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कोरिया@मुद्रा लोन से मौज,बैंक से नुकसान!

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  • यूको बैंक बैकुंठपुर में नियम बाहर,नेटवर्क अंदर?
  • यूको बैंक बैकुंठपुरःकिराया विवाद से लेकर लोन तक,सवालों के घेरे में शाखा प्रबंधन…
  • दो साल बिना किराया,फिर चुपचाप शिफ्टिंग…यूको बैंक में किस नियम से हुआ खेल?
  • ऋ ण,एनपीए और कथित नेटवर्क : यूको बैंक बैकुंठपुर पर जांच की मांग तेज…
  • शाखा प्रबंधक हटे तो खुलेगा सच? यूको बैंक बैकुंठपुर में निष्पक्ष जांच की दरकार…
  • आनंद–विशाल की भूमिका पर सवाल : यूको बैंक की साख दांव पर…
  • किराया नहीं,नियम नहीं…क्या यूको बैंक बैकुंठपुर मनमानी से चल रहा है?
  • नियमों को बंधक बनाकर लोन बांटे गए? यूको बैंक बैकुंठपुर में बड़ा खुलासा…


-रवि सिंह-
कोरिया,04 जनवरी 2026(घटती-घटना)।
क्या किसी सार्वजनिक बैंक की शाखा संस्था के नियमों से संचालित होती है,या फिर एक व्यक्ति की मजऱ्ी से बैकुंठपुर स्थित यूको बैंक बैकुंठपुर शाखा को लेकर उठे ताज़ा सवाल इसी मूल प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमते हैं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की नींव भरोसे,नियमों और पारदर्शिता पर टिकी होती है,लेकिन यूको बैंक बैकुंठपुर शाखा को लेकर सामने आए घटनाक्रम ने इन मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, पूर्व में प्रकाशित खबरों,स्थानीय शिकायतों और सूत्रों से प्राप्त जानकारियों को समेटते हुए यह विस्तृत समाचार बैंक प्रबंधन, ऋ ण प्रक्रिया,किराया विवाद और कथित नेटवर्क पर उठे तमाम प्रश्नों को एक साथ रखता है,सार्वजनिक बैंकों की पहचान पारदर्शिता, नियम और जनहित से होती है। लेकिन यूको बैंक बैकुंठपुर शाखा को लेकर सामने आए मामलों ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है,क्या बैंक नियमों से चलता है, या कुछ व्यक्तियों की मजऱ्ी से? पूर्व में प्रकाशित खबरों,स्थानीय शिकायतों और सूत्रों से मिली जानकारियों को समेटते हुए यह समेकित (कम्पाइल्ड) रिपोर्ट प्रस्तुत है, यूको बैंक जैसी सार्वजनिक संस्था की पहचान नियम, भरोसा और जवाबदेही से है, किसी एक व्यक्ति या नेटवर्क से नहीं। यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है,तो दस्तावेज़ सामने लाए जाएँ,और यदि नहीं,तो निष्पक्ष जांच के बाद दंडात्मक कार्रवाई हो,जनता का बैंक, जनता के भरोसे से ही चलता है।
किराया अनुबंधः नियम क्या कहते हैं?
आरोप है कि जिस भवन में बैंक वर्षों से किराये पर संचालित था, अनुबंध समाप्त होने के बाद भी करीब दो वर्ष तक बिना किराया भुगतान के बैंक चलता रहा,इसके बाद वर्तमान शाखा प्रबंधक आनंद के कार्यकाल में बैंक को बिना बकाया किराया चुकाए दूसरे भवन में स्थानांतरित कर दिया गया,आरोप है कि बैंक जिस भवन में किराये पर संचालित था,इसके बाद वर्तमान शाखा प्रबंधक आनंद के कार्यकाल में बैंक को बकाया किराया चुकाए बिना दूसरे भवन में स्थानांतरित कर दिया गया,मकान मालिक का दावा है कि उनकी अनुपस्थिति में परिसर खाली कर दिया गया और वे कागजी प्रक्रियाओं/शिकायतों में उलझे रह गए, सवाल साफ है क्या अनुबंध समाप्ति के बाद बिना भुगतान बैंक चलाना बैंकिंग नियमों के अनुरूप है? क्या मकान मालिक की अनुपस्थिति में परिसर खाली करना वैधानिक प्रक्रिया का पालन करता है? क्या स्थानांतरण से पहले बकाया भुगतान/समझौता निपटान हुआ? मकान मालिक का दावा है कि वे कागजी प्रक्रियाओं में उलझे रह गए और शिकायतें दर्ज कराने तक ही सीमित रह गए, जबकि बैंक परिसर खाली कर दिया गया।
कथित प्रोपेगेंडा और साख का सवाल…
स्थानीय सूत्रों के अनुसार,विवाद के बीच बैंक की छवि को प्रभावित करने वाले विरोधाभासी बयान सामने आ रहे हैं। आरोप यह भी है कि शाखा प्रबंधक आनंद और उनके भाई विशाल के कारण बैंक की साख को आंच पहुँच रही है, यहां यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि ये आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
ऋ ण प्रकरणों पर गंभीर आरोप…
विशेष सूत्रों का दावा है कि कुछ ऋण मामलों में अनुचित लाभ की बात कही जा रही है,कहीं नकद,कहीं खाते में ट्रांसफर के आरोप। यदि खातों और लेन-देन का ऑडिट किया जाए तो कई राज़ खुलने की बात कही जा रही है,इन दावों की सत्यता जांच के बिना तय नहीं की जा सकती, लेकिन सार्वजनिक बैंक होने के नाते पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है।
ऋ ण, एनपीए और कथित नेटवर्क…
सूत्रों के अनुसार,शाखा में मुद्रा/अन्य ऋ णों को लेकर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं,कहीं नकद,कहीं खाते में ट्रांसफर के दावे। यदि खातों का स्वतंत्र ऑडिट हो,तो कई परतें खुलने की बात कही जा रही है, यह भी आरोप है कि शाखा प्रबंधन और विशाल (शाखा प्रबंधक के भाई) के नाम से जुड़े विरोधाभासी बयान बैंक की साख को नुकसान पहुँचा रहे हैं, महत्वपूर्ण स्पष्टताः ये आरोप हैं,जिनकी पुष्टि निष्पक्ष जांच से ही हो सकती है, सार्वजनिक बैंक होने के नाते पारदर्शिता अनिवार्य है।
पहले भी उठे सवाल…अब भी जवाब बाकी…
स्थानीय समाचार माध्यमों ने पहले भी इस शाखा से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग की है, ताज़ा प्रकरण उन सवालों को फिर जीवित करता है, नियम, प्रक्रिया और जवाबदेही पर,आज तक न तो किराया विवाद पर आधिकारिक स्थिति सार्वजनिक हुई,न ही ऋ ण/एनपीए पर विस्तृत स्पष्टीकरण।
सार्वजनिक बैंक बनाम निजी लाभ…मूल बहस…
यदि आरोप सही हैं, तो यह मामला केवल एक शाखा तक सीमित नहीं, बल्कि संस्थागत साख का है, सार्वजनिक बैंक में व्यक्तिगत लाभ की कोई गुंजाइश नहीं होनी चाहिए—न नियमों के बाहर संचालन, न संदिग्ध लेन-देन।
भाई का नाम, नेटवर्क का शक…
मामले में शाखा प्रबंधक आनंद और उनके भाई विशाल का नाम भी चर्चा में है। स्थानीय स्तर पर आरोप है कि दोनों के कथित गांठ-जोड़ से बैंक की साख प्रभावित हो रही है। अलग-अलग बयान और विरोधाभासी दावे संदेह को और गहरा करते हैं।
पहले भी उठे सवाल,अब फिर केंद्र में…
स्थानीय समाचार-पत्रों द्वारा पहले भी इस शाखा से जुड़े मुद्दों को उजागर किया गया है, ताज़ा घटनाक्रम उन सभी सवालों को फिर से सामने लाता है,क्या बैंक नियमों से चल रहा है या व्यक्तियों की मर्जी से?
निगाहें अब उच्च अधिकारियों पर…
अब उम्मीद यूको बैंक के उच्च प्रबंधन और सक्षम अधिकारियों से है कि वे इस मामले में संज्ञान लेकर जांच बैठाएँ। यदि आरोप निराधार हैं, तो जांच से बैंक की साख और मजबूत होगी…और यदि आरोप सही पाए जाते हैं,तो कठोर कार्रवाई ही सार्वजनिक बैंक के भरोसे को बचा सकती है।
आगे भी खुल सकती हैं परतें…
सूत्रों का कहना है कि यह मामला अभी थमा नहीं है, परत-दर-परत नई जानकारियाँ सामने आने की संभावना जताई जा रही है। स्थानीय मीडिया ने भी संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में इस प्रकरण से जुड़े और तथ्य उजागर किए जाएंगे।
अब क्या होना चाहिए? और समाधान
किराया अनुबंध की फाइल सार्वजनिक—बकाया, नोटिस,निपटान की स्थिति
स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट—ऋ ण स्वीकृति, एनपीए,लेन-देन की जांच…
स्थानांतरण प्रक्रिया की समीक्षा—वैधानिकता और जिम्मेदारी तय हो…
उच्च प्रबंधन का आधिकारिक बयान—तथ्यों के साथ…
यदि दोष सिद्ध हो— नियमों के अनुसार कठोर कार्रवाई…


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