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एमसीबी/मनेन्द्रगढ़@ 43 करोड़ की मनेन्द्रगढ़–चिरमिरी सड़क भ्रष्टाचार की भेंट

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गिट्टी की जगह मिट्टी, फर्जी बिल, धमकियाँ और धूल जांच में उजागर हुआ बड़ा खेल
एमसीबी/मनेन्द्रगढ़,07 जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ के नवगठित जिलों में शामिल मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी को जोड़ने वाली लगभग 43 करोड़ रुपये की बहुप्रतीक्षित सड़क परियोजना इन दिनों गंभीर आरोपों के घेरे में है, स्थानीय जनप्रतिनिधियों, नागरिकों और राहगीरों का आरोप है कि सड़क निर्माण में भारी अनियमितताएँ बरती जा रही हैं, जहाँ मानकों के अनुसार गिट्टी (जीएसबी) डाली जानी थी,वहाँ मिट्टी और स्टोन डस्ट भर दी गई। साथ ही फर्जी बिल लगाकर करोड़ों रुपये निकालने की कोशिश की जा रही है, मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी सड़क परियोजना विकास की रीढ़ बन सकती थी, लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत और ठेकेदार की लापरवाही ने इसे भ्रष्टाचार का प्रतीक बना दिया है,अब देखना यह है कि प्रशासन सख्ती दिखाकर मानक निर्माण सुनिश्चित करता है या जनता को धूल,गड्ढों और टूटती सड़कों पर सफर करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
शिकायतों के बाद जांच, उखाड़ने के निर्देश- लगातार मिल रही शिकायतों के बाद 31 दिसंबर को अंबिकापुर से वरिष्ठ अधिकारियों की टीम ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया। खुदाई के दौरान सामने आया कि जहाँ 4–5 फीट तक प्योर जीएसबी मटेरियल भरना अनिवार्य था, वहाँ ठेकेदार ने महज 1–1.5 फीट गिट्टी डालकर ऊपर से मिट्टी/डस्ट का मिश्रण भर दिया। जांच दल ने इसे घोर लापरवाही और धोखाधड़ी मानते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि पूरी सड़क को उखाड़कर फिर से मानक सामग्री से निर्माण किया जाए। साथ ही चेतावनी दी गई कि गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ तो बिल भुगतान रोक दिया जाएगा और इंजीनियर व टाइमकीपर पर निलंबन तक की कार्रवाई हो सकती है।
‘सेटिंग’ और ट्रांसफर की धमकी के आरोप- स्थानीय सूत्रों के अनुसार, जांच के दौरान ठेकेदार अधिकारियों के सामने तो हामी भरता रहा, लेकिन बाद में मुख्य अभियंता को ट्रांसफर करा देने जैसी धमकियाँ देने की बातें सामने आईं, यह भी चर्चा है कि “कमीशन” को लेकर असहमति के बाद ही जांच तेज हुई। यदि ये आरोप सत्य हैं, तो यह न सिर्फ परियोजना बल्कि पूरे तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
धूल–प्रदूषण से जनता बेहाल- निर्माण नियमों के मुताबिक धूल नियंत्रण के लिए नियमित पानी छिड़काव जरूरी है, लेकिन मौके पर इसका पालन नहीं मिला, मोटरसाइकिल, ऑटो और जीप से सफर करने वाले लोग धूल में घुटते नजर आए। इस पर निरीक्षण दल ने विभागीय अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई और तत्काल छिड़काव के निर्देश दिए। स्थानीय नागरिकों ने चेताया है कि हालात नहीं सुधरे तो वे एनजीटी में शिकायत दर्ज कराएंगे।
पुल–पुलिया में भी घटिया काम- सड़क के साथ बन रही पुल–पुलियाओं में भी अनियमितताएँ मिलीं। 40 टन क्षमता की सड़क के लिए जहाँ एमपी-4 ग्रेड ह्यूम पाइप अनिवार्य हैं, वहाँ घटिया/टूटे पाइप लगाए गए। कई जगहों पर पाइप टूटे पाए गए, जिन्हें सीमेंट से ढककर नया दिखाने का प्रयास किया गया। जांच अधिकारियों ने साफ कहा कि मानक पाइप बदले जाएँ, अन्यथा भुगतान नहीं होगा।
पुराना रिकॉर्ड भी सवालों में- स्थानीय लोगों का कहना है कि इसी ठेकेदार द्वारा पूर्व में बनाए गए कुछ पुल टूट चुके हैं, जिन्हें बाद में विभाग को दोबारा बनवाना पड़ा था। अब आरोप है कि पुराने पाइपों पर लेपन कर फर्जी बिल लगाने की कोशिश फिर से हो रही है।
लागत बनाम गुणवत्ता- सूत्रों के मुताबिक, गुणवत्ता बनाए रखने के लिए करीब 3.5 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर खर्च होने चाहिए, इसके बावजूद सामग्री में कटौती कर मुनाफा बटोरने की कोशिश सामने आई है। इससे न सिर्फ सरकारी खजाने को नुकसान हो रहा है, बल्कि आम जनता की सुरक्षा भी खतरे में पड़ रही है।
7 दिन बाद भी सुधार नहीं- जांच के सात दिन बीत जाने के बावजूद ठेकेदार पर निर्देशों का असर नहीं दिख रहा। आरोप है कि रातों-रात फिर से मिट्टी भरकर काम आगे बढ़ाया जा रहा है और अधिकारियों व जनता की आँखों में धूल झोंकी जा रही है।
सवाल जो प्रशासन से जवाब मांगते हैं
जब वरिष्ठ अधिकारी गड़बड़ी पकड़ चुके हैं, तो सुधार में देरी क्यों?
बाहर के ठेकेदार–अधिकारी मिलकर जनता की गाढ़ी कमाई कैसे लूट पा रहे हैं?
क्या दोषियों पर वास्तविक कार्रवाई होगी या मामला ठंडे बस्ते में जाएगा?


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