- आदिवासी बच्चों के हक पर डाका—कार्रवाई अधूरी, सवाल सरकार से
- एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय पोड़ीडीह घोटाला
- जांच 2021 में, कार्रवाई 2025 में….‘गुम’ फाइल, अधूरी कार्रवाई और आदिवासी बच्चों के हक पर सबसे बड़ा सवाल*
- एकलव्य पोड़ीडीह घोटाला: जांच 2021 में, कार्रवाई 2025 में… खबर छपी तो ‘गुम’ फाइल मिली
- मीडिया ने पूछा सवाल, प्रशासन जागा: एकलव्य पोड़ीडीह घोटाले की जांच फाइल आखिरकार मिली
- चार साल की चुप्पी, 10 दिन की खोज: एकलव्य विद्यालय पोड़ीडीह घोटाले की फाइल बाहर आई
- जांच पूरी, कार्रवाई अधूरी: एकलव्य पोड़ीडीह में करोड़ों के घोटाले पर सिस्टम की नींद

-रवि सिंह-
कोरिया/एमसीबी,04 जनवरी 2026 (घटती-घटना)। एकलव्य आदर्श संयुक्त आवासीय विद्यालय पोड़ीडीह में वर्ष 2018 से 2021 के बीच हुए करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार का मामला एक बार फिर प्रशासनिक और राज नीतिक गलियारों में चर्चा का केंद्र बन गया है,इस प्रकरण में जो सामने आया है,वह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि देरी,संरक्षण और जवाबदेही से बचने की पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
बता दे कि एकलव्य आदर्श संयुक्त आवासीय विद्यालय पोड़ीडीह विकासखंड खड़गवां में करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय गड़बडि़यों का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है, वर्ष 2018 से 2021 के बीच हुए गंभीर भ्रष्टाचार की जांच 2021 में पूरी हो चुकी थी,लेकिन कार्रवाई शुरू होने में चार साल लग गए,वह भी पूरी नहीं—अब तक सिर्फ 3 अधीक्षकों को निलंबित किया गया है,जबकि कुल 10 दोषियों के नाम जांच में सामने आए थे,सरगुजा संभाग शिक्षा विभाग ने वित्तीय अनुशासन के उल्लंघन के एक गंभीर मामले में सख्त रुख अपनाते हुए शिक्षक को निलंबित कर दिया है, संभागीय संयुक्त संचालक (शिक्षा), सरगुजा संभाग, अंबिकापुर द्वारा जारी आदेश के अनुसार यह कार्रवाई कलेक्टर कोरिया से प्राप्त जांच प्रतिवेदन के आधार पर की गई। आदेश में उल्लेख है कि राम कुमार खुंटे,अनिल कुमार साहू व रजनी तिग्गा सहायक शिक्षक, शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बोड़ा,विकासखंड भरतपुर,जिला एमसीबी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है। जांच में पाया गया कि एकलव्य विद्यालय पोड़ीडीह, विकासखंड खड़गांव में वर्ष 2017-18 से 2021-22 की अवधि के दौरान आय-व्यय, सामग्री खरीदी और उपकरणों के संधारण में गंभीर अनियमितताएं हुईं।
नियमों का उल्लंघन- आदेश के अनुसार यह कृत्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम 1965 तथा संबंधित वित्तीय नियमों का उल्लंघन है। इसके चलते छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के नियम 9(1)(क) के अंतर्गत निलंबन की कार्रवाई की गई।
निलंबन अवधि की व्यवस्था- निलंबन अवधि में श्री खुंटे, साहू व श्रीमती तिग्गा का मुख्यालय कार्यालय विकासखंड शिक्षा अधिकारी, मनेन्द्रगढ़, जिला एमसीबी निर्धारित किया गया है, इस दौरान वे नियमानुसार जीवन निर्वाह भत्ता प्राप्त करने के पात्र होंगे।
विभाग का संदेश- शिक्षा विभाग की इस कार्रवाई को शासकीय विद्यालयों में पारदर्शिता, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने की दिशा में कड़ा संदेश माना जा रहा है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि सरकारी धन के दुरुपयोग या नियमों की अनदेखी करने वालों पर आगे भी कठोर कार्रवाई जारी रहेगी।
2021 में जांच पूरी, 2025 में पहली कार्रवाई- सबसे चौंकाने वाली सच्चाई यह है कि इस मामले की जांच वर्ष 2021 में पूरी हो चुकी थी, जांच रिपोर्ट में सामग्री खरीदी, स्टॉक संधारण, भुगतान, भौतिक सत्यापन और छात्रावास संचालन से जुड़ी गंभीर अनियमितताओं की पुष्टि हुई थी, जांच में कुल 10 अधिकारियों/कर्मचारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी, इसके बावजूद चार वर्षों तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, इस दौरान सरकार बदली—पहले कांग्रेस, फिर भाजपा—लेकिन आदिवासी बच्चों के हक की फाइल वहीं अटकी रही।
मीडिया ने उठाया सवाल, 10 दिन में “गुम” फाइल मिल गई- 6 दिसंबर 2025 को दैनिक घटती-घटना ने प्रमुखता से यह खबर प्रकाशित की कि एकलव्य विद्यालय पोड़ीडीह के भ्रष्टाचार से जुड़ी महत्वपूर्ण जांच फाइल “गुम” है, खबर छपने के 10 दिन बाद वही फाइल कलेक्टर कार्यालय कोरिया में मिलने की पुष्टि हुई, यह तथ्य अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा करता है—अगर फाइल सच में गुम थी, तो 10 दिन में कैसे मिल गई? और अगर मिल सकती थी, तो चार साल तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
खबर के बाद हरकत में आया प्रशासन, कलेक्टर ने मांगी जवाबदेही- फाइल मिलने के बाद 15 दिसंबर 2025 को कलेक्टर (आदिवासी विकास), कोरिया ने जिला शिक्षा अधिकारी, कोरिया एवं जिला शिक्षा अधिकारी, मनेन्द्रगढ़–चिरमिरी–भरतपुर को पत्र जारी कर जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू की, पत्र में स्पष्ट सवाल किए गए जांच पूरी होने के बावजूद अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? वर्ष 2017–18 से 2021–22 तक विद्यालय में पदस्थ प्राचार्य/प्रभारी प्राचार्य एवं छात्रावास अधीक्षक कौन-कौन थे? कार्रवाई किस स्तर पर रुकी और फाइल किसके पास लंबित रही?
दो अधीक्षक निलंबित, लेकिन 10 में से सिर्फ 3 पर कार्रवाई- अब तक की सबसे ठोस कार्रवाई के तौर पर दो छात्रावास अधीक्षकों राजकुमार खूटे, अनिल साहू व रजनी तिग्गा को निलंबित किया गया है, लेकिन जांच में जिन 10 लोगों की भूमिका सामने आई थी, उनमें से 7 अब भी कार्रवाई से बाहर हैं, शेष मामलों को डीपीआई (लोक शिक्षण संचालनालय) भेजे जाने की बात कही जा रही है, पर समय-सीमा और परिणाम अस्पष्ट हैं।
‘बड़े नाम’ अब भी सुरक्षित क्यों?- सूत्रों के अनुसार जिन पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है, उनकी प्रशासनिक और राजनीतिक पहुंच कार्रवाई में सबसे बड़ी बाधा बन रही है। यही वजह है कि शुरुआत तो हुई, लेकिन निशाना सिर्फ निचले स्तर तक सीमित रहा।
जांच में सामने आई प्रमुख बातें
सामग्री खरीदी के लिए निविदा प्रक्रिया और आवश्यक पंजियों का संधारण नहीं किया गया।
खरीदी गई सामग्री का क्रय पंजी एवं स्टॉक पंजी में समुचित दर्ज नहीं पाया गया।
भौतिक सत्यापन के दौरान खरीदी गई सामग्री पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं मिली।
समस्त प्रक्रिया में वित्तीय नियमों की अनदेखी की गई, जिससे प्रथम दृष्टया वित्तीय अनियमितता सिद्ध हुई।
जिम्मेदारी बनाम कार्यकाल: किसके दौर में क्या हुआ?
प्राचार्य/प्रभारी प्राचार्य स्तर
सुश्री बी. बड़ा (मार्च 2017–10.12.2019): क्रय समिति रिकॉर्ड नहीं, स्टॉक पंजी अधूरा।
श्री शैलेन्द्र कुमार मिश्रा (10.12.2019–10.02.2021): सर्वाधिक व्यय, बिना क्रय समिति बैठक—घोटाले का मुख्य कालखंड।
श्री ललित शुक्ला (10.02.2021–18.03.2021): अव्यवस्था बनी रही।
श्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा (18.03.2021–12.11.2021): बिना बैठक क्रय पंजी पर हस्ताक्षर।
श्री भागवत सिंह (12.11.2021–वर्तमान): दस्तावेज उपलब्ध कराए, पुरानी गड़बडç¸यां उजागर।
छात्रावास स्तर
अनिल कुमार साहू: प्रक्रिया में लापरवाही।
रामकुमार खुटे: निजी वाहन पर सरकारी भत्ता।
रजनी तिग्गा: क्रय/सत्यापन प्रक्रिया में लापरवाही।
रामप्रसाद सिंह: निरीक्षण में सामग्री गायब।
संभावित जिम्मेदार: तत्कालीन ष्ठश्वह्र, आदिवासी विकास विभाग के अधिकारी और वे स्तर जहाँ जांच रिपोर्ट वर्षों तक दबाई गई।
सबसे संवेदनशील सवाल
अगर जांच पूरी थी, तो कार्रवाई किसने रोकी?
फाइल वर्षों तक किस अधिकारी के पास पड़ी रही?
क्या विभागों के बीच तालमेल की कमी थी या संरक्षण आधारित चुप्पी?
और सबसे अहम—अगर मीडिया दबाव न होता, तो क्या आज भी फाइल गुम रहती?
अब नजर आगे की कार्रवाई पर- अब जबकि फाइल मिल चुकी है और कलेक्टर ने औपचारिक रूप से जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, बड़ा सवाल यही है, क्या यह मामला सिर्फ पत्राचार तक सीमित रहेगा या सभी 10 दोषियों पर समान, निष्पक्ष और समयबद्ध कार्रवाई होगी? दैनिक घटती-घटना इस पूरे प्रकरण पर नजर बनाए रखेगा, क्योंकि यह केवल एक फाइल का मामला नहीं, बल्कि आदिवासी बच्चों के भोजन, शिक्षा और भविष्य का सवाल है, “खबर छपी तो फाइल मिली वरना आदिवासी बच्चों का हक दबा ही रहता।”
सबसे बड़ा सवाल- अब सवाल सीधा और कठोर है क्या मंत्री जी अपने ही क्षेत्र के आदिवासी बच्चों के हक पर डाका डालने वाले सभी 10 दोषियों पर कार्रवाई कर पाएंगे? या फिर यह मामला भी पहले की तरह आंशिक कार्रवाई और संरक्षण की राजनीति में दबा दिया जाएगा? दो अधीक्षकों का निलंबन शुरुआत है, न्याय नहीं, जब तक सभी दोषियों पर समान और समयबद्ध कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह सवाल जिंदा रहेगा कि आदिवासी बच्चों के हक की कीमत क्या सिर्फ दो निलंबन ही है?
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