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बैकुंठपुर@ झंडा भारत का, मिठाई विदेशी — कैसी शिक्षा दे रहा स्कूल?

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बूंदी–जलेबी गायब, स्नेकर हाजिर: राष्ट्रीय पर्व बना विदेशी ब्रांड का मंच
वंदे मातरम् की गूंज, लेकिन मिठाई में अंग्रेजी सोच!
राष्ट्रीय पर्व पर देशभक्ति भाषण, बच्चों के हाथ में विदेशी चॉकलेट!
भारत माता मंच पर, थाली में इंग्लिश मिठाई — सेंट जोसेफ स्कूल फिर विवादों में
तिरंगे के नीचे विदेशी स्वाद! सेंट जोसेफ स्कूल की अनोखी देशभक्ति
राष्ट्रीय पर्व पर भारतीय संस्कार हाशिये पर, चॉकलेट बनी पहचान
देशभक्ति मंच तक सीमित, थाली में विदेशी ब्रांड का कब्ज़ा
₹5 की चॉकलेट में सिमट गई राष्ट्रीय भावना!
राष्ट्रीय पर्व पर परंपरा से खिलवाड़: सेंट जोसेफ स्कूल ने फिर बांटी विदेशी चॉकलेट
जनदर्शन से लेकर जनआक्रोश तक, फिर भी नहीं बदली स्कूल की सोच
बूंदी–जलेबी की जगह चॉकलेट, सवालों के घेरे में स्कूल प्रबंधन
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,27 जनवरी 2026(घटती-घटना)।
भारत का राष्ट्रीय पर्व केवल एक अवकाश नहीं, बल्कि देश की आत्मा,परंपरा,संस्कार और बलिदान का प्रतीक होता है, 15 अगस्त और 26 जनवरी ऐसे अवसर हैं जब पूरा देश एक सुर में ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ के साथ अपनी राष्ट्रीय चेतना को जीवंत करता है, स्कूलों में इन पर्वों का महत्व और भी अधिक होता है,क्योंकि यहीं से बच्चों के मन में देशभक्ति, संस्कृति और राष्ट्रीय मूल्यों की नींव रखी जाती है,लेकिन कोरिया जिले का सेंट जोसेफ स्कूल इन मूल भावनाओं से हर वर्ष उलट दिशा में चलता दिखाई देता है।
मंच पर भारत माता, थाली में विदेशी चॉकलेट विद्यालय परिसर में भारत माता की तस्वीर सजी होती है, राष्ट्रध्वज फहराया जाता है, देशभक्ति गीत गूंजते हैं, संविधान और स्वतंत्रता सेनानियों की बातें होती हैं, लेकिन जैसे ही मिष्ठान वितरण की बारी आती है, भारतीय परंपरा अचानक स्कूल गेट के बाहर छोड़ दी जाती है, यहां बूंदी नहीं, जलेबी नहीं, लड्डू नहीं, बल्कि बच्चों के हाथों में थमा दी जाती है, विदेशी कंपनी की अंग्रेजी चॉकलेट।
पिछली शिकायतों से भी नहीं लिया सबक- यह कोई पहली बार नहीं है, पिछले वर्ष भी यही मामला उठा था, जब राष्ट्रीय पर्व पर मिठाई के नाम पर चॉकलेट बांटे जाने को लेकर शिकायत कलेक्टर जनदर्शन तक पहुंची थी, इस विषय पर समाचार प्रकाशित हुए, जनभावनाएं सामने आईं और उम्मीद जगी कि शायद अब विद्यालय प्रबंधन अपनी सोच बदलेगा, लेकिन न व्यवस्था बदली, न परंपरा बदली, न सोच बदली, इस वर्ष सिर्फ इतना परिवर्तन किया गया कि पहले 50 पैसे और ₹1 की चॉकलेट थी, अब उसे “अपग्रेड” कर ₹5 की स्नेकर चॉकलेट कर दिया गया, यानी देशभक्ति का मूल्य बढ़ा नहीं, बस चॉकलेट की कीमत बढ़ा दी गई।
क्या चॉकलेट बन गई नई ‘राष्ट्रीय मिठाई’?- सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब भारत के राष्ट्रीय पर्वों की पहचान विदेशी ब्रांड तय करेंगे? देश में भले ही आधिकारिक रूप से कोई “राष्ट्रीय मिठाई” घोषित न हुई हो, लेकिन जलेबी को वर्षों से राष्ट्रीय मिठाई के रूप में स्वीकार किया जाता रहा है, यह बात आम जनमानस, सांस्कृतिक परंपराएं, यहां तक कि गूगल और विकिपीडिया भी स्वीकार करते हैं, इसके अलावा बूंदी दशकों से राष्ट्रीय पर्वों से जुड़ी रही है, जिसे देशभर के सरकारी कार्यालयों, स्कूलों, पुलिस लाइन और सार्वजनिक संस्थानों में आज भी वितरित किया जाता है, फिर सवाल उठता है जब पूरा देश बूंदी और जलेबी से राष्ट्रीय पर्व मनाता है, तो सेंट जोसेफ स्कूल इससे खुद को अलग क्यों समझता है?
देशभक्ति भाषणों तक ही सीमित क्यों?- विद्यालय में बच्चों को संस्कार की बातें पढ़ाई जाती हैं, भारतीय संस्कृति का पाठ पढ़ाया जाता है, नैतिक शिक्षा दी जाती है लेकिन व्यवहार में राष्ट्रीय पर्व पर विदेशी उत्पाद को प्राथमिकता देना किस शिक्षा का उदाहरण है? देशभक्ति केवल भाषणों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे प्रतीकों और परंपराओं से बनती है, अगर मिठाई जैसी छोटी बात में भी भारतीय पहचान से परहेज किया जाएगा, तो बच्चों के मन में राष्ट्रीय गौरव कैसे विकसित होगा?
परंपरा या हठधर्मिता?- अब यह परंपरा कम और हठधर्मिता अधिक प्रतीत होने लगी है, जब शिकायतें हो चुकी हैं, जनभावना स्पष्ट है, प्रशासन को अवगत कराया जा चुका है, फिर भी वही सिलसिला दोहराया जाना यह दर्शाता है कि विद्यालय प्रबंधन न तो जनभावनाओं को महत्व देता है, और न ही राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति संवेदनशील दिखाई देता है।
प्रशासन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में- सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि मामला जनदर्शन तक पहुंच चुका है, समाचार प्रकाशित हो चुके हैं, फिर भी कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं हुए, प्रशासन की यह चुप्पी भी अब अप्रत्याशित नहीं, बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण प्रतीत हो रही है।
सवाल जो अब भी जवाब मांगते हैं-
क्या राष्ट्रीय पर्व केवल औपचारिकता बनकर रह गया है?
क्या विदेशी चॉकलेट भारतीय मिठाइयों से ज्यादा सम्मान की हकदार हो गई है?
क्या आने वाली पीढ़ी को भारतीय परंपरा से दूर करने का यह मौन प्रयास नहीं है?

जब देश आज “वोकल फॉर लोकल” की बात कर रहा है, तब बच्चों के हाथों में विदेशी ब्रांड थमाना किस सोच का प्रतीक है?
राष्ट्रीय पर्व केवल झंडा फहराने का दिन नहीं- बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान को जीने का अवसर होता है, अब देखना यह होगा कि क्या विद्यालय प्रबंधन आत्ममंथन करेगा, क्या प्रशासन संज्ञान लेगा या फिर अगले राष्ट्रीय पर्व पर भी भारत माता के जयकारों के बीच बच्चों को फिर वही अंग्रेजी चॉकलेट थमा दी जाएगी।


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