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चिरमिरी@बंटी-बबली के शासनकाल का एक और भ्रष्टाचार हुआ उजागर

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-रवि सिंह-
चिरमिरी,02 जून 2025 (घटती-घटना)। रायपुर से आकर मनेद्रगढ़ विधानसभा को अपना चारागाह समझने वाले कथित सेवक के काले कारनामों का पर्दाफाश होना फिर से प्रारंभ हो गया है मीठी-मीठी बातें कर सिर्फ झूठ की बुनियाद पर अपनी राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करने वाले कथित ठग के कभी…सैनिटाइजर घोटाला,करोना काल में गरीबों के वितरण होने वाले अनाज घोटाला,फर्जी सड़क निर्माण घोटाला,रिटर्निंग वॉल घोटाला,डस्टबिन घोटाला, सिद्ध बाबा पहाड़ी पर सड़क निर्माण घोटाला, एडवेंचर पार्क घोटाला,फर्जी रॉयल्टी घोटाला, जल आवर्धन घोटाला के बाद एक और नया घोटाला प्रकाश में आया है,बहरूपियों का ऐसा घोटाला जो पूरी तरह से आम जन मानस की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ किया गया है लोगों के अपनी ही सुरक्षा को लेकर सवाल उठने लगे हैं बताया जाता है कि नगर पालिका निगम चिरमिरी में करीब आधा सैकड़ा छोटी बड़ी गाडि़यां हैं जिनका उपयोग आम जनमानष की बुनियादी सुविधाओं के लिए किया जाता है जिनके रखरखाव सहित विभिन्न दस्तावेजों को मेंटेन करने के साथ-साथ गाड़ी का वैध बीमा करवाना भी निगम की जिम्मेदारी रहती है, उसे दूर की चर्चित जोड़ी बंटी बबली के बेहद करीबी खासम खास उस दौर का मुख्य सलाहकार माने जाने वाले राजा जी ने इस विभाग की जिम्मेदारी अपने कथित मम्मी पापा के आशीर्वाद से अपने ऊपर ले रखी थी तात्कालिक दौर में कभी इन दोनों व्यापारी जनप्रतिनिधियों को मम्मी पापा की उपाधि देने वाले इस राजा ने एक सीधे-साधे दंपति को इस फ्रॉड वाले कार्य में अपना शिकार बनाया है, पिछले 4 साल से लगातार इस तरह के फर्जी कार्य मम्मी पापा के मर्जी से ही हो रहे थे क्योंकि पिछले 3 साल पूर्व इस संदर्भ में स्थानीय पत्रकारों ने कथित मम्मी से इसकी शिकायत की थी किंतु वह विभाग इस फर्जी बीमा कार्य में इनका कथित बेटा शामिल था, मामले की जानकारी आम होने पर इस पूरे मामले को दबाने के लिए अपने गठित बेटे से ऊपर मैनेज करने के नाम पर इन लोगों ने भी उसे मोटा माल दिया था इसलिए उसे पूरे मामले को दबा दिया गया,बंटी बबली के सबसे और ईमानदारी वाले दौर में ही इस अपराध की जानकारी सबको हो गई थी इसलिए स्थानीय लोगों ने कई बार इस मामले को उजागर करने के लिए सूचना का अधिकार के कानून के तहत जानकारी चाहिए थी, किंतु उसे दौर में बंटी बबली का ऐसा दबदबा था कि निगम में बैठे भ्रष्ट अधिकारी उनके आदेश के पालन में उक्त जानकारी देने में आनाकानी कर रहे थे सरकार बदली परिस्थितियों बदली अब क्रमशः ग्रामीण क्षेत्र के कई मामलों स्वास्थ्य विभाग के कई भ्रष्ट मामले उजागर होने की प्रबल संभावना दिख रही है।
क्या सही में वाहन बीमा को लेकर फर्जीवाड़ा हुआ है या फिर दस्तावेज देने वाले ने गड़बड़ी की?
आरटीआई कार्यकर्ता ने बड़े गंभीर आरोप लगाया है क्योंकि उन्हें जो दस्तावेज मिले हैं उसमें उन्हें बीमा पॉलिसी नहीं मिली बीमा पॉलिसी जैसा कुछ पेपर दिया गया जो बीमा कंपनी के द्वारा प्रीमियम बताने के लिए कैलकुलेटर दिया जाता है, जिसमें यह बताया जाता है कि इसका बीमा इतने में आएगा जिसे कोटेशन भी कहते हैं, उस कोटेशन को क्या पॉलिसी बात कर निगम से पैसे ले लिए गए और निगम ने पैसे दे भी दिए या फिर माजरा कुछ और है? उस समय की सरकार के जिम्मेदार लोगों ने कहीं मिलकर तो वाहन बीमा के नाम का पैसा हजम तो नहीं कर लिया? नगर निगम में पुराने नए मिलकर 55 से अधिक छोटे-बड़े वाहन है जिसका बीमा साल में तकरीबन 10 से 15 लाख का होता है क्या पूरे 4 साल यदि बीमा नहीं हुआ तो यह राशि तकरीबन 50 लाख हो जाती है क्या इतनी बड़ी रकम बिना बीमा के ही आधा तोर आधा मोड़ में कहीं निगम के सरकार व बीमा करने वाले ने अंदर कर लिया और वाहनों की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी।
4 साल निगम की वाहन सड़कों पर बिना बीमा के दौड़ रही?
विदित हो कि पिछली नगर निगम चिरमिरी सरकार में क्या स्थिति थी यह किसी से छुपी नहीं तमाम तरह के घोटाले के आरोप लगे थे सैनिटाइजर से लेकर कई तरह के निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप लगा था अब निगम में कांग्रेस की सरकार जाने के बाद बीजेपी की सरकार आने के बाद सूचना के अधिकार से एक बड़ी जानकारी सामने आई है जिसमें यह बताया जा रहा है कि इसलिए 4 साल निगम की वाहनों का बीमा हुआ ही नहीं और पैसे निकल गए जाने की पूरे 4 साल निगम की वाहन सड़कों पर बिना बीमा के दौड़ रही थी यह आरोप आरटीआई कार्यकर्ता का है क्योंकि उसे जो सूचना के अधिकार में जानकारी मिली है उसमें वाहनों की बीमा पॉलिसी की जगह इंश्योरेंस कंपनी का प्रीमियम कैलकुलेटर मिला है और उनका कहना है कि यही बीमा पॉलिसी है पर सवाल यह उठता है कि उन्हें बीमा पॉलिसी व प्रीमियम कैलकुलेटर में अंतर समझ में नहीं आता या तो उन्होंने सूचना के अधिकार में गलत दस्तावेज आईटीआई कार्यकर्ता को दिए हैं या फिर निगम के ही लोगों को बीमा करने वाले ने बड़ा बेवकूफ बनाया है? आरटीआई कार्यकर्ता का आरोप यह भी है कि यह बीमा में फर्जीवाड़ा एक समझौते के तहत हुआ था निगम चुनाव के दौरान जिस व्यक्ति को बीमा करने की जिम्मेदारी मिली थी वह पार्षद के लिए प्रत्याशी बन रहा था पर दूसरे प्रत्याशी ने उसे यह बोलकर चुनाव में बैठा दिया कि पूरे 5 साल तुम ही बीमा करना और ऐसा ही हुआ उसने जीत और पूरे 5 साल बीमा करने की छूट उसे दे दी और यह बताया गया कि निविदा के तहत बीमा करने का हकदार वह व्यक्ति है अब जब यह घोटाला सामने आया है तब जाकर पूरी बातें स्पष्ट हो रही है कि यह घोटाला की नीव चुनाव के दौरान ही रखा गया था। आरटीआई कार्यकर्ता राकेश सिंह की पड़ताल में सामने आया है कि निगम की गाडि़यों का बीमा बीते चार सालों तक फर्जी दस्तावेजों के आधार पर दर्शाया गया जिसमे न पॉलिसी नंबर थे, न बीमा कंपनी का नाम और न ही बारकोड असली था। और इस पूरे दौर में नगर निगम की कमान कांग्रेस शासित सरकार के अधीन थी।
बिना बीमा दौड़ती रहीं निगम की गाडि़याँ, गनीमत रही कि कोई हादसा नहीं हुआ…
सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि चार सालों तक निगम की गाडि़याँ बिना वैध बीमा के सड़कों पर दौड़ती रहीं। कल्पना कीजिए, अगर इस दौरान कोई गंभीर दुर्घटना घट जाती, तो जिम्मेदारी किसकी होती? यह न केवल एक विाीय अपराध, बल्कि जन सुरक्षा से जुड़ा सीधा खिलवाड़ भी है। बारकोड स्कैन पर निकले अन्य वाहन,फर्जीवाड़ा साफ उजागर आरटीआई से मिले दस्तावेजों में कई बारकोड स्कैन करने पर दूसरे वाहनों की जानकारियाँ सामने आईं, जबकि कुछ स्कैन हो ही नहीं पाए। यह साफ दर्शाता है कि बीमा केवल कागज़ों में था।
स्थानीय लोगों और आरटीआई कार्यकर्ता का सवाल साफ है…
जब चार वर्षों तक एक ही फर्म ‘मंजिता ई-सेल्युशन सीएससी सेंटर को गाडि़यों का बीमा सौंपा जाता रहा, और दस्तावेजों की कभी भी वैधता की जांच नहीं की गई,तो क्या यह सब कुछ जानबूझकर नहीं किया गया? क्या फिर यह सारा बंटी बबली सहित कमिश्नर और उनके अधीनस्थ कर्मचारी की सहमति से घोटाला उनकी निगरानी में और सहमति से फलता-फूलता रहा?


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