- जब हेलमेट नहीं, हौसले पहने गए
- सड़क सुरक्षा माह में बिना हेलमेट का नेतृत्व: नियम भाषणों के लिए, स्टंट सड़कों के लिए
- हेलमेट उतारो, झंडा लगाओ: सड़क सुरक्षा माह में असुरक्षा की रैली
- जब हेलमेट से ज़्यादा जरूरी हो गया शक्ति प्रदर्शन…सुरक्षा का संदेश या असुरक्षा का प्रदर्शन?
- राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह में नियमों की खुलेआम उड़ती धज्जियाँ
- जोश इतना कि होश उतर गया…हेलमेट नहीं, हौसला पहना गया: सड़क सुरक्षा माह की सबसे विरोधाभासी तस्वीर
- सड़क पर सत्ता, नियम किनारे, जब सुरक्षा सप्ताह बना स्टंट सप्ताह…नियम हमारे लिए नहीं?
- सड़क सुरक्षा माह: हेलमेट जनता के लिए, हिम्मत नेताओं के लिए
- भाजपा युवा मोर्चा की बाइक रैली बनी यातायात जागरूकता नहीं, बल्कि व्यंग्य का विषय
- सड़क सुरक्षा माह में बिना हेलमेट का ‘नेतृत्व’ जब नियम भाषणों के लिए हों और सड़क प्रदर्शन के लिए


-संवाददाता-
कोरिया,30 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। जनवरी का महीना है हर चौराहे पर बैनर टंगे हैं ‘हेलमेट पहनें,जीवन बचाएं।’ पुलिस चालान काट रही है, स्कूलों में बच्चों को समझाया जा रहा है, सरकार कह रही है — ‘दुर्घटना नहीं,सतर्कता चाहिए।’ और ठीक उसी समयज्कोरिया जिले की सड़क पर एक रैली निकलती है जिसमें हेलमेट नहीं,हौसले पहने गए हैं, नंबर प्लेट नहीं,पहचान काफी है, और नियम नहीं,सिर्फ जोश है। यह लेख किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है,यह उस मानसिकता के खिलाफ है जहां नियम भाषणों में अच्छे लगते हैं,लेकिन पालन करते समय बोझ लगते हैं,जहां जनता को उपदेश दिए जाते हैं,और सड़क पर खुद अपवाद बन जाया जाता है।
बताया गया कि यह रैली भाजपा के एक कार्यक्रम में पटना आगमन के अवसर पर निकाली गई, स्वागत हुआ,उत्साह था,जोश था — और फिर जोश में होश कहीं रास्ते में उतर गया, पूरी युवा टीम बाइक पर सवार हुई, कुछ बैठे थे, कुछ पीछे खड़े थे,कुछ हवा से बातें कर रहे थे, और कुछ शायद सोच रहे थे—हेलमेट पहनेंगे तो फोटो खराब आ जाएगी।
युवाओं को दिया गया संदेश या जोखिम का प्रशिक्षण?- भाजपा युवा मोर्चा स्वयं युवाओं का संगठन है, युवाओं से अपेक्षा रहती है कि वे समाज को दिशा देंगे, लेकिन इस रैली ने युवाओं को जो संदेश दिया, वह कुछ ऐसा रहा अगर राजनीतिक झंडा है, तो हेलमेट वैकल्पिक है, यह संदेश खतरनाक भी है और दुर्भाग्यपूर्ण भी।
व्यंग्य यह नहीं कि रैली निकली, व्यंग्य यह है कि सीख गलत मिली- सड़क सुरक्षा माह का उद्देश्य लोगों को डराना नहीं, बचाना है, लेकिन जब नेतृत्व ही यह संदेश दे देखो, हम नियम नहीं मानते, फिर भी चल रहे हैं, तो आम नागरिक यही सीखेगा कि, अगर ताकत है, तो नियम की ज़रूरत नहीं।
हेलमेट सिर पर नहीं, सोच में चाहिए– यह खबर किसी दल विशेष के विरोध में नहीं, बल्कि उस मानसिकता पर व्यंग्य है जहां नियम भाषणों में अच्छे लगते हैं, लेकिन पालन करते समय बोझ लगते हैं, क्योंकि सड़क पर नेता की बाइक भी उतनी ही फिसलती है, कार्यकर्ता की जान भी उतनी ही कीमती है, और दुर्घटना किसी का झंडा नहीं देखती।
सुरक्षा माह नहीं, साहस प्रदर्शन माह समझ लिया गया- राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह का उद्देश्य था लोगों को दुर्घटना से बचाना, लेकिन कुछ लोगों ने शायद इसे समझ लिया “राष्ट्रीय स्टंट प्रदर्शन माह।” बाइकों पर युवा सवार हैं, कुछ आगे बैठे हैं, कुछ पीछे खड़े हैं, और कुछ शायद यह मान चुके हैं कि अगर राजनीतिक झंडा लगा है, तो हेलमेट वैकल्पिक है।
हेलमेट से ज़्यादा जरूरी फोटो निकली- कहा जाता है, सिर की सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन रैली में दिखा कि सिर से ज्यादा सोशल मीडिया की प्रोफाइल सुरक्षित करनी थी, हेलमेट पहनते तो चेहरा नहीं दिखता, रील अच्छी नहीं बनती, शक्ति प्रदर्शन फीका लग जाता, तो फिर जोखिम ही क्यों न लिया जाए?
जहां मिसाल बननी थी, वहां मज़ाक बन गया अभियान- अगर यही युवा मोर्चा हेलमेट पहनकर, नियमों का पालन कर, “सड़क सुरक्षा अपनाएं” का नारा लगाते हुए रैली निकालता, तो पूरा जिला कहता देखो, नेतृत्व ऐसे होता है, लेकिन अब जिला कह रहा है देखो, नियम ऐसे तोड़े जाते हैं।
नियम सिर्फ आम आदमी के लिए होते हैं क्या?- यह सवाल अब चाय की दुकानों से लेकर सोशल मीडिया तक गूंज रहा है, आम आदमी बिना हेलमेट पकड़ा जाए ₹1000 जुर्माना, बिना नंबर प्लेट → गाड़ी जब्त लेकिन राजनीतिक रैली में, नियम वैकल्पिक, चालान अदृश्य, कानून मौन शायद कानून की किताब में अब नया अध्याय जुड़ गया है यह नियम लागू नहीं होगा, यदि वाहन पर झंडा लगा हो।
युवा नेतृत्व या जोखिम प्रबंधन प्रशिक्षण?- युवा मोर्चा युवाओं का संगठन है, युवाओं को दिशा देना इसका उद्देश्य है, लेकिन इस रैली ने युवाओं को यह दिशा दी जोश दिखाओ, होश मत ढोओ, यह नेतृत्व कम और जोखिम प्रबंधन में फेल होती ट्रेनिंग ज्यादा लगी।
विडंबना देखिए — दो दिन बचे थे- 31 जनवरी को सड़क सुरक्षा माह खत्म होना था, सिर्फ दो दिन शेष थे, लेकिन उससे पहले यह दृश्य आ गया, मानो अभियान खुद कह रहा हो मुझसे मज़ाक ही करना था तो मुझे शुरू क्यों किया?
दुर्घटना किसी की पहचान नहीं देखती- सड़क पर नेता की बाइक भी फिसलती है, कार्यकर्ता की जान भी जाती है और एम्बुलेंस यह नहीं पूछती कि आप किस संगठन से हैं? दुर्घटना केवल एक बात देखती है लापरवाही।
अंतिम कटाक्ष- “सड़क सुरक्षा माह में अगर हेलमेट पहनना ज़रूरी नहीं था, तो कम से कम यह तो याद रखा जाता कि दुर्घटना कभी चुनाव चिन्ह नहीं देखती।”
आखिरी पंक्ति (कटाक्ष में)- “सड़क सुरक्षा माह में हेलमेट पहनना ज़रूरी नहीं था, ज़रूरी था सिर्फ जोश दिखाना और जोश में जब होश उतर जाए, तो उसे ही शायद आजकल ‘युवा नेतृत्व’ कहा जाता है।”
जब सवाल खड़े हों, तो जवाब भी जरूरी हैं, अब सवाल ये नहीं हैं कि—रैली क्यों निकाली गई बल्कि सवाल ये हैं कि—
बिना हेलमेट रैली कैसे निकली?
बिना नंबर प्लेट वाहन सड़क पर कैसे दौड़े?
क्या यातायात पुलिस को जानकारी थी?
क्या कोई चालानी कार्रवाई हुई?
या फिर यह भी ‘विशेष परिस्थिति’ थी?
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