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मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर@ एक कार्यालय…दो आदेश, कलेक्टर की सख्ती बनाम कमिश्नर की बहाली

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  • नियम,अधिकार और प्रक्रिया पर खड़े हुए प्रशासनिक सवाल…
  • निलंबन से बहाली तकः क्या प्रक्रिया से ऊपर कोई आदेश?
  • गलत कृत्य, सही सवालः निलंबन क्यों नहीं टिक पाया?
  • कलेक्टर कार्यालय में हड़ताल समर्थनः अनुशासन सही,प्रक्रिया कमजोर
  • दो दिन में बहाली ने क्या कलेक्टर के अधिकार कमजोर कर दिए?
  • अधिकार बनाम प्रक्रियाः एमसीबी कलेक्टर कार्यालय प्रकरण की पूरी पड़ताल
  • जब एक आईएएस दोषी मानता है और दूसरा निर्दोष—प्रशासनिक एकरूपता पर सवाल


-रवि सिंह-
मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, 0३ जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ में अधिकारी-कर्मचारी हड़ताल के दौरान एमसीबी कलेक्टर कार्यालय में घटित घटनाक्रम अब केवल तीन कर्मचारियों के निलंबन और बहाली तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह मामला प्रशासनिक अधिकार, प्रक्रिया की अनिवार्यता और आईएएस स्तर पर निर्णयों की एकरूपता पर गंभीर बहस का विषय बन गया है।
बता दे कि यह पूरा मामला न तो केवल कर्मचारियों के हक में है और न ही केवल प्रशासन की सख्ती के खिलाफ। यह मामला है अधिकार बनाम प्रक्रिया का, कर्मचारियों का कार्यालय के भीतर हड़ताल समर्थन करना गलत और अनुचित माना जा सकता है, लेकिन उस गलत कृत्य पर की गई कार्रवाई यदि नियमों और प्रक्रिया के विपरीत हो,तो वह टिक नहीं सकती, इस प्रकरण ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक अनुशासन उतना ही जरूरी है जितनी जरूरी न्यायसंगत और विधिसम्मत प्रक्रिया,अन्यथा, एक आदेश पर दूसरा आदेश भारी पड़ता रहेगा—और सवाल उठते रहेंगे कि आखिर सही कौन?
क्या है पूरा मामला
छत्तीसगढ़ अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन लंबे समय से अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर बैठा था। इसी दौरान 30 दिसंबर 2025 को फेडरेशन से जुड़े कुछ कर्मचारी कार्यालयीन समय में एमसीबी कलेक्टर कार्यालय के भीतर पहुंचे। आरोप है कि उन्होंने वहां कार्यरत कर्मचारियों से हड़ताल के समर्थन में शामिल होने का अनुरोध/दबाव बनाया, कलेक्टर ने इसे सरकारी कार्य में बाधा मानते हुए तीन कर्मचारियों को तत्काल निलंबित कर दिया, कलेक्टर की इस कार्रवाई को लेकर उसी दिन से प्रशासनिक और कर्मचारी वर्ग में मिश्रित प्रतिक्रियाएं सामने आईं—कुछ ने इसे अनुशासन बनाए रखने की जरूरी कार्रवाई बताया, तो कुछ ने इसे कठोर और जल्दबाजी करार दिया।
दो दिन बाद पलटा फैसला…
इस बीच कर्मचारियों ने निलंबन आदेश के खिलाफ आयुक्त, सरगुजा संभाग के न्यायालय में अपील की, 02 जनवरी 2026 को आयुक्त ने दोनों मामलों में (वि.अप.क्र. 02/2026 एवं 03/2026) कलेक्टर द्वारा पारित निलंबन आदेशों को निरस्त करते हुए कर्मचारियों को बहाल कर दिया, यहीं से विवाद और गहरा गया,एक आईएएस अधिकारी के लिए कर्मचारी दोषी, दूसरे आईएएस अधिकारी के लिए वही कर्मचारी दो दिन में निर्दोष?
आयुक्त के आदेश का कानूनी आधार…
आयुक्त के आदेशों का गहन अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि कर्मचारियों के कृत्य को सही ठहराया नहीं गया,बल्कि पूरा जोर प्रक्रियात्मक त्रुटि पर है, आयुक्त ने अपने आदेश में साफ कहाः निलंबन से पहले,न कारण बताओ नोटिस दिया गया,न स्पष्टीकरण का अवसर,न ही सुनवाई का मौका,यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है,दूसरे पक्ष की बात सुने बिना पारित आदेश विधिसम्मत नहीं माना जा सकता,इसी आधार पर निलंबन आदेशों को रद्द करते हुए कर्मचारियों को पूर्व पदस्थापना पर बहाल किया गया और निलंबन अवधि को कार्यावधि मान्य किया गया।
कलेक्टर के अधिकार पर सवाल या प्रक्रिया की चूक?
यहां सबसे अहम बिंदु यह है कि, कलेक्टर जिले का प्रशासनिक प्रमुख होता है,अपने कार्यालय परिसर में अनुशासन बनाए रखने और सरकारी काम में बाधा रोकने का उसे पूरा अधिकार है,लेकिन अधिकार का प्रयोग भी तय प्रक्रिया के भीतर ही होना चाहिए,प्रशासनिक कानून के अनुसार निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई से पहले न्यूनतम प्रक्रिया—नोटिस और सुनवाई—अनिवार्य है। आयुक्त ने कलेक्टर के अधिकारों को नकारा नहीं, बल्कि यह कहा कि अधिकार का प्रयोग नियमों के अनुरूप नहीं हुआ।
धारा 144 का सवाल…
मामले में यह सवाल भी उठा कि क्या कलेक्टर कार्यालय में हर समय धारा 144 लागू रहती है? कानूनी स्थिति स्पष्ट है धारा 144 स्वतः हर समय लागू नहीं रहती,लेकिन कलेक्टर कार्यालय संवेदनशील प्रशासनिक क्षेत्र होता है,जहां बिना अनुमति भीड़, प्रदर्शन या दबाव निषिद्ध माना जाता है,यानी कार्रवाई का आधार धारा 144 नहीं, बल्कि सरकारी कार्य में बाधा होना चाहिए था—पर कार्रवाई प्रक्रियागत रूप से कमजोर रही।
एक आदेश से दूसरा आदेश—भ्रम की स्थिति…
जब एक कलेक्टर का आदेश दो दिन में ही कमिश्नर द्वारा निरस्त हो जाता है, तो स्वाभाविक है कि आमजन और कर्मचारी वर्ग में यह सवाल उठता है कि, क्या नियम व्यक्ति-विशेष पर निर्भर हो गए हैं? क्या प्रशासनिक निर्णयों में राजनीतिक या बाहरी दबाव की भूमिका है? या फिर नीचे के स्तर पर लिए गए फैसलों में कानूनी सतर्कता की कमी है?
हड़ताल का अधिकार बनाम कार्यालय की मर्यादा या क्या कलेक्टर कार्यालय में घुसकर काम कर रहे कर्मचारियों को बाहर लाना जायज़ था…
छत्तीसगढ़ अधिकारी-कर्मचारी फेडरेशन की हड़ताल के दौरान एमसीबी कलेक्टर कार्यालय में जो दृश्य सामने आया, उसने केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि संवैधानिक और नैतिक बहस को जन्म दे दिया है। सवाल यह नहीं है कि कर्मचारियों की मांग जायज़ थी या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि मांग रखने और आंदोलन का तरीका कितना वैधानिक था।
संविधान क्या कहता है हड़ताल को लेकर?
भारतीय संविधानः अनुच्छेद 19(1)(ष्) संघ बनाने और सामूहिक गतिविधि का अधिकार देता है, लेकिन हड़ताल को मौलिक अधिकार नहीं मानता,सुप्रीम कोर्ट की बार-बार की गई व्याख्या के अनुसार सरकारी कर्मचारी को हड़ताल का अधिकार सीमित है और वह भी सार्वजनिक व्यवस्था, कार्यालयीय अनुशासन और प्रशासनिक कार्य में बाधा न डालने की शर्त पर।
हड़ताल के स्थापित नियम क्या कहते हैं?
प्रशासनिक नियमों और सेवा आचरण के अनुसार हड़ताल करने वाले कर्मचारी कार्यालय समय के बाहर, कार्यालय परिसर के बाहर, शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रख सकते हैं, लेकिन वेः कार्यालय के अंदर प्रवेश कर, काम कर रहे कर्मचारियों को कार्यस्थल से बाहर लाने या काम रोकने का अधिकार नहीं रखते।
महत्वपूर्ण कानूनी अंतर (जो अक्सर भ्रमित करता है)…
हड़ताल से जुड़े नियम यह मानते हैं कि यदि कर्मचारी हड़ताल को सफल बनाना चाहते हैं, तो वे कार्यस्थल पर जाने से पहले, घर पर, रास्ते में, व्यक्तिगत रूप से, निवेदन कर सकते हैं, जबरदस्ती, दबाव या बाधा पूरी तरह प्रतिबंधित है, लेकिन एक बार जब कोई कर्मचारी कार्यस्थल पर पहुँच गया, तो उसे वहां से हटाने का कोई अधिकार हड़ताल कर रहे कर्मचारियों को नहीं है।
यहीं से एमसीबी का मामला अलग हो जाता है…
एमसीबी में आरोप यह नहीं है कि कर्मचारियों से सहयोग मांगा गया आरोप यह है कि कलेक्टर की अनुमति के बिना कलेक्टर कार्यालय के भीतर, कार्यालयीन समय में काम कर रहे कर्मचारियों को “निवेदन” के नाम पर बाहर लाने का प्रयास किया गया, यह सीधे-सीधे कार्यालयीय मर्यादा का उल्लंघन, सरकारी कार्य में बाधा, प्रशासनिक अनुशासन को चुनौती की श्रेणी में आता है।
तो क्या कलेक्टर की कार्रवाई गलत थी?
नैतिक और प्रशासनिक दृष्टि से—नहीं,कलेक्टरः जिले का प्रशासनिक प्रमुख होता है, अपने कार्यालय में अनुशासन बनाए रखने का अधिकार रखता है, बिना अनुमति प्रवेश और कार्य में बाधा पर,तत्काल हस्तक्षेप कर सकता है, इस बिंदु पर कलेक्टर की आपत्ति और हस्तक्षेप पूरी तरह जायज़ था।
फिर गलती कहाँ हुई?
गलती कार्रवाई के तरीके में हुई,प्रशासनिक कानून कहता हैः निलंबन से पहले नोटिस,स्पष्टीकरण,सुनवाई,अनिवार्य है (जब तक अत्यधिक आपात स्थिति न हो)। कलेक्टर नेः अनुशासनात्मक चिंता सही पहचानी, लेकिन सीधे निलंबन कर दिया, जिससे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन हुआ।
कमिश्नर ने दो दिन में बहाली क्यों की?
यहाँ एक बात साफ समझनी होगी, कमिश्नर ने यह नहीं कहा कि कर्मचारियों का कृत्य सही था या कार्यालय में घुसना जायज़ था कमिश्नर ने सिर्फ यह कहा कि गलत कृत्य पर भी कार्रवाई सही प्रक्रिया से होनी चाहिए,इसी कारण निलंबन आदेश रद्द किया गया,बहाली की गई,क्योंकि आदेश कानूनी प्रक्रिया में कमजोर था।
लेकिन सवाल फिर भी बचता है…
क्या गलत तरीका अपनाने वालों को सिर्फ प्रक्रिया की कमी के कारण तुरंत राहत मिल जानी चाहिए?
क्या इससे भविष्य में यह संदेश नहीं जाता कि पहले दबाव बनाओ,बाद में कानून देख लिया जाएगा?
क्या दो दिन में बहाली ने कलेक्टर की वैधानिक को कमजोर नहीं किया?
सही कौन, गलत कौन?:-
कर्मचारियों की मांग रखना लोकतांत्रिक अधिकार है…
कलेक्टर कार्यालय में घुसकर काम कर रहे कर्मचारियों को बाहर लाने का प्रयास असंवैधानिक और अनुचित है…
कलेक्टर का हस्तक्षेप प्रशासनिक रूप से सही था…
लेकिन कार्रवाई की प्रक्रिया कानूनी रूप से कमजोर थी…
कमिश्नर का आदेश कानून सम्मत है पर उसकी तत्कालता और संदेश पर सवाल बने रहेंगे…
अंतिम पंक्ति
लोकतंत्र में आंदोलन जरूरी हैं,लेकिन आंदोलन का स्थान और तरीका तय करता है कि वह अधिकार है या अराजकता।


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