- अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का भी है एक निर्णय क्या आप उससे हैं अनभिज्ञ, रिपोर्ट सही गलत हो सकता है,यही अभिव्यक्ति की आजादी है…
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट में सही या ग़लत हो सकता है,लेकिन अपने विचार रखने की स्वतंत्रता का अधिकार हर किसी को है
- पूरे मामले को लेकर दैनिक घटती-घटना का खुला पत्र..सभी विवादों का न्याय क्षेत्र अम्बिकापुर न्यायालय मान्य होगा…
- क्या किसी को धोखे के प्रति जागरूक करना व अवैध कारोबार के लिए लिखना समाचार पत्र में लिखना पत्रकार के लिए खतरे का काम हो गया है?
- अधिवक्ता साहब जी खबर की बात कर रहे हैं उस खबर में यह भी लिखा है की घटती-घटना उसकी पुष्टि नहीं करता…
֞अधिवक्ता ने असफाक उल्लाह के नोटिस में खबरों का उल्लेख किया है जिसके आधार पर उन्होंने असफाक के लिए उसकी तरफ से पत्रकार को नोटिस भेजा है जबकि अधिवक्ता जिन खबरों के आधार पर नोटिस भेज रहे हैं उनमें यह भी लिखा है की घटती-घटना खबर की पुष्टि नहीं करता है पर जाँच की माँगा जरुर करता है ताकि लोग किसी भी धोके में न आये।,,

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर 12 मई 2024 (घटती-घटना)। अवैध कारोबार करने वाले समाज व लोकतंत्र के हितैशी बनते जा रहे हैं पर वही अवैध कारोबार का विरोध करने वाले समाज व लोकतंत्र के दुश्मन कैसे हो गए? आखिर ऐसा क्या बदलाव हो रहा है की लोगों की सोच गलत की तरफ ज्यादा और सही की तरफ कम होती जा रही? इस समय देश में ऐसे ऐसे विज्ञापन चल रहे हैं जो लोगों को यह बता रहे हैं कि बिना मेहनत के ही आप करोड़पति बन सकते हैं पर कोई मेहनत के साथ करोड़पति बनने का विज्ञापन नहीं दिखा रहा, इस समय गलत तरीके से पैसा कमाना व बिना मेहनत के पैसा कमाना ही लोगों की हॉबी हो गई है, कुछ ऐसा ही इस समय घर बैठे निवेश कीजिए और अच्छी रकम लेजाइये ऐसा स्कीम सरगुजा संभाग में चल रहा है,अब इसे वैध माने या फिर अवैध यह तो जांच करने वाले एजेंसियों की बात है पर जांच करने की जहमत उठाना कोई नहीं चाहता, अब अवैध कारोबार में संलिप्त लोगों को आगे बढ़ाया जा रहा है पर वहीं उसके विरोध करने वाले कई समस्याओं से जूझ रहे हैं, आखिर क्या लोकतंत्र के अंग अपना काम सही तरीके से नहीं कर रहे हैं यह सवाल भी अब खड़ा होने लगा है? आज के युग में अधिक पैसा कमाना यह सब का उद्देश्य है पर पैसे कमाने की राह का सही चुनाव लोग भूल गए हैं, पूर्व से लेकर वर्तमान शासन काल में पत्रकारिता करना काफी कठिन काम हो चला और वह भी उस समय जब जिम्मेदारों की कमियां बताई जाए तब, कमियों का एहसाह करवाना ही पत्रकार के लिए बड़ी मुसीबत बन जा रही है, जब तक महिमा मंडन कीजिए तब तक पत्रकारिता और पत्रकार दोनों सुरक्षित हैं,यदि कमियां दिखाएं या बताया तो फिर सुरक्षा भूल जाइए और कार्यवाही के लिए तैयार रहीए। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को दबा के रखना उनके सुख को प्रदर्शित करता है और उनकी कमियों की आड़ बनी रहती है। पिछले कुछ सालों से कमियों को बताने व आलोचना करने वाले पत्रकारों को पुलिस झूठे एफआईआर व नोटिस भेज कर दबाने का चौतरफा प्रयास कर रही है? यदि कार्यवाही में कोई संदेह निर्मित होता है तो क्या उसे व्यक्त नहीं किया जा सकता? गलत राह से ही पैसा कमाना अब उद्देश्य बनता जा रहा है जिस पर लगाम लगाने वाला सरकारी तंत्र भी फेल होता दिख रहा है या कई जगह सम्मिलित नजर आता है? कुछ ऐसा ही मामला सूरजपुर जिले के एक छोटे से गांव से जुड़ा हुआ है जहां पर तकरीबन 2 साल से अवैध पैसा निवेश का काम बहुत तेजी से पनप रहा था पर इसकी जानकारी तब उजागर होना शुरू हुई जब पैसा लगाने वाले के गुर्गे सहित पैसा लगाने वाले सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर गिफ्ट का प्रचार करने लगे और प्रचार कर यह बताने लगे की पैसा निवेश करने पर काफी अच्छा रिटर्न मिल रहा है, इससे पहले इस कारोबार की जानकारी किसी को नहीं थी फिर इस कारोबार को पता करने के लिए दैनिक घटती-घटना ने मुहिम छेड़ी और इस कारोबार की जांच हो इसकी मांग उठी और फिर इस कारोबार के रफ्तार में कमी आई, जिससे यह साबित हुआ कि कहीं ना कहीं यह कारोबार गलत तरीके से संचालित हो रहा था पर कारोबार करने वालों को समाज सहित सरकार का संरक्षण कार्यवाही व जांच से आज तक बचा रहा है? वही इस कारोबार से लोगों को जागरूक करने वाला पत्रकार ही समाज सरकार का दुश्मन होता जा रहा है कारोबार करने वाले की पहचान इतनी तगड़ी है कि अब वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के कलम को भी तोड़ने का प्रयास करने लगा है, कभी पत्रकार के विरुद्ध शिकायत करता है तो कभी अपने अधिवक्ता से मानहानि का नोटिस भेजता है और पत्रकार को अब तक के छपे खबरों का खंडन छापने का दबाव बनाना चाहता है ताकि उसका व्यापार सुचारू रूप से चलता रहे और लोगों को यह मैसेज दे सके की देख लिये ना लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हमारा कुछ नहीं कर सकता। यहां तक की पत्रकार के हत्या का भी षड्यंत्र करने से बाज नहीं आता, इससे यह बात तो साबित हो जाती है की कारोबार अवैध ही था जिसकी बौखलाहट और छटपटाहट इतनी है कि लोकतंत्र के कलम को कैसे तोड़े इसका प्रयास जारी है। अब पत्रकार को लड़ाई मामला उजागर करने के लिए नहीं अब अपने आप को बचाने के लिए लड़नी होगी कुछ ऐसा ही सिस्टम हो गया है?
असफाक जैसे अपना मूल कर्तव्य नहीं निभाने वाले लोग समाचार से आक्रोशित होकर वकीलों की शरण में पहुंच रहे हैं
जब सूत्रों व जनचर्चा के माध्यम से जानकारी अखबार समूह के पास पहुंची तब अखबार ने निष्पक्षता के साथ खबर प्रकाशित कर जागरूकता के साथ संबंधित विभाग को जानकारी देने काम किया,वहीं खबर प्रकाशन से नाराज होकर असफाक उल्लाह जैसे अपना मूल कर्तव्य नहीं निभाने वाले लोग समाचार से आक्रोशित होकर वकीलों की शरण मे जातें हैं और समाचार के विरुद्ध संवाददाता को अधिवक्ता के माध्यम से वैधानिक नोटिश जारी करवाते हैं। इन सभी विषयों के बीच दो बातें महत्वपूर्ण हो जाती हैं जिसमें एक तरफ खबर से आक्रोशित असफाक का आक्रोश है और वह जायज भी है क्योंकि सच सुनने की क्षमता शायद उनमे न रही हो वहीं विडंबना यह कि उनके अधिवक्ता अपने मुवक्किल के लिए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को ही वैधानिक नोटिस जारी कर एक तरह से बांधने का प्रयास करते नजर आते हैं,जबकि शायद उन्हें भी नहीं मालूम उनका वैधानिक नोटिश स्वमेव निरस्त भी हो सकता है। तथ्यों के आधार पर समाचार प्रकाशित करने का अधिकार समाचार प्रकाशित करने का दायित्व निभाने वाले लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के किसी भी प्रहरी के पास सदैव उपलध रहने वाला अधिकार है, वहीं वह इससे खुद को वंचित भी नहीं रखना चाहेगा। चंद शुल्क प्राप्ति की लालसा में किसी के अधिकारों से ही उसको वंचित करने का यह नोटिस स्वरूप का हथियार कहीं इसे चलाने वाले पर ही उल्टा प्रहार करने वाला न साबित हो जाये यह ऐसा करने से पहले सोचना ऐसे लोगों के लिए जरूरी है। लोकतंत्र में चौथे स्तंभ का अधिकार मिला हुआ है स्वतंत्र होकर निष्पक्ष होकर समाचार प्रकाशन का वह समाचार प्रकाशित करने का दायित्व निभा रहा संपादक व संवाददाता निभाता रहेगा वहीं ऐसे किसी नोटिस का जवाब भी दिया जाता रहेगा जो सच को झूठ के बल पर दबाने के प्रयासों वाला होगा।
बार एसोसिएशन में असफाक के अधिवक्ता की शिकायत की जायेगी
मामले में कुछ संपादकों व संवाददाताओं का कहना है कि ऐसे अधिवक्ताओं का जो समाचारों के प्रकाशन पर नोटिस जारी कर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को बाधित करने का प्रयास कर रहें हैं कि शिकायत बार एसोसिएशन में की जानी चाहिए,वहीं इसके लिए तैयारी किये जाने की बात भी रखी गई। असफाक के अधिवक्ता क्या उनकी गलत जानकर भी लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को डराने का काम कर रहे हैं? जिस वजह से अशफाक की गलत जानकारी में उन्होंने पत्रकार को वैधानिक नोटिस भेजी है? क्या अधिवक्ता सब भूल गए कि पत्रकार को जांच करने का अधिकार है क्या? यदि पत्रकार को अधिवक्ता साहब जांच करने का अधिकार दिला दें तो पत्रकार ही पूरे मामले की जांच करके बता देगा कि अशफाक का पूरा कारोबार अवैध है,क्या एक अधिवक्ता के खिलाफ शिकायत दर्ज करने के लिए स्टेट बार काउंसिल एक उपयुक्त फोरम है। स्टेट बार काउंसिल शिकायत प्राप्त होने पर,या अपने स्वयं के प्रस्ताव पर,उस अधिवक्ता के खिलाफ दुराचार का मामला अपनी अनुशासन समितियों में से किसी एक के पास दर्ज कर सकती है जिसे लेकर पत्रकार ने अधिवक्ता की शिकायत स्टेट बार काउंसिल में की है। वही अधिवक्ता साहब क्या संविधान के अनुच्छेद 19(1)(अ)- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत आपके द्वारा भेजा गया नोटिस विधिसंगत नहीं है?
क्या सवाल करना लोकतंत्र में अधिकार नहीं अधिवक्ता साहब?
असफाक के अधिवक्ता से एक सवाल है की क्या सवाल करना लोकतंत्र में अधिकार नही है जबकि सवाल करने वाला खुद लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की जिम्मेदारी निभा रहा है। असफाक के अधिवक्ता ने पत्रकार को वैधानिक नोटिस जारी कर यह भी कहा है की पत्रकार अनुचित लाभ चाहता है जबकि इसका कोई सबूत न असफाक के पास है न ही असफाक के अधिवक्ता के पास कुल मिलाकर पत्रकार को एक तरह से डराने और बांधने के लिए कानूनी नोटिस भेजा गया है जिससे वह असफाक के खिलाफ खबर का प्रकाशन न करे जबकि पत्रकार खबर का प्रकाशन तब तक करता रहेगा जब तक की असफाक अपनी आय की जानकारी साझा नहीं कर देते हैं।
आखिर किस मोबाइल नंबर से पैसे के लिए हुई थी बात?
अधिवक्ता ने नोटिस में मोबाइल नंबर पर पैसे की मांग की बात कही है आरोप लगाया है। अधिवक्ता को यह स्पष्ट करना चाहिए की किस नंबर से पैसे की लेनदेन की बात हुई वहीं यदि बात हुई तो कितने पैसों की बात हुई। नंबर पर पत्रकार से बात यदि हुई तो फोन किसने किया क्योंकि पत्रकार ने अपने तरफ से कोई फोन नहीं किया वहीं फोन समाचार प्रकाशन के पूर्व किया गया मांग खबर प्रकाशन के पूर्व हुई की बाद में। कुल मिलाकर यदि उधर से फोन लगाया गया उनके पक्षकार द्वारा किसी को जिसे वह पत्रकार बता रहे हैं क्योंकि पत्रकार जिसे नोटिस जारी हुआ है उससे कोई बात नहीं हुई है ऐसे में यह भी सवाल है की जब असफाक उल्लाह का कारोबार एक नंबर का है तो फिर क्यों उन्हे खबरों से डरना पड़ रहा है और पत्रकार से बात करने का प्रयास करना पड़ रहा है।
जब आपका पक्षकार इतना ही सही था तो फिर पत्रकार को फोन करने की जरूरत क्या थी?
अधिवक्ता से एक सवाल यह भी है की उनका पक्षकार यदि साफ-सुथरा व्यापार करता है चिटफंड का उसका व्यापार नहीं है वहीं महादेव सट्टा ऐप से उसका कोई कनेक्शन नहीं है तो फिर उसकी छवि धूमिल कैसे हो रही है वहीं उसका व्यवसाय कैसे प्रभावित हो रहा है जब वह एक नंबर का काम कर रहा है वहीं उसे जब सब कुछ वह सही कर रहा है उसका व्यवसाय सही है तो खबर प्रकाशन को लेकर उसे पत्रकार को फोन करने की जरूरत क्या पड़ गई थी।
पत्रकार को सूत्रों के हवाले से मिली खबर छापने व लोगों को जागरूक करने का भी अधिकार है?
असफाक उल्लाह के अधिवक्ता जिन्होंने घटती-घटना के पत्रकार को खबर प्रकाशन के लिए वैधानिक नोटिस भेजा है वह शायद भूल गए हैं की पत्रकार को सूत्रों के हवाले से खबर प्रकाशन का अधिकार है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को यह अधिकार है की वह सूत्रों की दी गई जानकारी की हल्की समीक्षा कर उसका प्रकाशन कर सकता है वहीं यदि खबर किसी को झूठी और अनर्गल लगती है तो फिर ऐसे व्यक्ति को सबूत के साथ अपने ऊपर लगे आरोपों का खंडन करना चाहिए अधिवक्ता से वैधानिक नोटिस जारी करवाकर पत्रकार को दबाना लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को ही दबाने जैसा प्रयास माना जायेगा।
पहले तो खुद ही सोशल मीडिया पर अपने कारोबार की गंध मचाई और अब कारोबार को वैध बताने के लिए जोर आजमाइश?
असफाक उल्लाह नाम का व्यक्ति मात्र 22 वर्ष की उम्र में ही काफी ख्याति पा लिया है यह बात उनके अधिवक्ता भी नोटिस में बता चुके हैं, जबकि 65 की उम्र में उनके पिता उतनी ख्याति नहीं कमा सके जितनी ख्याति उनके पुत्र ने 22 की उम्र में कमा ली है, इनका कारोबार क्या था यह किसी को 2023 से पहले पता नहीं था कोई नहीं जानता था कि यह क्या करते हैं पर अचानक 2023 में बहुत बड़े आदमी बन गए कैसे? पिता 65 साल की उम्र में इतने बड़े आदमी तो नहीं बने पर 22 साल की उम्र में उनका बेटा बहुत बड़ा आदमी बन गया, अब समझ में यह नहीं आता है कि पिता ने मेहनत नहीं की या फिर बेटा ने कुछ ज्यादा ही मेहनत कर दिया, 22 की उम्र वाले अशफाक की कहानी ही कुछ अजीब है जिन्हें बाइक में देखा जाता था वह अचानक फॉर्च्यूनर व बीएमडल्यू जैसी कार चढ़ने लगे यह स्थिति कैसे बदली इसकी जांच कोई करना नहीं चाहता पर इस स्थिति का प्रचार सोशल मीडिया पर खूब हो रहा था और लोगों को खूब गिफ्ट बांटे जा रहे थे जिसकी कई फोटो व तस्वीर आज भी मौजूद हैं और असफाक उल्लाह का नाम लिखा जा रहा था पर सवाल यह उठता है कि आखिर असफाक ऐसा कौन सा कारोबार कर रहे थे कि उन्हें इतनी महंगी महंगी गिफ्ट बांटने पड़ रहे थे? ऐसे कई दुकान संचालक है जो छोटे-मोटे गिफ्ट बाटते हैं पर इतना बड़ा गिफ्ट जिसमें कार बाइक व मोबाइल बाटते पहले व्यवसाई को देखा गया जो हम नहीं कहते यह उनके सोशल मीडिया पर डाले गए फोटो बता रहे थे?
असफाक की तरह शिवा साहू के छोटे से गांव का भी मामला है पर उसके विरुद्ध पुलिस कार्रवाई कर रही
सारंगढ़ के छोटे से गांव में रहने वाला शिवा साहू भी असफाक की तरह पैसा लोगों का दुगना करता था महंगी गाडि़यों को शौक रखता था उसके पीछे भी युवाओं की बहुत बड़ी फौज थी आज उसके कारोबार को ध्वस्त करने के लिए पुलिस लगातार कार्यवाही कर रही पर वहीं असफाक उल्लाह को पुलिस का ही संरक्षण मिल रहा है असफाक उल्लाह के पीछे न जाने कौन से मंत्री विधायक की ताकत काम कर रही है कि पुलिस उसके गिरेबान पर हाथ डालने से बच रही है? आखिर पुलिस अशफाक के इनकम का सोर्स क्यों नहीं पता लगाना चाह रही पर वही असफाक की जांच ना हो इस वजह से अशफाक पत्रकार को दबाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं कभी वसूली का आरोप लगाते हैं तो कभी उनके मानहानि का अधिवक्ताओं द्वारा नोटिस पत्रकार को जारी हो रहा है सभी उनके लिए बचाव में काम कर रहे हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सुप्रीम कोर्ट का भी है एक निर्णय,रिपोर्ट सही गलत हो सकती है,यही अभिव्यक्ति की आजादी
दैनिक घटती-घटना के पत्रकार को जिस तरह से खबर के आधार पर नोटिस भेजकर परेशान करने का प्रयास किया जाता है यह बात किसी से छुपी नहीं है,खबर का प्रकाशन पर जहां मामले में संज्ञान लेकर जाँच की जाति पर उल्टा शिकायत कर पत्रकार की ही जांच शुरू कर दी जाती है, यदि सुप्रीम कोर्ट के ताजा मामले के अनुसार और निर्णय के अनुसार देखा जाए तो वह अभिव्यक्ति की आज़ादी का उलंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर हिंसाग्रस्त क्षेत्र पहुंचे एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के चार सदस्यों के खिलाफ दर्ज प्रकरण को रद्द क्यों न किया जाए ऐसा कार्यवाही के दौरान कहा था, वहीं शिकायतकर्ता को यह कहा था की वह स्थापित करे की विभिन्न जाति समूहों के बीच एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया की रिपोर्ट की वजह से दुश्मनी बढ़ेगी। कोर्ट ने कहा की पत्रकार सही या गलत हो सकते हैं पूरे देश में हर दिन गलत चीजें रिपोर्ट हो रही हैं तो क्या अथॉरिटी पत्रकार पर मुकदमा चलाएगी? मामला जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने लिया है संज्ञान। मणिपुर हिंसा की रिपोर्ट पर एडिटर्स गिल्ड के खç¸लाफ़ केस अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ–कोर्ट हिंसाग्रस्त मणिपुर संबंधी एक फैक्ट-फाइंडिंग रिपोर्ट को लेकर राज्य पुलिस द्वारा दायर एफआईआर को एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, इस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि गिल्ड अपनी रिपोर्ट में सही या ग़लत हो सकता है, लेकिन अपने विचार रखने की स्वतंत्रता का अधिकार हर किसी को है। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में गिल्ड की एक याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसमें इसके सदस्यों के खिलाफ की गई कार्रवाई को चुनौती दी गई है,सुनवाई के दौरान माननीय सीजेआई चंद्रचूड़ ने पूछा,यह मानते हुए कि उन्होंने जो कहा वह झूठ है और आपका कहना है कि हर पैराग्राफ झूठा है, लेकिन किसी लेख में गलत बयान देना धारा 153 ए के तहत अपराध नहीं होता, यह त्रुटिपूर्ण हो सकता है, त्रुटिपूर्ण चीजें देश भर में हर दिन रिपोर्ट की जाती हैं, क्या आप धारा 153 ए के लिए पत्रकारों पर मुकदमा चलाएंगे? सीजेआई ने कहा कि ईजीआई मणिपुर हिंसा के पक्षपातपूर्ण मीडिया कवरेज के बारे में अपनी रिपोर्ट में सही या गलत हो सकता है, लेकिन अपने विचार रखने के लिए उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। जब शिकायतकर्ताओं ने बार-बार ईजीआई द्वारा अपनी रिपोर्ट के माध्यम से मणिपुर में किए गए नुकसान का उल्लेख किया तो सीजेआई बोले, मुद्दा उठाया है तो हमें पहले इस बारे में बताइए कि इन अपराधों हुए हलफनामा दायर करें, इसे रिकॉर्ड पर रखें, शिकायतें और एफआईआर क्यों रद्द नहीं की जानी चाहिएज्ऐसे कई जजमेंट पत्रकारों का निर्भगी हो के लिखने की आजादी देता है।
केरल उच्च न्यायालय ने समाचारों के प्रकाशन की स्वतंत्रता पर 2020 में दिया था फैसला
संपादक व संवाददता के विरुद्ध दर्ज एक मामले में 2020 में केरल उच्च न्यायालय का स्पष्ट आदेश जारी करते हुए प्रकरण को ही निरस्त कर दिया गया था जिसमें समाचार के प्रकाशन पर कार्यवाही की मांग की गई थी,माननीय केरल के उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि संपादक संवाददाता किसी तथ्य या शिकायत पर समाचार प्रकाशन के लिए स्वतंत्र हैं और उनका यह अधिकार किसी आरोप को जो समाचारों से सम्बंधित हो से जोड़कर बांधा नहीं जा सकता।
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