कागज में धान, जमीन पर अफीम – सिस्टम की आंखों पर किसका पर्दा?
अफीम की फसल, धान की रसीद – सरकार का खजाना किसने लूटा?
जिओ-टैगिंग फेल या मिलीभगत का खेल? अफीम खेत से धान खरीदी पर सवाल
जिस खेत में नशा उगा, वहां से निकला ‘धान का पैसा’!
अफीम के खेत में उगा धान: व्यवस्था की आंखों पर पट्टी या मिलीभगत का खेल?
लेख by रवि सिंह : छत्तीसगढ़ में सामने आया “अफीम बनाम धान” का मामला केवल एक प्रशासनिक गड़बड़ी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर गहरा सवाल है, जिस खेत में अफीम जैसी अवैध फसल उग रही थी, उसी खेत के नाम पर धान की फसल दर्ज हुई, सरकारी खरीद केंद्रों में बेची गई और भुगतान भी हो गया, यह घटना किसी एक व्यक्ति की भूल नहीं, बल्कि व्यवस्था की परतों में छिपी गंभीर खामियों का संकेत देती है।
धान खरीदी की प्रक्रिया में गिरदावली, जिओ-टैगिंग और डिजिटल सत्यापन जैसे कई स्तरों पर निगरानी की व्यवस्था की गई है, इनका उद्देश्य फर्जीवाड़े को रोकना और वास्तविक किसानों को लाभ पहुंचाना है, लेकिन जब रिकॉर्ड में धान और जमीन पर अफीम दिखती है, तो यह विरोधाभास अपने आप में एक बड़ा सवाल बन जाता है, क्या रिकॉर्ड गलत बनाए गए या फिर जानबूझकर सच्चाई को नजरअंदाज किया गया? यह स्थिति बताती है कि या तो सिस्टम निष्क्रिय हो चुका है या फिर उसे निष्क्रिय बना दिया गया है, सरकार ने पारदर्शिता के लिए तकनीक का सहारा लिया, लेकिन जब इतनी तकनीकी व्यवस्था के बावजूद ऐसी विसंगतियां सामने आती हैं, तो सवाल तकनीक पर नहीं बल्कि उसे संचालित करने वाले मानव तंत्र पर उठता है, तकनीक कभी अपने आप गलत नहीं होती, उसका गलत उपयोग या दुरुपयोग किया जाता है, इस मामले में भी यही आशंका मजबूत होती है कि तकनीक केवल औपचारिकता बनकर रह गई है, यह मामला किसी एक खेत या एक किसान तक सीमित नहीं लगता। अलग-अलग स्थानों से सामने आ रहे ऐसे उदाहरण यह संकेत देते हैं कि यह एक संगठित पैटर्न हो सकता है। यदि जिस खेत में धान नहीं उगा, वहां से भी धान खरीदी हो रही है, तो यह सीधे-सीधे फर्जी गिरदावली, फर्जी खरीदी और सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला है। यह सवाल भी उठता है कि ऐसा सब कुछ किसके संरक्षण में संभव हो पा रहा है।
धान खरीदी प्रक्रिया में कई स्तरों पर निगरानी होती है पटवारी से लेकर जिला प्रशासन तक। इसके बावजूद यदि ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, तो यह मानना पड़ेगा कि या तो निगरानी केवल औपचारिकता थी या फिर जिम्मेदार लोग जानबूझकर आंखें मूंदे हुए थे। दोनों ही स्थितियां समान रूप से चिंताजनक हैं, अफीम की खेती स्वयं में एक गंभीर आपराधिक कृत्य है, जिसका संबंध नशे के अवैध नेटवर्क से होता है। ऐसे में जिस खेत में यह खेती हो रही थी, वहां प्रशासनिक चूक केवल आर्थिक अनियमितता नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था की विफलता भी है। यह मामला केवल राजस्व या कृषि का नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का भी प्रश्न है, मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज होना स्वाभाविक है, लेकिन जनता को केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि ठोस जवाब और कार्रवाई चाहिए। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस धान की फसल वास्तव में थी ही नहीं, उसका भुगतान किसे मिला और किस आधार पर मिला, जब तक इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता, तब तक यह पूरा प्रकरण अधूरा रहेगा, अब यह समय केवल जांच का नहीं, बल्कि सिस्टम सुधार का है, निष्पक्ष जांच, दोषियों पर कठोर कार्रवाई, तकनीक का सही उपयोग और फर्जी भुगतान की वसूली जैसे कदम उठाना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं किया गया, तो यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि भविष्य में और बड़े घोटालों की भूमिका बन सकती है. यह मामला हमें एक कड़वी सच्चाई से रूबरू कराता है, समस्या खेत में नहीं, बल्कि व्यवस्था में है, जब कागज पर धान उगता है और जमीन पर अफीम, तो यह संकेत है कि सिस्टम ने सच्चाई देखना बंद कर दिया है। अब आवश्यकता है उस सच्चाई को सामने लाने की, जिम्मेदारी तय करने की और जनता का भरोसा बहाल करने की, क्योंकि अगर ऐसा नहीं हुआ, तो आने वाले समय में यह सवाल और गूंजेगा, क्या इस व्यवस्था में सच कभी उगेगा भी या नहीं?

बैकुंठपुर कोरिया(छत्तीसगढ़}
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur