- शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र : दो जांच,दो नतीजे-सिस्टम कटघरे में
- धान घोटाला या आंकड़ों का खेल? 17 दिन में कैसे भर गई कमी
- पहली जांच में भारी कमी,दूसरी में सब ठीक—किसके दबाव में बदली रिपोर्ट?
- धान खरीदी केंद्र में ‘गायब’ बोरियां अचानक कैसे लौट आईं?
- 13 हजार बोरियां उड़नछू या नोटों के बोरे भारी पड़ गए?
- धान नहीं बदला, रिपोर्ट बदल गई! घोटाला मिटा नहीं, कागजों में पूरा कर दिया गया
- पहले घोटाला, फिर क्लीन चिट—कौन चला रहा है सिस्टम?
- शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र पर बड़ा सवालः 13 हजार बोरियों का रहस्य क्या?
- धान खरीदी में बड़ा उलटफेरः कमी गायब, सवाल बरकरार



ओेंकार पाण्डेय
सूरजपुर,27 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। सूरजपुर जिले का शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र एक बार फिर ऐसे गंभीर आरोपों के घेरे में आ गया है, जिसने न केवल धान खरीदी व्यवस्था बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है,यह वही धान खरीदी केंद्र है जो हर वर्ष किसी न किसी विवाद को लेकर चर्चाओं में बना रहता है,कभी धान की कमी,कभी रिकॉर्ड में हेराफेरी,कभी माफिया की दखलअंदाजी और कभी जांच रिपोर्टों के विरोधाभास—यह केंद्र वर्षों से संदेह के घेरे में रहा है,इस वर्ष मामला इसलिए और गंभीर हो गया क्योंकि एक ही धान खरीदी केंद्र की दो जांचों में दो बिल्कुल विपरीत नतीजे सामने आए। जांच निष्पक्ष हुई — घोटाला सामने आएगा, यदि जांच प्रभावित हुई — धान हमेशा पूरा ही मिलेगा, अब देखना यह है कि शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र का सच बाहर आएगा या फिर यह घोटाला भी फाइलों और नोटों के बोरे में दबा दिया जाएगा।
पहली जांचः 7 जनवरी- 13 हजारसे अधिक बोरियों की कमी
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार 7 जनवरी 2026 को शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र का भौतिक सत्यापन किया गया,इस जांच में धान केंद्र में रखी धान की बोरियों की गिनती की गई,चट्टों का मिलान स्टॉक रजिस्टर से किया गया,मौके पर भारी विसंगति पाई गई, जांच रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख किया गया कि 13,000 से अधिक धान की बोरियां मौके पर मौजूद नहीं हैं, यह मात्रा सामान्य नहीं बल्कि सीधे तौर पर करोड़ों रुपये के सरकारी नुकसान,गंभीर आर्थिक अपराध, संगठित घोटाले की श्रेणी में आती है, पहली रिपोर्ट के बाद पूरे जिले में हड़कंप मच गया।
दूसरी जांचः 24-25 जनवरी अब कोई कमी नहीं!
पहली रिपोर्ट के ठीक 17 दिन बाद प्रशासन ने पुनः जांच दल गठित किया, यह टीम 24 जनवरी को शिवप्रसादनगर पहुंची फिर 25 जनवरी तक गिनती प्रक्रिया चली, लेकिन जब रिपोर्ट सामने आई तो नतीजा चौंकाने वाला था, धान की कोई कमी नहीं पाई गई, स्टॉक पूरी मात्रा में मौजूद बताया गया, यानि जो 13 हजार बोरियां 7 जनवरी को गायब थीं, वे 25 जनवरी तक रहस्यमय तरीके से वापस आ गईं, अब सवाल यह नहीं कि धान है या नहीं, सवाल यह है कि सच कौन-सा है?
क्या 17 दिनों में धान अपने आप लौट आया?-
स्थानीय किसानों, ट्रांसपोर्टरों और मजदूरों के अनुसार इस अवधि में किसी बड़े ट्रक मूवमेंट की जानकारी नहीं, किसी बाहरी गोदाम से धान लाने का रिकॉर्ड नहीं, न ही कोई अतिरिक्त खरीदी दर्ज तो फिर 13 हजार बोरियां आखिर आई कहां से? क्या कागजों में गिनती बदल दी गई? आंकड़ों का गणित बैठाया गया? या फिर दबाव में रिपोर्ट पलट दी गई?
गिनती की प्रक्रिया ही संदेह के घेरे में-
सूत्रों के मुताबिक दूसरी जांच के दौरान गिनती पूरी तरह बंद परिसर में हुई, बाहरी लोगों और जनप्रतिनिधियों को प्रवेश नहीं दिया गया,पूरी प्रक्रिया समिति प्रबंधक व केंद्र प्रभारी के नियंत्रण में रही, जबकि शासन की स्पष्ट गाइडलाइन कहती है एक चट्टा = अधिकतम 5000 बोरियां, चट्टों के बीच पर्याप्त दूरी, खुली निगरानी में गिनती, लेकिन शिवप्रसादनगर केंद्र में 20 से 25 हजार बोरियों के विशाल चट्टे बनाए गए, चट्टे आपस में सटाकर लगाए गए, अंदर की बोरियां दिखती तक नहीं, ऐसे में सवाल उठता है क्या बाहर की बोरियां देखकर अंदर की संख्या तय कर दी गई?
धान खरीदी केंद्र के सामने खुलेगी राइस मिल
सूत्रों का दावा है कि उसी जमीन पर अब राइस मिल तैयार की जा रही है, ठीक सामने सरकारी धान खरीदी केंद्र है वहां शासकीय बोरियां भी देखी गई हैं, जबकि खरीदी सत्र समाप्त हो चुका है, फिर नई सरकारी बोरियां वहां क्यों? किस अनुमति से रखी गईं? यह संकेत देता है कि भविष्य में इससे भी बड़े स्तर पर धान का खेल चलने वाला है।
7.7 एकड़ जमीन एक साथ ट्रांसफर
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार निम्न खसरों की जमीन स्थानांतरित हुईः 397, 398/1, 496/2, 497/1, 591/3, 595/1, 595/6, 595/7, 596/1, 596/2, 672/1, 673/2, 677/1, 686, कुल रकबाः लगभग 3.13 हेक्टेयर (करीब 7.7 एकड़ कृषि भूमि) यह कोई मामूली संपत्ति नहीं बल्कि करोड़ों की कृषि भूमि है।
वजन जांच क्यों नहीं हुई?
जांच के दौरान किसी भी बोरी का वजन नहीं तौला गया, यह सत्यापित नहीं किया गया कि बोरी 40 किलो की है या 35 किलो, केवल अनुमानित गणना के आधार पर रिपोर्ट बना दी गई, विशेषज्ञों का कहना है यदि कोई निष्पक्ष अधिकारी होता, तो पूरे चट्टे को दोबारा लगवाकर निगरानी में गिनती कराता, लेकिन ऐसा नहीं किया गया।
एक विभाग मानता है कमी, दूसरा नकारता है…
मामले में प्रशासनिक विरोधाभास भी साफ दिखता है राजस्व विभाग अब भी धान की कमी मान रहा है, खाद्य विभाग कमी से पूरी तरह इनकार कर रहा है, दोनों विभागों के आंकड़े अलग-अलग हैं, यानी घोटाला खत्म नहीं हुआ, उसे सिर्फ आंकड़ों में उलझा दिया गया।
तीन बैंकों के कर्ज के बावजूद रजिस्ट्री!
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि जरीफ उल्ला की इस जमीन पर पहले से एचडीएफसी बैंक, जिला सहकारी बैंक,छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक तीनों का ऋण दर्ज था,प्रश्न यह है कि बिना ऋण मुक्त प्रमाण पत्र,बिना बैंक अनुमति,बिना बंधक हटाए,रजिस्ट्री आखिर किस आधार पर हुई? यह सीधे तौर पर बैंक धोखाधड़ी का मामला बनता है।
धान बोया जरीफ ने,बेचा नए मालिकों ने
मामले में एक और गंभीर विसंगति सामने आई है फसल की बुआई अगस्त 2025,जमीन की बिक्री नवंबर 2025 यानि जिस किसान ने फसल बोई, वह जमीन बेच चुका था,लेकिन फार्मर पोर्टल में दर्ज है कि ‘हाँ (डीसीएस द्वारा प्राप्त)’ अर्थात फसल का भौतिक सत्यापन हुआ,धान खरीदी स्वीकृत हुई और 205 क्विंटल धान शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में नए भू-स्वामियों के खाते में खरीदा गया, जबकि नियम कहता है कि फसल बेचने का अधिकार उसी किसान को होता है जिसने फसल बोई हो, यह नियम आम किसानों पर सख्ती से लागू होता है, लेकिन इस मामले में पूरी व्यवस्था मौन दिखाई दी।
अब निगाहें कलेक्टर पर पूरा मामला अब जिला प्रशासन की साख से जुड़ चुका है, जनता जानना चाहती है…
13 हजार बोरियां आखिर गई कहां?कौन-सी जांच सही है? क्या बाहरी स्वतंत्र टीम बनेगी?
क्या प्रवर्तन एजेंसियां जांच करेंगी? अब सबकी निगाहें सूरजपुर के ईमानदार कलेक्टर पर टिकी हैं।
क्या नोटों के बंडल ने बदल दिया नतीजा?
सूत्रों के अनुसार दूसरी जांच अचानक इसलिए बैठाई गई क्योंकि ‘ऊपर तक दबाव’ बनाया गया,चर्चा है कि नोटों के बंडल का रास्ता तय हुआ, उसी दबाव में दोबारा टीम बनाई गई, पहली रिपोर्ट को अप्रासंगिक कर दिया गया, स्थानीय लोगों की जुबान पर एक ही वाक्य है धान की बोरियों से ज्यादा भारी नोटों का वजन पड़ गया।
धान माफिया का वर्षों पुराना कब्जा
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र को लेकर लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि केंद्र का संचालन वास्तविक रूप से एक प्रभावशाली धान माफिया करता है,प्रभारी और समिति प्रबंधक सिर्फ आदेश पालनकर्ता हैं,खरीदी से लेकर भंडारण तक सब कुछ बाहरी निर्देशों पर चलता है, इसी वजह से हर साल कार्रवाई से पहले मामला दब जाता है,फाइलें घूमती रहती हैं दोषी कभी सामने नहीं आता।
प्रभारी के पास करोड़ों की जमीन का सवाल
मामले में अब एक और गंभीर तथ्य सामने आ रहा है, सूत्रों के अनुसार धान खरीदी केंद्र प्रभारी साधना कुशवाहा,कथित धान माफिया के साथ मिलकर, लगभग 7.7 एकड़ जमीन की साझेदार बनी हैं यह जमीन एक ऐसे व्यक्ति से खरीदी गई, जो न्यायालय में धोखाधड़ी मामलों का आरोपी है,जिसकी जमीन बैंक ऋण में बंधक बताई जाती है,फिर सवाल उठता है बंधक जमीन की रजिस्ट्री कैसे हुई? बैंक की अनुमति किसने दी? इतनी बड़ी राशि आई कहां से?
प्रशासन मौन क्यों?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है 13 हजार क्विंटल की कमी पहले ही सामने आ चुकी,अब अचानक खरीदी विस्फोटक गति से बढ़ी,नियमों के विरुद्ध धान का चटा भरे जा रहे हैं,किसान मौके पर मौजूद नहीं फिर भी कोई विशेष जांच नहीं,कोई निलंबन नहीं,कोई एफआईआर नहीं क्या प्रशासन सिर्फ आंकड़े देख रहा है या जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
यह केवल एक खरीदी केंद्र की कहानी नहीं
यह पूरी धान खरीदी व्यवस्था पर उठता गंभीर सवाल है,यदि आज शिवप्रसादनगर को नहीं रोका गया,तो कल यही मॉडल पूरे जिले में दोहराया जाएगा,यह रिपोर्ट जनहित में उपलब्ध दस्तावेजों, स्थानीय तथ्यों व सूत्रों के आधार पर तैयार की गई है, प्रशासनिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी समान रूप से प्रकाशित किया जाएगा।
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