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कोरिया@पदोन्नति के बाद भी प्रभार नहीं छात्रावास अधीक्षक ‘बिना काम’

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आदिवासी विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल,कर्मचारियों में बढ़ता असंतोष
-रवि सिंह-
कोरिया,02 जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
कार्यालय आयुक्त आदिमजाति तथा अनुसूचित जाति विकास से पदोन्नति प्राप्त कर छात्रावास अधीक्षक बने कर्मचारियों के लिए यह समय उपलब्धि का होना चाहिए था, लेकिन हकीकत इसके उलट है,पदोन्नति आदेश जारी होने और नई पदस्थापना पर जॉइनिंग दिए हुए दो माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद जिले के कई छात्रावास अधीक्षकों को अब तक संबंधित छात्रावासों का वास्तविक प्रभार (चार्ज) नहीं सौंपा गया है,नतीजा यह है कि पदोन्नत अधिकारी कार्यालय तो पहुंच रहे हैं,लेकिन न तो उन्हें काम सौंपा गया है और न ही अधिकार,जिससे वे मानसिक तनाव और असमंजस की स्थिति में हैं,छात्रावासों से सीधे तौर पर आदिवासी और वंचित वर्ग के बच्चों का भविष्य जुड़ा होता है। ऐसे में अधीक्षकों को अधिकारहीन बनाकर बैठा देना न केवल कर्मचारियों के साथ अन्याय है,बल्कि छात्रावास प्रबंधन और विद्यार्थियों के हितों के लिए भी नुकसानदेह है, अब निगाहें जिला प्रशासन और विभागीय उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं क्या वे समय रहते हस्तक्षेप कर पदोन्नत अधीक्षकों को उनका वैधानिक प्रभार सौंपेंगे,या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
नियमों के उलट चल रही व्यवस्था
प्रशासनिक नियमों के अनुसार,पदोन्नति के बाद जॉइनिंग के साथ ही संबंधित संस्था का प्रभार मिल जाना चाहिए। लेकिन कोरिया जिले में स्थिति उलटी दिखाई दे रही है कई छात्रावासों में पुराने अधीक्षक या वैकल्पिक व्यवस्था के तहत कार्यरत कर्मचारी अभी भी प्रभार संभाले हुए हैं,कहीं प्रभार छोड़ने में आनाकानी है, तो कहीं फाइलें प्रशासनिक सुस्ती की भेंट चढ़ी हुई हैं, इस असमंजस का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि जिम्मेदारी तय नहीं हो पा रही,किसी भी अव्यवस्था की जवाबदेही अस्पष्ट बनी हुई है,पदोन्नत अधिकारी निर्णय लेने में असमर्थ हैं।
कर्मचारियों में बढ़ती नाराजगी : पदोन्नत अधीक्षकों में इस देरी को लेकर गहरी नाराजगी है। नाम न छापने की शर्त पर एक अधीक्षक ने बताया हमने दो महीने पहले जॉइनिंग दे दी, लेकिन आज तक लिखित में प्रभार नहीं मिला। बिना प्रभार हम न तो वित्तीय निर्णय ले सकते हैं और न ही प्रशासनिक। यह हमारी वरिष्ठता और मनोबल दोनों पर सीधा आघात है, अधीक्षकों का कहना है कि प्रभार को लेकर बार-बार पूछने पर सिर्फ ‘आज-कल हो जाएगा’ कहकर टाल दिया जाता है।
विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल : इस पूरे घटनाक्रम ने आदिवासी विकास विभाग की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं,क्या पदोन्नति केवल कागज़ी प्रक्रिया बनकर रह गई है? क्या जानबूझकर प्रभार रोका जा रहा है? क्या इससे विभागीय मनमानी और दबाव की राजनीति को बढ़ावा मिल रहा है?
मूल पद के कर्मचारियों को क्यों नहीं दिया जा रहा प्रभार?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पदोन्नत अधीक्षक उपलब्ध हैं,तो मूल पद के कर्मचारियों को प्रभार न देकर दूसरे कर्मचारियों से काम क्यों कराया जा रहा है? लब्जी,तेलीमुड़ा,घुघरा, कटगोड़ी सहित कई छात्रावास ऐसे हैं, जहां पदोन्नत अधीक्षक जॉइनिंग दे चुके हैं, लेकिन उन्हें अब तक प्रभार नहीं सौंपा गया, सूत्रों के अनुसार, इस देरी के पीछे केवल लापरवाही नहीं, बल्कि जिला कार्यालय से जुड़ा एक ‘लंबा खेल’ बताया जा रहा है। इसी कारण कभी तकनीकी बहाना, तो कभी प्रशासनिक कारण बताकर मामला टाला जा रहा है।


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