धान का कटोरा या अफीम का बगीचा? छत्तीसगढ़ की खेती ने बदला ‘फसल चक्र’
खेतों में अफीम लहलहाई, जिम्मेदार बोले – हमें तो बस हरियाली दिखी
अफीम उगती रही, पहरेदार सोते रहे…अब जागी व्यवस्था की नींद
किसानों ने बोया अफीम, सिस्टम ने बोया सन्नाटा
अफीम की फसल पकड़ी गई, जिम्मेदारी अब भी कच्ची
अफीम की खेती पर खुलती परतें, जिम्मेदारों की आंखों पर अब भी परदा
फसल खेत में उग रही थी, खबर विधानसभा में उगी
अफीम के पौधे बोले – हम तो महीनों से खड़े थे, अब सबको कैसे दिखे?
लेख by ओंकार पाण्डेय- छत्तीसगढ़ को वर्षों से “धान का कटोरा” कहा जाता रहा है, किसान मेहनत करते हैं, सरकार समर्थन मूल्य की घोषणा करती है और खेतों में धान लहलहाता है, लेकिन हाल के दिनों में जो खबरें सामने आई हैं, उनसे लगता है कि राज्य की कृषि व्यवस्था शायद चुपचाप एक नई फसल का स्वागत कर रही थी, वह है अफीम।
पहले दुर्ग में खबर आई कि वहां अफीम की खेती पकड़ी गई, लोगों ने सोचा, चलिए कोई इकलौता मामला होगा, किसी किसान ने शायद गूगल देखकर नई खेती का प्रयोग कर लिया होगा, लेकिन कुछ ही दिन बाद बलरामपुर से भी खबर आ गई कि वहां भी खेतों में अफीम लहरा रही थी, अब हाल यह है कि खबरें जिस रफ्तार से सामने आ रही हैं, ऐसा लगने लगा है कि धान, गेहूं और मक्का के बीच कहीं “अफीम” भी चुपचाप फसल चक्र का हिस्सा बन गई थी।
खेतों में अफीम, पर जिम्मेदारों की आंखों में नींद- सबसे दिलचस्प बात यह है कि अफीम की खेती इतनी मात्रा में हो रही थी, लेकिन जिनकी जिम्मेदारी निगरानी की थी, उन्हें शायद इसकी भनक भी नहीं लगी, अब यह तो तय है कि अफीम कोई तुलसी का पौधा नहीं है जो घर के कोने में उग जाए और किसी को पता ही न चले। यह खेती खेत में होती है, पौधे उगते हैं, फूल आते हैं और फिर उससे रस निकाला जाता है, लेकिन प्रशासनिक व्यवस्था की संवेदनशीलता देखिए —खेत में अफीम उग रही थी और तंत्र को शायद सिर्फ हरियाली दिखाई दे रही थी।
जिम्मेदार विभाग: सबको नहीं पता, लेकिन सबको पता- राज्य में पुलिस है, आबकारी विभाग है, नारकोटिक से जुड़े तंत्र हैं और स्थानीय प्रशासन भी है, यानि व्यवस्था इतनी मजबूत है कि यदि कोई किसान अपने खेत में एक झोपड़ी भी बना ले तो नोटिस पहुंच जाता है, लेकिन अफीम की खेती…? वह शायद इतनी “संस्कारी” फसल निकली कि किसी विभाग को परेशान ही नहीं करना चाहती थी, अब सवाल उठ रहा है कि आखिर यह खेती किसके संरक्षण में हो रही थी? पुलिस के आशीर्वाद से? आबकारी विभाग की कृपा से? या फिर नारकोटिक विभाग की “दूरदर्शी निगरानी” में? या फिर ऐसा भी हो सकता है कि सबको लगा हो कि यह जिम्मेदारी किसी और की है, और इसी भरोसे अफीम खेतों में फलती-फूलती रही।
लाइसेंस कागजों में था या कल्पना में?- अफीम की खेती भारत में पूरी तरह अवैध नहीं है, लेकिन इसके लिए सख्त लाइसेंस चाहिए, अब दिलचस्प सवाल यह है कि क्या इन खेतों में लाइसेंस भी था? अगर था तो शायद वह कागजों में कहीं घूम रहा होगा, और अगर नहीं था तो शायद यह खेती मौखिक अनुमति के भरोसे चल रही थी, हमारे यहां मौखिक आदेशों की परंपरा भी बड़ी मजबूत रही है —कागज बाद में आते हैं, काम पहले हो जाता है।
विधानसभा में शोर, खेतों में सन्नाटा- अब मामला विधानसभा तक पहुंच चुका है। सदन में हंगामा हो रहा है, सवाल पूछे जा रहे हैं और जवाब तलाशे जा रहे हैं, लेकिन खेतों में खड़े अफीम के पौधे शायद यह सोच रहे होंगे कि “हम तो महीनों से यहां खड़े थे, अब अचानक सबको हमारी याद कैसे आ गई?” असल सवाल अभी भी बाकी सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है, यह खेती कितने सालों से हो रही थी? क्या यह पहली बार पकड़ी गई है, या यह कई वर्षों से चल रही कहानी का सिर्फ पहला खुला पन्ना है? और यदि यह सालों से हो रही थी, तो क्या जिन घरों में पहले यह खेती हुई, वहां अब भी अफीम का भंडार छिपा हो सकता है?
अंत में- छत्तीसगढ़ के खेत मेहनत और ईमानदारी की पहचान रहे हैं, लेकिन यदि इन्हीं खेतों में अवैध फसलें उगने लगें और जिम्मेदार तंत्र को उसकी खबर ही न हो, तो यह केवल कानून का सवाल नहीं रह जाता, यह व्यवस्था की नींद का भी सवाल बन जाता है, अब जब अफीम की फसल पकड़ी जा रही है, तो उम्मीद है कि जांच की दरांती सिर्फ खेतों तक ही नहीं रुकेगी, बल्कि उन जिम्मेदारियों तक भी पहुंचेगी जिनकी निगरानी में यह “नई खेती” इतनी आराम से फलती-फूलती रही, कहीं ऐसा न हो कि अंत में यह निष्कर्ष निकले की अफीम खेतों में कम, व्यवस्था की बेफिक्री में ज्यादा उगी थी।

सूरजपुर छत्तीसगढ़
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