- जब भीड़ ताली बजाए और पुलिस जुलूस निकाले — तब संविधान चुप क्यों हो जाता है?
- अदालत से पहले सजा! बैकुंठपुर में छेड़छाड़ आरोपी का पुलिस ने निकाला जुलूस
- जब पुलिस बनी जज: न्यायालय पहुंचने से पहले ही आरोपी को मिली ‘सजा’
- कानून के नाम पर कानून की हत्या? आरोपी का जुलूस निकालने पर उठे सवाल
- संविधान या भीड़तंत्र? बैकुंठपुर की घटना ने पुलिस व्यवस्था पर खड़े किए प्रश्न
- दोष साबित होने से पहले हथकड़ी और अपमान — किस कानून में है यह प्रावधान?
- न्याय की जगह तमाशा: पुलिस की मौजूदगी में आरोपी का सार्वजनिक जुलूस
- अपराध दर्ज हुआ, फिर अदालत से पहले क्यों दी गई सजा?
- पुलिसिया न्याय या संवैधानिक अपराध? बैकुंठपुर मामला चर्चा में
- छेड़छाड़ केस में कानून लांघ गई पुलिस, आरोपी को बनाया भीड़ का शिकार
- कानून रक्षक ही कानून तोड़े तो कौन बचाएगा संविधान?




-रवि सिंह-
कोरिया,30 जनवरी 2026(घटती-घटना)। एक वीडियो वायरल होता है,पुलिस आरोपी को हथकड़ी पहनाकर सड़क पर घुमाती है, भीड़ मोबाइल निकालती है, सोशल मीडिया पर तालियां बजती हैं, लोग लिखते हैं —ठीक हुआ,ऐसे लोगों के साथ ऐसा ही होना चाहिए। यही वह क्षण है, जब लोकतंत्र को सबसे ज्यादा डर लगना चाहिए, क्योंकि जब न्याय तालियों पर चलने लगे, तो कानून की जरूरत खत्म होने लगती है।
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के बैकुंठपुर विधानसभा क्षेत्र से सामने आई एक ताजा घटना ने राज्य की कानून व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं, मामला महिला से छेड़छाड़ के आरोप से जुड़ा है, लेकिन इससे भी अधिक चिंताजनक वह तरीका है, जिस तरह पुलिस ने आरोपी को न्यायालय में पेश करने से पहले ही सार्वजनिक रूप से अपमानित कर दिया, यह घटना अब केवल एक आपराधिक प्रकरण न रहकर संविधान,नागरिक अधिकार और पुलिसिया अधिकारों की सीमाओं पर बहस का विषय बन चुकी है,बैकुंठपुर की यह घटना केवल एक आरोपी का जुलूस नहीं थी, बल्कि यह उस खतरे का संकेत है,जहां न्याय से पहले अपमान,सुनवाई से पहले सजा और अदालत से पहले फैसला तय किया जाने लगा है, लोकतंत्र में कानून का शासन होता है, पुलिस का नहीं,आज आवश्यकता है कि दोषियों को सजा मिले,पीडि़त को न्याय मिले,लेकिन संविधान और मानव गरिमा सुरक्षित रहे क्योंकि जब कानून की रक्षा करने वाला ही कानून तोड़ने लगे, तब लोकतंत्र सबसे ज्यादा संकट में होता है। पुलिस को सख्त होना चाहिए लेकिन निष्पक्ष होकर, अपराधियों को सजा मिलनी चाहिए लेकिन अदालत से,क्योंकि जिस दिन कानून तालियों से चलने लगे,न्याय कैमरे से तय होने लगे और पुलिस जज बन जाए,उस दिन अपराध नहीं बढ़ेगा लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा,आज सवाल सिर्फ इतना है क्या हम न्याय चाहते हैं,या तमाशा?
छेड़छाड़ का मामला, FIR दर्ज — यहां तक सब ठीक- प्राप्त जानकारी के अनुसार बैकुंठपुर क्षेत्र में एक युवक पर महिला से छेड़छाड़ का आरोप लगाया गया, पीडिता ने साहस दिखाते हुए थाने पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई, पुलिस ने शिकायत को गंभीरता से लेते हुए आरोपी युवक के विरुद्ध संबंधित धाराओं में अपराध पंजीबद्ध किया, अपराध दर्ज होना कानून सम्मत प्रक्रिया है और यह स्पष्ट करता है कि पुलिस ने प्रारंभिक स्तर पर अपना कर्तव्य निभाया, लेकिन इसके बाद जो दृश्य सामने आया, उसने पूरे मामले को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया।
न्यायालय पहुंचने से पहले ही “सजा”- जब पुलिस आरोपी को न्यायालय में पेश करने के लिए ले जा रही थी, उसी दौरान आरोपी को सार्वजनिक रूप से हथकड़ी पहनाई गई, बाजार और सार्वजनिक रास्तों से उसे जुलूस की तरह घुमाया गया, राहगीरों और भीड़ के सामने उसका अपमान किया गया, इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो बनाया गया, यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ, जिसके बाद मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया, विडियो में यह भी दिखाई देता है कि पुलिस की मौजूदगी में भीड़ तमाशबीन बनी रही और कथित तौर पर महिला को आरोपी को थप्पड़ मारने के लिए उकसाया गया।
दोष सिद्ध हुए बिना सार्वजनिक अपमान- कानून के जानकारों का कहना है कि आरोपी दोषी है या निर्दोष, यह तय करने का अधिकार केवल न्यायालय को है, पुलिस जांच कर सकती है, सजा नहीं दे सकती, अदालत से पूर्व इस प्रकार का सार्वजनिक अपमान “पूर्व-दंड” (Pre-Punishment) की श्रेणी में आता है, यह न केवल आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) बल्कि भारत के संविधान का भी उल्लंघन माना जाता है।
क्या कानून जुलूस निकालने की अनुमति देता है?- संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि बिना दोष सिद्ध हुए आरोपी को अपराधी की तरह प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, हथकड़ी का प्रयोग केवल अत्यंत आवश्यक परिस्थितियों में ही किया जा सकता है, किसी भी आरोपी का सार्वजनिक जुलूस निकालना अवैध है, सुप्रीम कोर्ट पूर्व में स्पष्ट कर चुका है कि पुलिस न्यायपालिका का स्थान नहीं ले सकती।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी- ऐसे ही एक मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में दुर्ग जिले के भिलाई थाना क्षेत्र में हुई पुलिसिया कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाया है,Case Title: Sujeet Sao and Others v. State of Chhattisgarh and Others WPCR No. 11 of 2026 इस प्रकरण में आरोपियों का जुलूस निकालने और कथित रूप से प्रताड़ित करने के मामले में हाईकोर्ट ने थाना प्रभारी (SHO), सीएसपी, पुलिस अधीक्षक, प्रधान आरक्षक, एएसआई, आरक्षक सहित 09 पुलिसकर्मियों के विरुद्ध जांच के आदेश जारी किए हैं।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां- डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में कहा “ये ऐसे मामले हैं जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के मूल ढांचे पर सीधा प्रहार करते हैं, कोर्ट ने आगे कहा कि प्रत्येक नागरिक को जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार प्राप्त है, पुलिस हिरासत में किसी भी प्रकार का उत्पीड़न या अपमान अस्वीकार्य है, कानून व्यवस्था बनाए रखने की आड़ में नागरिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता, कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि यदि आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह पुलिसिया ज्यादती और कानून के शासन की अवहेलना मानी जाएगी।
संविधान की रक्षा या भीड़ का मनोरंजन?- इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक पहलू यह रहा कि लोग तमाशबीन बने रहे, वीडियो मनोरंजन की तरह साझा किए गए और “संविधान खतरे में है” कहने वाले कई वर्ग इस मामले में मौन रहे, विशेषज्ञों का मानना है कि जब न्याय भीड़ के हाथों सौंप दिया जाता है, तब लोकतंत्र कमजोर होता है।
महिला सम्मान जरूरी, लेकिन कानून से समझौता नहीं- यह स्पष्ट है कि महिला से छेड़छाड़ गंभीर अपराध है, दोषी को कठोर सजा मिलनी चाहिए, लेकिन न्याय की प्रक्रिया कानून से बाहर जाकर नहीं चल सकती, यदि आरोपी दोषी है तो अदालत उसे दंड देगी, लेकिन यदि पुलिस ही अदालत बनने लगे तो यह व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।
कानून विशेषज्ञों की राय- वरिष्ठ अधिवक्ताओं का कहना है कि इस प्रकार का जुलूस मानवाधिकारों का उल्लंघन है, इससे मुकदमे की निष्पक्षता भी प्रभावित होती है, आरोपी के मौलिक अधिकारों का हनन होता है, ऐसे मामलों में संबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय एवं न्यायिक कार्रवाई का प्रावधान है।
जब भीड़ ताली बजाए और पुलिस जुलूस निकाले — तब संविधान चुप क्यों हो जाता है?
जनता खुश है — लेकिन क्या यही न्याय है?- इस मामले में एक बड़ा वर्ग पुलिस की कार्रवाई से पूरी तरह सहमत है, लोगों का गुस्सा जायज है, महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं, न्याय में देरी है, अपराधी अकसर बच निकलते हैं, लेकिन सवाल यह नहीं कि जनता खुश है या नाराज, सवाल यह है क्या कानून जनता की भावना से चलेगा या संविधान से? अगर गुस्से से ही न्याय तय होना है, तो अदालतें बंद कर दीजिए।
अगर जुलूस सही है, तो हर अपराध में क्यों नहीं?- यहां सबसे असहज सवाल खड़ा होता है अगर पुलिस द्वारा आरोपी का जुलूस निकालना “ठीक” है, तो यह नियम सबके लिए क्यों नहीं? अशफाक उल्ला जैसे बड़े मामलों में जुलूस क्यों नहीं निकला? कुलदीप जैसे संगीन अपराधों में सड़क पर घुमाकर क्यों नहीं दिखाया गया? सफेदपोश अपराधियों पर यह साहस क्यों नहीं दिखा? क्यों? क्योंकि वहां सत्ता थी, वकालत थी, पहचान थी, यहां कुछ भी नहीं था।
क्या पुलिस केवल कमजोर पर बहादुर है?- यही वह जगह है जहां पुलिस की कार्रवाई सवालों के घेरे में आती है, क्या कानून अब यह तय करेगा, किसके पास पहुंच है, किसके पास पैसा है, किसके पास राजनीतिक छाया है और उसी हिसाब से तय होगा कि किसका जुलूस निकलेगा और किसे सम्मानपूर्वक थाने से अदालत भेजा जाएगा? अगर ऐसा है, तो इसे कानून मत कहिए. इसे चयनात्मक ताकत कहिए।
न्याय नहीं, प्रदर्शन हो रहा है- यह भी सच है कि जुलूस से अपराध नहीं रुकते, कैमरे से कानून मजबूत नहीं होता, अपमान से न्याय नहीं मिलता, लेकिन यह जरूर होता है पुलिस का कंधा थपथपाया जाता है, कुछ घंटे की वाहवाही, कुछ हजार लाइक्स, कुछ वायरल वीडियो, न्याय नहीं, सिर्फ¸ प्रदर्शन।
आज आरोपी, कल कौन?- आज जिसे लोग गालियां दे रहे हैं, कल वही तरीका किसी निर्दोष पर भी लागू हो सकता है, क्योंकि जब प्रक्रिया खत्म होती है, तो सुरक्षा भी खत्म हो जाती है, आज भीड़ कह रही है “इसे घुमाओ।” कल वही भीड़ कहेगी —”इसे भी घुमाओ।” फर्क सिर्फ नाम का होगा।
संविधान अपराधियों को नहीं, नागरिकों को बचाता है- अक्सर कहा जाता है “संविधान अपराधियों का पक्ष लेता है।” यह झूठ है, संविधान अपराधी को नहीं, नागरिक को बचाता है, क्योंकि आज आरोपी नागरिक है, कल वही कानून आपको भी बचाएगा, अगर अदालत से पहले सजा मिलने लगे, तो निर्दोष होने का अधिकार खत्म हो जाएगा।
डर से नहीं, न्याय से समाज चलता है- इतिहास गवाह है की डर से अपराध कभी खत्म नहीं हुए, फांसी से अपराध बंद नहीं हुए, लाठी से समाज सभ्य नहीं बना, सभ्य समाज बना —निष्पक्ष जांच से, त्वरित न्याय से और समान कानून से बाकी सब सिर्फ तात्कालिक संतोष है।
आज सवाल एक जुलूस का नहीं है- यह बहस आरोपी की नहीं है, यह बहस पुलिस की भी नहीं है, यह बहस उस सीमा की है, जहां से आगे जाकर कानून भीड़ बन जाता है, आज अगर हम खुश हैं कि “उसका जुलूस निकला”, तो कल जब बिना सुनवाई हमारा नाम आए —तो हमें बचाने कोई नहीं बचेगा।
अब उठ रहा बड़ा सवाल
क्या पुलिस को अदालत से पहले सजा देने का अधिकार मिल गया है?
क्या कानून अब भीड़ और कैमरे के दबाव में चल रहा है?
क्या संविधान केवल किताबों तक सीमित रह गया है? यदि ऐसे मामलों पर समय रहते रोक नहीं लगी, तो कोई भी नागरिक कल इसी व्यवस्था का शिकार बन सकता है।
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