- राजस्व के अधिकारियों की चाल बिगड़ चुकी,कुछ समझना नही चाहते,बेपटरी हैं आखिर क्यों? कौन है इसका जिम्मेदार?
- राजस्व अधिकारी के मानसिक दर्द से लोग कराह रहे…कलेक्टर साहब एक खबर छपने पर पत्रकार की खोजबीन शुरू हो जाती है लोकतंत्र के चैथे स्तंभ को आप जकड़ना चाहते हैं पर सिस्टम को सुधारना क्यों नहीं चाहते?
-रवि सिंह-
कोरिया, 23 मई 2024 (घटती-घटना)। दो ब्लॉक के कोरिया जिले में राजस्व अधिकारियों के रवैये से किसान परेशान हैं,अपने छोटे-छोटे कार्यो के लिए किसान आए दिन राजस्व कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं,उनके चप्पल घिस गए हैं कलेक्टर साहब,कुछ तो कीजिए…कुछ ऐसा ही आलम इन दिनों कोरिया जिले में बना हुआ है, अन्नदाता किसान जो कि इस देश की रीढ की हड्डी कही जाती है,वे कोरिया के राजस्व कार्यालयों से लेकर राजस्व न्यायालयों में दर-दर भटकते हुए दिखलाई दे रहे है। राजस्व से जुड़े अधिकारी कर्मचारियों को जनता की परेशानी से कोई लेना देना नही है। तारीख पर तारीख से जनता इस कदर परेशान है कि वह अब प्रदेश की नई सरकार से भी दुखी नजर आ रही है। आखिर कारण क्या है,यह तो कोरिया का प्रशासनिक अमला ही बतला सकता है लेकिन यह समझ से परे है कि आए दिन कलेक्टोरेट के वातानुकुलित सभाकक्ष में बैठकंे आयोजित की जाती हैं,लंबी चौड़ी बाते कही जाती हैं,लेकिन ऐसी बैठकों का क्या औचित्य जब यहां का किसान ही परेशान है,आम जन परेशान है और वह राजस्व अधिकारियों के द्वारा दिये जा रहे मानसिक दर्द से बुरी तरह कराह रहा है। कलेक्टर साहब एक खबर छपने पर आप पत्रकार की खोजबीन शुरू करा देते हैं लोकतंत्र के चैथे स्तंभ को आप जकड़ना चाहते हैं ठीक है,आप जिले के प्रशासनिक प्रमुख हैं,आप अपनी शक्ति का भरपूर उपयोग कर सकते हैं,लेकिन संविधान ने चैथे स्तंभ को भी कुछ अधिकार दिए हैं इसे भी समझना चाहिए होगा। पत्रकार वही लिखता है जो दिखता है। बात जब जब आम जन की होगी पत्रकार आवाज उठाएगा ही क्योंकि वह कलम का सिपाही है कलम का विक्रेता नही। सच को सच और गलत को गलत लिखने वाला पत्रकार आज खोजने से नही मिलता साहब,पत्रकारिता के चुनौतीपूर्ण समय में आज आपके जिले में राजस्व अधिकारियों की स्थिति बद से बदतर हो चुकी है, बिना सुविधा शुल्क के यदि कोई राजस्व का काम हो जाए जो संबंधित भू स्वामी खुद को बड़ा धन्य मानता है। राजस्व के अधिकारियों की चाल इतनी बिगड़ चुकी है कि वे किसी को कुछ समझना नही चाहते, बेपटरी हैं आखिर क्यों? कौन है इसका जिम्मेदार? तारीख पर तारीख आखिर क्यों? क्या आम आदमी का काम तभी होगा जब उसके लिए जनप्रतिनिधि बात करें। एक आम आदमी का राजस्व कार्यालयों से काम कराना कितना कठिन हो गया है यह आप शायद अंदाजा नही लगा पा रहे हैं साहब,क्योंकि आपको सिर्फ उतना ही बताया जाता है जितना आप जानना चाहते हैं। बाकि राजस्व अधिकारी तो सिर्फ वाहवाही के लिए परेशान हैं। जिला मुख्यालय में हाल और बेहाल है,मैडम हमेशा कलेक्टोरेट में ही मिलती हैं ऐसा बतलाया जाता है। साहब बुरा हाल है जिले का,कुछ तो कीजिए।
साहब…राजस्व न्यायालयों में पेडेंसी पर एक नजर डालिए तो सही
आम जन,किसान का ज्यादातर काम राजस्व विभाग से ही पड़ता है और आप उसके मुखिया हैं, राजस्व न्यायालयों में पेडेंसी पर एक नजर डालिए तो सही। राजस्व कार्यालयों में बाहर धूप में ईधर उधर भटकते किसानों का दर्द एक बार तो महसूस कीजिए साहब, उनके करीब जाईये साहब,वह भी इंसान ही है। हां जब करीब जाइए तो इतना जरूर कीजिए कि आपके साथ वाहवाही लूटने वाले वे अधिकारी कदापि साथ ना हो जिनसे आम जन परेशान है। क्योंकि अधिकारियों के सामने ही उनकी बुराई कौन करेगा साहब यह तो आप अच्छे से समझते ही हैं बाद में काम तो फिर उन्ही से पड़ना ही है इसलिए कोई भी उनके सामने कुछ नही बोलेगा साहब। वैसे तो बीते अक्टूबर माह से पहले विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा का चुनाव था साहब,लेकिन उसके बाद भी राजस्व अधिकारियों ने अचार संहिता का बहाना बना लिया है। साहब हर जायज काम के लिए अचार संहिता और नजायज काम के लिए कोई संहिता नही यह जिले का आलम है। आप राजस्व विभाग के मुखिया भी हैं साहब इसलिए आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप जिले में व्याप्त इस समस्या को अंतर्मन से संज्ञान लेकर सुधारने की कोशिश करेंगे।
दुखी उक्त किसान पर जब पत्रकार की नजर पड़ी तो उसका दर्द सुनकर ऐसा लगा जैसे आपके जिले में शासन व्यवस्था बेपटरी हो गई
साहब आप उस किसान का दर्द समझिए साहब जो कि हकीकत है,एक किसान जो कि दूध का व्यापार भी करता है, रोज सुबह अपने घर मे गौशाला एवं अन्य घरेलू काम करके जब आपके राजस्व अधिकारी वातानुकुलित कमरों से निकलना नही चाह रहे हैं तब वह 30 से 40 किमी दूरी तय करके दूध बांटने निकलता है इस चाहत से कि आज राजस्व कार्यालय जाकर अपना काम निपटाउंगा। भरी दूपहरी में 43 डिग्री तापमान पर सर में कपड़ा ढंककर थका हारा किसान जब राजस्व कार्यालय पहुंचता है तो उसे एक लाईन में जवाब दे दिया जाता है कि साहब तो नही बैठै हैं अचार संहिता के बाद काम होगा। यह बहुत दुखदायी स्थिति है साहब। राजस्व कार्यालय की दुर्दशा से त्रस्त और दुखी उक्त किसान पर जब पत्रकार की नजर पड़ी तो उसका दर्द सुनकर ऐसा लगा जैसे आपके जिले में शासन व्यवस्था बेपटरी हो गई है। अधिकारी कुछ करना ही नही चाहते वे सिर्फ कागजी खानापूर्ति में ही व्यस्त हैं। साहब कुछ तो कीजिए,हाल बेहाल है साहब। पिछली सरकार में भी जनता इसी प्रकार त्रस्त थी ,राजस्व कार्यालयों में काम के लिए बोली लगाई जाती थी। प्रदेश में सरकार बदल गई है साहब,जनता को सरकार से बहुत अपेच्छाएं है, बहुत उम्मीदे हैं। उनकी अपेच्छांए और उम्मीदें आपके अधिकारी तोड़ रहे हैं साहब,जनता के कार्यो का, परेशानियों को दूर करने का बीड़ा उठाईये साहब,आपके अधिकारियों का पहला कर्तव्य ईमानदारी से जनता का काम ही करना है साहब और उसी के लिए त्राहिमाम मचा हुआ है…साहब कुछ तो कीजिए।
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