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कोरिया/सोनहत@डिजिटल इंडिया की चोटी पर अटका सोनहतछात्रवृत्ति के लिए पहाड़ चढ़ते बच्चे

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  • 5G के शोर में गुम वनांचल : नेटवर्क के लिए जंगल-पहाड़ों पर बैठा लोकसेवा केंद्र
  • एक डंडी सिग्नल,सौ सपने : सोनहत के बच्चे पहाड़ पर भर रहे भविष्य के फॉर्म
  • जहाँ नेटवर्क नहीं,वहाँ हौसला है : सोनहत के वनांचल में शिक्षा की जंग
  • ऑनलाइन सिस्टम,ऑफलाइन जि़ंदगी : सोनहत के बच्चों का डिजिटल संघर्ष
  • डिजिटल भारत बनाम वनांचल हकीकत : पहाड़ की चोटी पर अटका छात्रवृत्ति का अधिकार
  • सोनहत के वनांचल में नेटवर्क की खोज…छात्रवृत्ति के लिए जंगलों में ऊँचाई पर पहुँचा लोकसेवा केंद्र,साथ में पालक, शिक्षक और बच्चे

-राजन पाण्डेय-
कोरिया/सोनहत,27 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)। जहाँ देश डिजिटल क्रांति और 5 प्रतिशत की सफलता का जश्न मना रहा है, वहीं छत्तीसगढ़ के वनांचल क्षेत्र सोनहत से आई तस्वीरें व्यवस्था की सच्चाई बयान करती हैं। यहाँ नेटवर्क न होने के कारण छात्रों को छात्रवृत्ति के फॉर्म भरने के लिए किसी कमरे में नहीं, बल्कि ऊँचे पहाड़ों और घने जंगलों की खाक छाननी पड़ रही है।
भारत खुद को दुनिया की सबसे तेज़ डिजिटल अर्थव्यवस्थाओं में गिनाने लगा है, 5जी, ऑनलाइन सेवाएँ,डीबीटी और डिजिटल इंडिया के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं,लेकिन छत्तीसगढ़ के सोनहत वनांचल से आई तस्वीरें इन दावों पर करारा सवाल खड़ा करती हैं,यहाँ छात्रवृत्ति जैसे बुनियादी अधिकार के लिए बच्चों को स्कूल या लोकसेवा केंद्र नहीं,बल्कि जंगलों और पहाड़ों का सहारा लेना पड़ रहा है, यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि शिक्षा को सशक्त बनाने वाली तकनीक,वनांचल के बच्चों के लिए सबसे बड़ी बाधा बन गई है, नेटवर्क न होने के कारण छात्र अपने फॉर्म समय पर नहीं भर पा रहे,ऐसे में शिक्षक और अभिभावक डिजिटल योद्धा बनकर बच्चों को ऊँचाई पर ले जा रहे हैं,जहाँ किसी तरह एक-दो डंडी नेटवर्क मिल जाए,यह दृश्य प्रेरक जरूर है, पर यह व्यवस्था की असफलता का जीवित प्रमाण भी है,सवाल यह है कि जिन इलाकों में बीएसएनएल और निजी कंपनियों के टावर खड़े हैं,वे सालों से बंद क्यों हैं? अगर टावर चालू नहीं करने थे,तो सरकारी धन खर्च कर उन्हें लगाने का औचित्य क्या था? नेटवर्क के बिना न केवल छात्रवृत्ति,बल्कि राशन की ई-केवाईसी,ऑनलाइन भुगतान,परीक्षाएँ और सरकारी योजनाएँ भी ठप्प पड़ी हैं, इसका सीधा असर सबसे गरीब और आदिवासी परिवारों पर पड़ रहा है,सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि डिजिटल सेवा अब सुविधा नहीं, अधिकार बन चुकी है। ऑनलाइन सिस्टम लागू करने से पहले नेटवर्क की गारंटी देना शासन की जिम्मेदारी है। अन्यथा यह डिजिटल व्यवस्था,वनांचल के बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने के बजाय और दूर धकेल देगी,सोनहत के शिक्षक और अभिभावक आज जिस जज़्बे से बच्चों का भविष्य बचा रहे हैं,वह प्रशंसनीय है, लेकिन सवाल यह नहीं कि वे कब तक पहाड़ चढ़ेंगे सवाल यह है कि शासन कब तक नीचे बैठा रहेगा? डिजिटल इंडिया तभी सार्थक होगा, जब उसका सिग्नल पहाड़ की चोटी तक नहीं,बल्कि हर बच्चे के हाथ तक पहुँचे।
शिक्षा पर भारी पड़ती नेटवर्क की समस्या
सोनहत ब्लॉक के दूरस्थ गांवों में मोबाइल नेटवर्क आज भी सपना है। छात्रवृत्ति की अंतिम तिथि नजदीक है,पर गांवों में सिग्नल शून्य,बच्चों का साल खराब न हो इसी चिंता में शिक्षक एक नई भूमिका में दिखते हैं। अभिभावकों के साथ लोकसेवा केंद्र और छात्रों के समूह को उन ऊँचाइयों तक ले जाया जाता है,जहाँ कहीं-कहीं एक ‘डंडी’ भर नेटवर्क मिल जाता है।
खतरों के बीच ‘ऑनलाइन’ काम
पहाड़ों पर चढ़कर फॉर्म भरवाना आसान नहीं। जंगली जानवरों का डर, पथरीले रास्ते और मौसम की मार—इन सबके बीच शिक्षक, अभिभावक और छात्र घंटों लैपटॉप-मोबाइल लेकर सर्वर जुड़ने का इंतज़ार करते हैं।
ग्रामीणों और छात्रों की पीड़ा
छात्र बताते हैं कभी कई किलोमीटर चलना पड़ता है,कभी पहाड़ चढ़ना। खराब मौसम में नेटवर्क गायब—घंटों की मेहनत बेकार। हर फॉर्म के साथ अनिश्चितता।
अभिभावकों-शिक्षकों का जज़्बा,व्यवस्था पर सवाल
ग्रामीण मानते हैं अगर शिक्षक यह हिम्मत न दिखाएँ,तो सैकड़ों गरीब आदिवासी बच्चे योजनाओं से वंचित रह जाएँ। पहल की सराहना है, पर सवाल भी कब तक वनांचल के बच्चे ऐसे ही जूझते रहेंगे?
बीएसएनएल टावर लगे,पर चालू नहीं…
ग्रामीणों के अनुसार उधेनी, सिंघोर, उग्यव, सूक्तरा, मझगांवा, रेवला सहित कई गांवों में बीएसएनएल टावर लगे हैं, पर एक भी चालू नहीं, सवाल जब चालू नहीं करना था, तो लगाया क्यों? कबाड़’ बनने का डर सिंघोर का टावर लंबे समय से यूँ ही खड़ा लोगों को आशंका, बाकी टावर भी ऐसे ही न रह जाएँ, जियो टावर भी ‘शो-पीस’ रामगढ़, तुर्रीपानी सहित कुछ गांवों में जियो टावर लगे पाँच साल हो गए, पर सेवा शुरू नहींलाभ शून्य।
मुख्य चुनौतियाँ
सर्वर डाउन: नेटवर्क मिल भी जाए तो गति इतनी धीमी कि फॉर्म सबमिट नहीं होते।
दूरी का संकट: सिस्टम से फॉर्म भरने पर कई गांवों से सोनहत तक 960 किमी आना पड़ता है।
वाहन की कमी: बसें नहीं,निजी वाहन दुर्लभ; जर्जर सड़कें बच्चों के साथ यात्रा को जोखिमभरा बनाती हैं।
जोखिम:ऊँचे पत्थरों पर बैठकर घंटों काम—हर कदम खतरे से भरा।
ऊँचाई पर सिग्नल: चुनिंदा पहाडि़यों पर ही एक-दो “डंडे” नेटवर्क।
छात्रों का संघषर्: छात्रवृत्ति ही नहीं, परीक्षाओं/अन्य ऑनलाइन फॉर्म के लिए भी वही संघर्ष।
क्या कहते हैं लोग
नेटवर्क के बिना योजनाओं का लाभ नहीं मिलता—शासन ध्यान दे।”
जयचन्द सोनपाकर,कोरिया जन सहयोग समिति

लगे टावर चालू हों—काम ठप्प है।
प्रकाश चंद साहू,अध्यक्ष, यूथ कांग्रेस

राशन की ई-केवाईसी से लेकर पैसे भेजने तक सब अटका।”
प्रफुल दत्त पाण्डेय,सोनहत
ग्रामीणों की माँग
प्रभावित गांवों में तुरंत मोबाइल टावर चालू किए जाएँ।
जहाँ टावर लगे हैं पर बंद हैं,उन्हें संचालित किया जाए।
एक ग्रामीण की बात—छात्रवृत्ति से कॉपी-पेन आते हैं। हम बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं,तकनीक आड़े आ रही है।


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