
- अब क्या सरकार के विरुद्ध होगी मुखर राजनीति?
- किसानों पर मुखर, सत्ता पर चुप? क्या अंबिका सिंहदेव अब हर मोर्चे पर सरकार को घेरेंगी?
- माइक तो पकड़ा,अब तेवर दिखेंगे? किसानों के बाद क्या सत्ता से टकराएंगी अंबिका सिंहदेव…
- दो साल बाद सक्रियता,लेकिन सवाल कायम क्या अंबिका सिंहदेव निभा पाएंगी प्रभावी विपक्ष की भूमिका?
- किसानों के मंच से सत्ता तक की दूरी कितनी? अंबिका सिंहदेव की वापसी पर राजनीतिक परीक्षा…
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,27 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)। लगभग दो वर्षों के राजनीतिक सन्नाटे के बाद बैकुंठपुर की पूर्व विधायक अंबिका सिंहदेव एक बार फिर पार्टी मंचों पर सक्रिय दिखाई देने लगी हैं,कांग्रेस के कार्यक्रमों में उनकी मौजूदगी, माइक थामकर दिए जा रहे बयान और सामाजिक पारिवारिक आयोजनों में भागीदारी ने स्थानीय राजनीति में हलचल बढ़ा दी है, स्वाभाविक है कि सवाल उठ रहा है क्या अब वे वर्तमान प्रदेश सरकार के विरुद्ध खुलकर मुखर होंगी? क्या विपक्ष का स्वर मंचों से तेज़ होगा?
जीत,पराजय और लंबा अंतराल
अंबिका सिंहदेव ने 2018 में जीत दर्ज कर तत्कालीन मंत्री भईयालाल राजवाड़े को पराजित किया था। जनता के भरोसे के साथ शुरू हुआ कार्यकाल 2023 में बड़ी पराजय पर समाप्त हुआ। हार के बाद वे लंबे समय तक क्षेत्रीय राजनीति से दूरी बनाए रहीं जिसका असर कांग्रेस की जमीनी सक्रियता पर भी दिखा। विपक्ष होने के बावजूद विधानसभा क्षेत्र में सरकार के विरुद्ध वह तीखापन नहीं दिखा, जिसकी अपेक्षा की जाती है।
गिरजापुर से उठा स्वर: धान खरीदी पर सीधा हमला
अब वापसी के साथ ही अंबिका सिंहदेव के तेवर बदले हुए नज़र आए, कोरिया जिले के गिरजापुर धान खरीदी केंद्र के मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने सरकार और प्रशासन को घेरा, उनका कहना था कि अगर किसान धरने पर न बैठे तो न रकबा बढ़ता है,न समस्या सुलझती है इसलिए लड़ाई लड़नी पड़ती है, उन्होंने जामपार का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि धान खरीदी की रफ्तार जानबूझकर धीमी रखी गई,ताकि किसानों का ध्यान भटके और सूखे धान की खरीद आसान हो,गिरदावली थर्ड पार्टी एनजीओ को सौंपने पर सवाल उठाते हुए पूछा जब आरआई,पटवारी और तहसीलदार हैं,तो बिचौलियों की ज़रूरत क्यों?
ऑनलाइन टोकन और “गोल-गोल” घूमता किसान
ऑनलाइन टोकन व्यवस्था पर भी उन्होंने तंज कसा जब किसान ऑनलाइन टोकन काटने में सक्षम नहीं हैं, तो ऐसे नियम क्यों? उनका आरोप था कि नई व्यवस्थाओं ने किसानों को तहसीलदार–पटवारी के बीच चक्कर काटने को मजबूर कर दिया है।
राजनीतिक विरोधाभास भी चर्चा में…
मंच से उठे इन सवालों के बीच एक विरोधाभास पर भी चर्चा रही,किसानों की मजदूरी/राशि हमाली राशी को लेकर जो बातें आज भाजपा सरकार पर आरोप के रूप में रखी जा रही हैं, वही व्यवस्थाएं पूर्ववर्ती कांग्रेस शासन में भी थीं तब इन पर उतनी मुखरता नहीं दिखी, इसी बिंदु पर भाजपा कार्यकर्ताओं ने तंज भी कसा।
आगे की राह…
अंबिका सिंहदेव की सक्रियता ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उम्मीद जगाई है कि अब विपक्ष का स्वर तेज़ होगा,सवाल यही है क्या यह वापसी निरंतर और संगठित विरोध में बदलेगी या यह सिफऱ् मंचीय बयानबाज़ी तक सीमित रहेगी? आने वाले महीनों में उनके बयानों की धार और संगठन की जमीन पर सक्रियता ही इसका जवाब देगी।
क्या जिस प्रकार किसानों के मुद्दे पर उन्होंने माइक पकड़ा क्या उसी प्रकार सत्ता के खिलाफ मुखर होंगी?
हाल में पूर्व विधायक अंबिका सिंहदेव किसानों के मुद्दे पर आयोजित एक पार्टी सभा में माइक पकड़ी नजर आईं,किसानों का मुद्दा था उन्होंने अपनी बात रखी और अपनी उपस्थिति दर्ज कराई,अब सवाल यह है कि क्या वह अब सभी मुद्दों पर सरकार को घेरती नजर आएंगी,विपक्ष की भूमिका में उनका अगला प्रदर्शन यह तय करेगा कि वह सरकार को घेरने में कितनी मुखर नजर आती हैं,वैसे दो वर्षों उपरांत उनकी सक्रियता तब से ज्यादा नजर आ रही है जबसे कांग्रेस जिलाध्यक्ष की घोषणा हुई है।
क्या अब विपक्ष की भूमिका अच्छे से निभाएंगी?
विपक्ष का काम होता है कि वह सरकार को हमेशा जनता के हित में कार्य करने दबाव महसूस कराए,दो वर्षों में कांग्रेस का विरोध उस स्तर का नजर नहीं आया जिससे सरकार विपक्ष से परेशान नजर आए,उनके सवालों से भागती नजर आए,बैकुंठपुर में भी हाल वैसा ही है जैसा हर जगह विपक्ष का विरोध सरकार के लिए कोई चुनौती नहीं खड़ी कर पा रहा है,अब पूर्व विधायक बैकुंठपुर क्या विपक्ष की भूमिका का बेहतर निर्वहन करते हुए सरकार के लिए दिक्कतें खड़ी करेंगी,क्या वह मुखरता से जनता की मांग समस्याओं के लिए लड़ती नजर आयेंगी यह बड़ा सवाल है।
अपने विधानसभा में वर्तमान विधायक को क्या घेर पाएंगी?
पूर्व विधायक के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं बैकुंठपुर के वर्तमान विधायक,वर्तमान विधायक की जनता के बीच नजदीकी और उनसे जुड़ाव पूर्व विधायक के लिए एक कठिन चुनौती होगी,पूर्व विधायक क्या विधायक को क्षेत्रीय मुद्दों पर घेर पाएगी,क्या वह विधायक की कमियां ढूंढकर उससे जनता को अवगत करा पाएंगी,पूर्व विधायक के लिए आसान भी नहीं लेकिन उन्हें यह काम करना होगा तभी वह भविष्य में भाजपा को चुनौती दे पाएगी।
जो कांग्रेसी इन से रूस्ट हैं उन्हें क्या एक मंच पर एक साथ ला पाएंगी?
पूर्व विधायक के लिए क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या है उनकी ही पार्टी के लोगों से उनकी दूरी,पूर्व विधायक क्षेत्र में दो साल बाद सक्रीय जरूर हुई हैं लेकिन उनकी अपने ही पार्टी के लोगों से दूरी पूर्व की तरह कायम है,उन्हें इस चुनौती को दूर करना होगा,उन्हें पार्टी के लोगों को एकजुट करना होगा,क्या वह ऐसा कर पाएगी?बिना पार्टी को एकजुट अपने पक्ष में किए वह न बेहतर विपक्ष की भूमिका निभा सकेंगी न ही वह अपने लिए अगली पारी ही तय कर सकेंगी।
क्या हार के बाद कुछ सीख ली है या फिर टिकट लाने तक ही यह परिवर्तन है?
पूर्व विधायक की हार क्यों हुई,हार भी बहुत बड़ी थी,जिसकी क्या उन्होंने समीक्षा की,यह पूर्व विधायक के लिए अत्यन्त अनिवार्य समीक्षा खुद के लिए होनी चाहिए,क्षेत्र में दो वर्ष पश्चात उनकी वापसी उनकी भले ही राजनीतिक वापसी है, विपक्ष की भूमिका के लिए वापसी है लेकिन यदि वह बिना अपनी हार की समीक्षा आगे बढ़ रही हैं तो यह क्या केवल टिकट प्राप्ति के लिए दर्शाई जा रही सक्रियता है यह सवाल खड़ा होता है।
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