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बैकुण्ठपुर@ बैंक या ब्याज का अड्डा? यूको बैंक बैकुंठपुर पर सवाल, जांच कब?

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  • जब बैंक पर भरोसा डगमगाए: यूको बैंक बैकुंठपुर को लेकर चुप्पी क्यों?
  • यूको बैंक बैकुंठपुर में भूचाल: शाखा प्रबंधक हटेगा या घोटाला दबेगा?
  • आरोपों की परतें खुलीं, जवाब बाकी: यूको बैंक बैकुंठपुर की जांच कब होगी?
  • मुद्रा लोन से सूदखोरी तक: यूको बैंक बैकुंठपुर पर निष्पक्ष जांच की मांग
  • शाखा प्रबंधक को हटाकर तत्काल जांच दल बैठाने की मांग तेज
  • कर्मचारियों की चुप्पी, दस्तावेज़ों में छिपे राज और लोन घोटाले की आशंका


-न्यूज डेस्क-
बैकुण्ठपुर,12 जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
बैकुंठपुर स्थित यूको बैंक की शाखा एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है,शहर में अब खुलकर यह मांग उठने लगी है कि बैकुंठपुर शाखा प्रबंधक को तत्काल पद से हटाकर स्वतंत्र जांच दल गठित किया जाए,ताकि बैंक में हुए कथित लोन गड़बडि़यों की निष्पक्ष जांच हो सके,स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम हो चुकी है कि यदि शाखा प्रबंधक को हटाकर जांच बैठा दी गई,तो बैंक के भीतर वर्षों से चल रही कई अनियमितताएं और कथित घोटाले सामने आ सकते हैं, स्थानीय लोगों, सूत्रों और बैंकिंग जानकारों का कहना है कि यदि शाखा प्रबंधक को हटाकर जांच बैठा दी गई, तो बैंक में वर्षों से दबे कई राज एक-एक कर सामने आ सकते हैं, बैकुंठपुर स्थित यूको बैंक की शाखा को लेकर बीते दिनों लगातार कई समाचार प्रकाशित किए जा चुके हैं,जिनमें एक के बाद एक गंभीर आरोप,सवाल और दस्तावेज़ी संकेत सामने आए हैं,इन खबरों ने स्पष्ट किया कि मामला केवल अफवाह नहीं, बल्कि एक सिलसिलेवार खुलासों का रूप ले चुका है, बैकुंठपुर यूको बैंक से जुड़ा यह मामला अब केवल स्थानीय चर्चा तक सीमित नहीं रह गया है,यह मामला बैंकिंग पारदर्शिता,सार्वजनिक धन की सुरक्षा, और आम नागरिकों के भरोसे से जुड़ गया है, अब निगाहें बैंक प्रबंधन और जांच एजेंसियों पर टिकी हैं कि क्या शाखा प्रबंधक को हटाकर जांच बैठाई जाएगी? या फिर आरोपों की फाइलें यूं ही धूल खाती रहेंगी? आने वाले दिनों में १० यह साफ हो जाएगा कि यह सिर्फ आरोप हैं या एक बड़े घोटाले की आहट।
आरोप नहीं, अब जवाब चाहिए- बैकुंठपुर स्थित यूको बैंक की शाखा को लेकर बीते कुछ सप्ताहों में जो कुछ सामने आया है, वह अब महज़ “आरोप” नहीं रह गया है, यह एक लगातार प्रकाशित होती चेतावनियों की श्रृंखला है, जो बैंकिंग व्यवस्था, सार्वजनिक धन और आम नागरिकों के भरोसे से सीधे टकराती है, जब एक ही संस्था को लेकर बार-बार अनियमितताओं की बात सामने आए, अलग-अलग पीड़ित एक जैसी शिकायतें करें, कर्मचारी दबी ज़ुबान में सच होने के संकेत दें तो सवाल यह नहीं रहता कि “खबर सही है या नहीं”, सवाल यह हो जाता है कि अब तक जांच क्यों नहीं हुई?
शाखा प्रबंधक हटेगा, तो सच बोलेगा स्टाफ- सूत्रों के अनुसार, वर्तमान स्थिति में बैंक के कई कर्मचारी खुलकर बोलने से बच रहे हैं, कर्मचारियों का कहना है कि शाखा प्रबंधक के पद पर बने रहने से वे खुलकर तथ्य रखने में असहज हैं, इसलिए दबी ज़ुबान में, बिना नाम सामने लाए, जानकारी दे रहे हैं, सूत्र यह भी बताते हैं कि यदि शाखा प्रबंधक को जांच अवधि के दौरान हटाया गया, तो बैंक कर्मचारी बिना दबाव के यह बता सकेंगे कि किन परिस्थितियों में लोन स्वीकृत हुए, किन दस्तावेज़ों की अनदेखी की गई, और किस तरह नियमों को दरकिनार किया गया।
लोन वितरण में गड़बड़ी की आशंका- शहर में यह आरोप गंभीरता से लगाए जा रहे हैं कि लोन स्वीकृति प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं थी,कुछ मामलों में लोन नियमों के विपरीत दिए गए, और लोन के बदले अवैध लेन-देन की भी चर्चा है, सूत्रों का दावा है कि यदि बैंक विभाग द्वारा मुद्रा लोन, अन्य छोटे व मध्यम ऋण, के दस्तावेज़ों की लाइन-बाय-लाइन जांच कराई जाए, तो कई ऐसे लोन सामने आ सकते हैं जिन पर गंभीर सवाल खड़े होंगे।
भाई के साथ गठजोड़ के आरोप- इस पूरे मामले में शाखा प्रबंधक के भाई की भूमिका को लेकर भी लगातार आरोप सामने आ रहे हैं, कहा जा रहा है कि लोन दिलाने के नाम पर, कथित रूप से रिश्वत का खेल चला, और उसी पैसे से सूदखोरी का अवैध धंधा फलता-फूलता रहा, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन स्थानीय स्तर पर शिकायतों की संख्या बढ़ना बैंक प्रबंधन के लिए चिंता का विषय बन गया है।
जांच क्यों ज़रूरी मानी जा रही है- स्थानीय लोगों और जानकारों का कहना है कि जब तक शाखा प्रबंधक पद पर बना रहेगा,निष्पक्ष जांच संभव नहीं है, दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ या दबाव की आशंका बनी रहेगी, इसी कारण यह मांग तेज हो रही है कि शाखा प्रबंधक को तत्काल हटाया जाए, बाहरी या क्षेत्रीय स्तर की जांच टीम गठित की जाए, सभी लोन फाइलों की फॉरेंसिक जांच हो, बैंकिंग जानकारों का मानना है कि जब तक शाखा प्रबंधक पद पर बना रहेगा, निष्पक्ष जांच संभव नहीं है, दस्तावेज़ों से छेड़छाड़ या कर्मचारियों पर दबाव की आशंका बनी रहेगी, इसी कारण अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि शाखा प्रबंधक को तत्काल हटाया जाए, क्षेत्रीय/बाहरी अधिकारियों की जांच टीम बनाई जाए, सभी लोन फाइलों की गहन जांच हो
बैंक प्रबंधन की चुप्पी- अब तक इस पूरे मामले पर बैंक के उच्च अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, यह चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है, यदि आरोप निराधार हैं, तो स्पष्टीकरण क्यों नहीं? और यदि आरोपों में सच्चाई है, तो कार्रवाई में देरी क्यों?
पूर्व में प्रकाशित रिपोर्टें क्या कहती हैं? (संक्षेप में पुनरावलोकन)

  1. बैंक है या ब्याज की मंडी?- पहली रिपोर्ट में यह सवाल उठाया गया कि क्या यूको बैंक बैकुंठपुर मुद्रा लोन की आड़ में ब्याज, दबाव और डर का केंद्र बनता जा रहा है, यहीं से शाखा प्रबंधक और उनके भाई के कथित गठजोड़ की चर्चा सामने आई।
  2. अंदर मैनेजरज् बाहर भाई?- दूसरी रिपोर्ट में बैंक के अंदर–बाहर एक समानांतर तंत्र की आशंका जताई गई, आरोप लगे कि सार्वजनिक बैंक का उपयोग निजी फायदे के लिए किया जा रहा है।
  3. मुद्रा लोन से मौज, बैंक से नुकसान- तीसरी रिपोर्ट में दावा किया गया कि मुद्रा लोन का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों की जगह सूदखोरी और निजी वसूली में इस्तेमाल हो रहा है, जिससे बैंक को संभावित नुकसान और एनपीए का खतरा है।
  4. किराया विवाद, नेटवर्क और नियमों से बाहर संचालन- इसके बाद शाखा संचालन, भवन परिवर्तन और नियमों की अनदेखी पर सवाल उठे जो यह दर्शाते हैं कि मामला सिर्फ लोन तक सीमित नहीं है।
  5. बैंक नहींज् कर्ज का जाल!- सबसे गंभीर रिपोर्ट में 18–22 वर्ष के युवाओं को कर्ज में फंसाने, फर्जी हस्ताक्षर, चेक बाउंस और कानूनी दबाव जैसे आरोप सामने आए, यहां जांच की मांग खुलकर रखी गई।
    अख़बार का सवाल: अब चुप्पी किस बात की?- अगर ये खबरें गलत हैं तो बैंक प्रबंधन को सामने आकर कहना चाहिए कि गलत हैं, अगर इनमें सच्चाई है तो शाखा प्रबंधक को पद पर बनाए रखना जांच को कमजोर करना माना जाएगा, बैंक कर्मचारी अगर सच जानते हुए भी नहीं बोल पा रहे, तो यह भी एक संकेत है कि जांच बिना हटाए संभव नहीं है।
    सार्वजनिक बैंक, निजी खेल?- सार्वजनिक बैंकों का पैसा जनता का पैसा होता है, मुद्रा लोन गरीबों और युवाओं के लिए होते हैं उन्हें सूदखोरी की पूंजी में बदल देना केवल आर्थिक अपराध नहीं, सामाजिक अपराध भी है।
    अब मांग साफ है
    शाखा प्रबंधक को तत्काल हटाया जाए
    बाहरी/क्षेत्रीय स्वतंत्र जांच दल गठित हो
    सभी लोन फाइलों की दस्तावेज़ी और फॉरेंसिक जांच हो
    पीड़ितों और कर्मचारियों को बिना डर बयान देने का मौका मिले


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