्या है फिर भी आपने सेवानिवृत्ति के अंतिम महीने में भी ना तो कैश बुक का ऑडिट कराया और ना ही अपने ट्रेजरी बैंक का टोटल कराया और कैश बुक आखिर यह क्यों लिख रहे थे यह सबसे बड़ा सवाल है उच्च शिक्षा विभाग के लिए? यहां तक की सेवानिवृत होने के बाद भी कैश बुक पूर्ण नहीं था जब लिपिक को कैश बुक लिखने को मिला तो उसने भी पुराने कैश बुक को छोड़कर नए कैश बुक में एंट्री करना शुरू किया, क्योंकि पुराना कैश बुक समझना किसी के बस की बात नहीं यह सिर्फ जांच में ही समझा जा सकता है।
26 साल भ्रष्टाचार की मिसाल?
दो चरण में सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य 26 साल बैकुंठपुर महाविद्यालय का प्रभार संभाला, इनकी नौकरी में से 26 साल सिर्फ बैकुंठपुर महाविद्यालय के प्रभार में निकल गया, इस बीच नवीन महाविद्यालय का भी प्रभार इनके पास रहा इनका इतिहास काफी लंबा है 26 साल में कई सरकारे आई और गई पर प्रभारी प्राचार्य अखिलेश चंद्र गुप्ता फेवीम्कि की तरह प्रभारी प्राचार्य की कुर्सी पर चिपके रहे,महाविद्यालय की स्थापना 1982 में हुई थी महाविद्यालय की स्थापना के 43 साल हो चुके हैं इस 43 साल में इस महाविद्यालय में इनके अलावा सिर्फ आठ लोगों ने ही यहां के प्राचार्य बने का सौभाग्य हासिल कर पाया, महाविद्यालय के 43 साल में से 26 साल सिर्फ अखिलेश चंद्र गुप्ता के रहे जो भ्रष्टाचार की मिसाल बन सकते है ऐसा अब कहा जाने लगा है,उनके पूर्व कोई भी प्राचार्य एक साल से 2 साल इस महाविद्यालय में नहीं रहा,अखिलेश चंद्र गुप्ता ही ऐसे इकलौते महापुरुष प्राचार्य हैं जिन्होंने दो चरण में अपने 26 साल पूरा किया, पहले चरण इनका 1997 से 2009 तक रहा यानी की 12 साल, दूसरा चरण 2 साल बाद फिर मिला 2011 से 2025 तक जो महाविद्यालय के प्राचार्य के कुर्सी पर सुशोभित रहे 14 साल और इन्हें प्राचार्य बनने का मौका मिला, यानी की 26 साल इन्हें महाविद्यालय के प्राचार्य बने का मौका मिला। लगभग अपनी 30 से 35 साल की नौकरी में 26 साल बैकुंठपुर महाविद्यालय का प्रभारी प्राचार्य बनकर बिता दिया,यह 26 साल इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है इतना लंबा कार्यकाल इस महाविद्यालय में किसी भी प्राचार्य का नहीं रहा और आगे भी नहीं रहेगा,अधिकतम 3 वर्ष ही कोई भी प्राचार्य यह रहे, इन से पहले सिर्फ 10 लोगों को ही यह मौका मिला। क्या यह 26 साल इस महाविद्यालय में भ्रष्टाचार के लिए था?
26 साल एक ही जगह पर पदस्थ होकर इन्होंने उच्च शिक्षा विभाग को ठेंगा दिखाया?
ट्रांसफर नीति भी इसीलिए बनी है कि कोई भी एक जगह पर बैठकर अनियमितता न फैल सके इसलिए ऐसे पदों पर 3 साल से अधिक नहीं रखा जाता है किसी को भी पर सवाल यह उठता है कि आखिर 26 साल एक ही जगह एक ही कॉलेज पर अखिलेश चंद्र गुप्ता को कैसे रहने की अनुमति मिली? वह भी वहां पर जहां पर वित्तीय अनियमितता का खतरा रहता हो। देखा जाए तो अखिलेश चंद गुप्ता अपने पहुंच पकड़ से उच्च शिक्षा विभाग को भी ठेंगा ही दिखाई, कोई भी उनका स्थानांतरण नहीं कर पाया सरकार कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा की सभी के कार्यकाल में उन्होंने अपना दबदबा बनाए रखा, सेवानिवृत होने के बाद उनकी वही आदत देखने को मिली कि उनसे बड़ा कोई नहीं है,महाविद्यालय में गए और अनाधिकृत होने के बावजूद भी अपने सामने खड़े होकर कर्मचारियों से ही दस्तावेज आग के हवाले करवा दिया पर किसी में हिम्मत नहीं है की कार्यवाही कर सके? देखा जाए तो उच्च शिक्षा विभाग को भी वह कुछ नहीं समझते हैं यह साफ है।
जिन पदों पर 3 साल से अधिक नहीं रहना चाहिए उस पद पर 26 साल कैसे रहे अखिलेश चंद गुप्ता?
सभी विभागों में 3 साल में ट्रांसफर हो जाता है पर इतने बड़े महाविद्यालय में 26 साल तक एक ही व्यक्ति एक ही पद पर पदस्थ रहा किसी ने भी उसका स्थानांतरण करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, क्या 26 साल इसीलिए दिया गया कि वह महाविद्यालय में जमकर अनियमित फैला सके भ्रष्टाचार कर सके? क्या 3 साल वाली पॉलिसी उनके लिए खत्म कर दी गई तमाम तरह के सवाल है पर इस सवाल का जवाब शायद उच्च शिक्षा में बैठे जिम्मेदार भी ना दे पाए।
कैश बुक में काट छांट इतना ज्यादा क्यों हुआ है?
कैश बुक में इतनी ज्यादा काट छांट है कि उसे देखकर लगता है कि कोई अनाड़ी ही इस कैश बुक को भर रहा था और कैश बुक को भी वह निष्पक्ष रूप से नहीं भ्रष्टाचार की तरह से भर रहा था,जबरदस्ती में पैसे मिलने के लिए अनाप-शनाप बिल लगाए गए है, बिल आगे पीछे भी एंट्री हो गए हैं आखिर ऐसा क्यों हुआ है यह भी जांच का विषय है पर अब जांच कब होगी कौन करेगा यह भी देखने वाली बात होगी, वैसे वर्तमान प्राचार्य उनके सहयोगी की तरह दिख रहे हैं उनके नीचे काम करने की वजह से वह उनके गलत कामों का विरोध नहीं कर पा रहे हैं यह भी देखने में समझ में आ रहा है।
क्या कैश बुक को इसलिए कंप्लीट नहीं किया गया ताकि वित्तीय अनियमितता और किया जा सके?
कैश बुक स्वयं भरने वाले सेवानिवृत्ति प्रभारी प्राचार्य सेवानिवृत होने से पहले कैश बुक को भी कंप्लीट नहीं कर पाए और आधा-अधूरा ही छोड़ दिया, कैश बुक देना भी नहीं चाह रहे थे पर दबाव पूर्वक उन्हें कैश बुक देना पड़ा और उसमें कई सारी कमियां देखने में सामने आई है पर उसके जांच की मांग उठ रही है जांच कब और कैसे होगी यह देखने वाली बात है, क्या यही वजह थी कि अखिलेश चंद्र गुप्ता अपनी पत्नी को इस महाविद्यालय का प्रभारी प्राचार्य बनाना चाह रहे थे कि उन्हें कैश बुक को ठीक-ठाक करने का मौका मिल जाएगा और 6 साल का ऑडिट एक साथ करवा लेंगे और जो भी फर्जीवाड़ा किए हैं उस पर वह पर्दा डाल देंगे?
शारदा ने शिकायती के माध्यम से भ्रष्टाचार की जांच कर दोषियों पर तत्काल कार्यवाही कर महाविद्यालय में स्थायी प्राचार्य की नियुक्ति की मांग की है
कोरिया जिला मुख्यालय स्थित अग्रणी महाविद्यालय इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है जिसमें पूर्व प्राचार्य द्वारा दस्तावेज जलाए जाने की खबरें प्रकाशित की गई हैं। जिसे लेकर भाजपा नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता शारदा प्रसाद गुप्ता ने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय समेत सचिव उच्च शिक्षा विभाग,कुलपति गहिरा गुरु विश्वविद्यालय एवं कलेक्टर कोरिया को पत्र लिखकर समस्त मामले की जानकारी दी,साथ ही उन्होंने एक उच्च स्तरीय जांच समिति बनाकर पिछले पंद्रह वर्षों के दस्तावेजों का सत्यापन,क्रय सामग्रियों,उनके व्यय और भंडारण का भौतिक सत्यापन किए जाने की मांग की है। साथ ही उन्होंने महाविद्यालय हेतु स्थाई प्राचार्य की नियुक्ति के लिए भी आग्रह किया है। मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र में उन्होंने कहा है कि महाविद्यालय में प्रोफेसरों के मध्य प्राचार्य के प्रभार को लेकर राजनीति चरम पर पहुंच चुकी है। आपसी खींचतान के कारण लंबे समय से महाविद्यालय में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों के द्वारा किए गए बड़े आर्थिक भ्रष्टाचार की कहानियां जनसामान्य के बीच व्याप्त हो रही हैं। पिछले पंद्रह बीस सालों में जिस प्रकार से महाविद्यालय में अनियमितताओं की वृद्धि हुई है वह अत्यंत चिंतनीय है साथ ही अग्रणी शासकीय महाविद्यालय के शैक्षणिक स्तर का ख़राब होना भी चिंता का विषय है। इसके अतिरिक्त पूर्व प्राचार्य अखिलेश गुप्ता द्वारा अपने कार्यकाल में कोरिया जिले के विभिन्न महाविद्यालयों में समय समय पर अनेक नियुक्तियां भी की थी, जिसकी जांच किया जाना आवश्यक है। उनके रिटायर होने के बाद भी महाविद्यालय में राजनीति अपने उफान पर है और प्रभार के लिए खींचतान मची हुई है। उन्होंने आरोप लगाया है कि शासकीय संसाधनों के बंदरबांट के लिए अपने आवंटित कार्यों को भूलकर अन्य गतिविधियों में व्यस्त है।
जगह-जगह हस्ताक्षर क्यों छोड़े गए हैं?
कैश बुक में आखिर जहां हर जगह हस्ताक्षर होते थे वहां कई पन्नों में हस्ताक्षर छूटे हुए हैं कैश बुक में लगभग 1000 से अधिक पन्ने होंगे पर उसमें कई ऐसे पन्ने हैं जहां पर हस्ताक्षर किए नहीं गए हैं आखिर क्या वजह है कि उसमें हस्ताक्षर नहीं किए गए? क्या वित्तीय अनियमितता की वजह से हस्ताक्षर को छोड़ा गया था?
जिस महाविद्यालय में मैंने स्वयं शिक्षा ग्रहण की है और कोरिया जिले के अधिकांश नागरिकों ने अध्ययन किया है उसकी ऐसी दुर्दशा देखकर मन द्रवित हो जाता है। इसलिए मैंने जिम्मेदार अधिकारियों से उच्चस्तरीय समिति गठित कर जांच हेतु आग्रह किया है। साथ ही भविष्य में गड़बडि़यां रोकी जा सके इसके लिए स्थायी प्राचार्य की नियुक्ति की जाए।
शारदा गुप्ता,जिला मंत्री भाजपा,कोरिया

कैश बुक की कमियों की झलक
कमी 1:- पी.डी. कैश बुक एवं जनभागीदारी कैश बुक महाविद्यालय में लिपिक होने के बाद भी प्राचार्य डॉ0 ए0 सी0 गुप्ता बिल एवं कैश बुक को खुद अपने पास रखते थे एवं कैश बुक को भी खुद ही लिखते थे।
कमी 2:- विगत् 04 वर्षो से कैश बुक में बैंक/ ट्रेजरी टोटल नहीं है।
कमी 3:- यदि राशि कैश बुक नगद में वृद्धि हुई है तो कैश बुक में नगद राशि कहां से आई है यह पता नहीं चल रहा है क्योंकि बैंक/ ट्रेजरी क्लोजिंग नहीं है।
कमी 4:- 31.01.2025 को सेवानिवृत्त हुए तब भी कैश बुक कम्पलीट नहीं था।
कमी 5:- छह माह बाद जब अपर संचालक अम्बिकापुर के उपस्थिति में दिनांक 28.06.2025 को प्रभार दिए तब भी कैश बुक कम्पलीट नहीं है।
कमी 6:- जगह- जगह हस्ताक्षर क्यों छोड़े गए।
कमी 7:- जगह- जगह कटिंग कर आंकड़ों से छेड़छाड़ की गई है। यदि कही सुधार होता है तो वहां लघु हस्ताक्षर होना चाहिए लेकिन ऐसा कुछ नहीं है।
कमी 8:- टोटल का न होना यह प्रदर्शित करता है कि शायद पूर्व प्रभारी प्राचार्य आंकड़ों को बदलना चाह रहे थे।
कमी 9:- उक्त कार्य वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में आता है।
कमी 10:- 2019 के बाद से ऑडिट नहीं।
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