DMF का नया नामकरण: “डिस्ट्रिक्ट मलाई फंड”
जहां खनिज नहीं निकला, वहां भी मलाई निकल गई
कोरिया में उजाला बिजली से नहीं, बजट से जल रहा है
हाइब्रिड लाइट में चमकता भ्रष्टाचार, ₹20 हजार की लाइट, ₹66 हजार का उजाला
निविदा गई छुट्टी पर, पंचायत बनी ठेकेदार, विकास नहीं, वोल्टेज बढ़ रहा है
DMF डायरी: जहां नियम अंधेरे में और बिल रोशनी में, खनिज न्यास या मलाई न्यास?
रोशनी के नीचे होता अंधेरा, जब विकास से ज्यादा चमके बिल, DMF का करंट: जनता जले, सिस्टम चमके
हाइब्रिड लाइट के उजाले में करोड़ों की बंदरबाट, पंचायत बनी एजेंसी और ठेकेदार बने मालिक
-रवि सिंह-
कोरिया,23 जनवरी 2026(घटती-घटना)। कोरिया जिले में जिला खनिज न्यास मद अब खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास का साधन नहीं,बल्कि विकास के नाम पर मलाई निकालने की सबसे सुरक्षित मशीन बनता नजर आ रहा है, हालात ऐसे हैं कि जहां-जहां खनिज से धूल उड़नी चाहिए थी,वहां अब भ्रष्टाचार की रोशनी हाइब्रिड लाइट बनकर चमक रही है, इन लाइटों की खासियत यह नहीं कि ये एसी/डीसी पर चलती हैं, बल्कि यह है कि ये सीधे डीएमएफ के खजाने से चलती हैं।
करोड़ों का काम….लेकिन निविदा नहीं!
शासन के नियम कहते हैं करोड़ों के कार्य के लिए निविदा जरूरी है लेकिन कोरिया में नियमों का नया संस्करण लागू है निविदा से बचना हो तो काम को टुकड़ों में काट दो,यही फार्मूला अपनाकर करोड़ों के कार्य को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटा गया,ताकि टेंडर न निकालना पड़े,प्रतिस्पर्धा न हो,सवाल न उठें,और चहेते ठेकेदार आराम से काम ले जाएं,इसे प्रशासनिक भाषा में वर्क स्पि्लटिंग कहा जाता है,और जनता की भाषा में खुली बंदरबाट।
हाइब्रिड लाइटःरोशनी कम,रेट हाई वोल्टेज
अब आते हैं असली उजाले पर,सूत्रों और बाजार भाव के अनुसार हाइब्रिड एसी/डीसी स्ट्रीट लाइट की वास्तविक कीमतः15,000 से ?20,000 प्रति नग,लेकिन कोरिया जिले में वही लाइट खरीदी दिखाई जा रही है,66,000 प्रति नग यानी एक लाइट = तीन लाइटों का दाम, और फर्क = सीधा डीएमएफ से उड़ान,अगर लाइट बोल पाती तो शायद कहती मुझे उजाला फैलाने के लिए नहीं,रेट बढ़ाने के लिए खरीदा गया है।
पंचायत बनी एजेंसी, लेकिन काम किसका? इस पूरे खेल में सबसे रोचक किरदार है…ग्राम पंचायत
कागजों में…
एजेंसीः ग्राम पंचायत
कार्य स्वीकृतिः पंचायत के नाम
भुगतानःपंचायत के खाते से
लेकिन ज़मीन पर
काम कर रहा है सूरजपुर जिले का ठेकेदार
सामग्री वही ला रहा है
मजदूरी वही दे रहा है
और मुनाफा भी वही ले रहा है
अब सवाल उठता है क्या ग्राम पंचायतों के पास इंजीनियर, तकनीकी स्टाफ, ट्रांसपोर्ट और मशीनरी है?
उत्तर साफ है — नहीं…
फिर पंचायत को एजेंसी क्यों बनाया गया?
जवाब भी उतना ही साफ है क्योंकि पंचायत से टेंडर नहीं निकलता…
डीएमएफः विकास निधि या ठेकेदारी सुविधा योजना?
खनन प्रभावित क्षेत्रों के लिए बना डीएमएफ आज कोरिया में सड़क नहीं बनवा रहा, स्वास्थ्य नहीं सुधार रहा, शिक्षा नहीं बढ़ा रहा बल्कि ठेकेदार सुविधा योजना,अधिकारी-ठेकेदार सहभागिता मॉडल और पंचायत-ढाल व्यवस्था का रूप ले चुका है,पिछले कुछ वर्षों में करोड़ों रुपये पंचायतों को एजेंसी बनाकर खर्च हुए,अधिकांश कार्य बिना खुली निविदा के हुए, वही पुराने ठेकेदार हर बार सामने आए और हर बार जवाब मिला सब नियमों के अनुसार है।
जहां सड़क चौड़ीकरण होना है,वहीं लाइट लगाने की तैयारी!
भ्रष्टाचार जब जल्दबाजी में किया जाए तो विवेक छुट्टी पर चला जाता है, ऐसा ही हुआ खरवत से जमगहना मार्ग, जो वर्षों से सड़क चौड़ीकरण की मांग पर है उसी सड़क किनारे नई-नई लाइटें लगाने की तैयारी कर दी गई, स्थानीय लोगों ने पूछा जब सड़क चौड़ीकरण होगा तो ये लाइटें उखड़ेंगी या दोबारा लगेंगी? जवाब किसी के पास नहीं था।
जनता बोली, विधायक जागे
जिला मुख्यालय के नागरिकों ने जब यह मुद्दा उठाया और क्षेत्रीय विधायक को बताया कि यह तो सीधे-सीधे सरकारी पैसे की खुदाई है, तब जाकर विधायक ने जिला प्रशासन को निर्देश दिए, सड़क चौड़ीकरण तक यह कार्य रोकने को कहा सूत्रों के अनुसार, इस मार्ग से लगी पंचायतों में काम फिलहाल स्थगित कर दिया गया है।
लेकिन बाकी पंचायतों में ‘उजाला’ अब भी जारी
जहां सड़क चौड़ीकरण का बहाना नहीं है वहां लाइटें धड़ल्ले से लग रही हैं दर वही ?66,000, एजेंसी वही पंचायत, ठेकेदार वही पसंदीदा यानी एक सड़क बच गई, बाकी पंचायतें अब भी उजाले में नहा रही हैं, 20 हजार की लाइट, 66 हजार का उजाला,बाजार में जो लाइट बीस हजार की है,वही पंचायत की फाइल में बन जाती है चौहत्तर हजार की,अब कोई पूछे इतनी महंगी क्यों? तो जवाब तैयार है यह हाइब्रिड है। हाँ, बिल्कुल सही, इसमें आधी बिजली और आधा भ्रष्टाचार चलता है।
डीएमएफ का नया फुल फॉमर्: “डिस्टि्रक्ट मलाई फंड”—
कोरिया की हाइब्रिड लाइट में चमकता लोकतंत्र, कहते हैं अंधेरा वहां होता है जहां रोशनी नहीं होती, लेकिन कोरिया जिले में अंधेरा अब रोशनी में हो रहा है,वो भी हाइब्रिड एसी/डीसी लाइट की जगमगाहट में,यह लाइट कोई साधारण लाइट नहीं है,यह बिजली से नहीं,डीएमएफ से चलती है।
सबसे बड़ा सवालःये सब किसके आदेश से? अब सवाल प्रशासन से नहीं…व्यवस्था से है…?
कार्य को टुकड़ों में बांटने का आदेश किसने दिया?
पंचायतों को एजेंसी किस नियम से बनाया गया?
बाजार से तीन गुना दर किस आधार पर स्वीकृत हुई?
सूरजपुर का ठेकेदार कोरिया में कैसे सक्रिय हुआ?
और क्या यह सब बिना प्रशासनिक संरक्षण संभव है?
उजाले में किया गया अंधेरा
कोरिया जिले में डीएमएफ मद का यह मामला साबित करता है कि भ्रष्टाचार अब अंधेरे में नहीं, बल्कि हाइब्रिड लाइट की रोशनी में किया जा रहा है, जहां विकास होना था,वहां अब सिर्फ बिल चमक रहे हैं, यदि समय रहते विशेष ऑडिट,तकनीकी जांच,दरों का तुलनात्मक मूल्यांकन और उच्चस्तरीय जांच नहीं हुई, तो डीएमएफ का अर्थ जिले में यही रह जाएगा—District Mineral Fund Ùãè΄, District Money FlowÐ और जब अगली बार गांव में लाइट जले,तो याद रखिए—यह उजाला बिजली से नहीं,जनता की जेब से आया है।
राजनीतिक व्यंग्य कॉलम
(जनहित में जारी,व्यंग्य मात्र)
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