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बैकुण्ठपुर@ टाइगर रिजर्व या भ्रष्टाचार का अभयारण्य?

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  • गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में ‘अघोषित सत्ता’ और बेखौफ रेंजर का खेल
  • जब जंगल में कानून नहीं,संरक्षण चलता है…
  • किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है गुरु घासीदास टाइगर रिजर्व का घोटाला?
  • गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में “अघोषित सत्ता” का खेल?
  • किसके संरक्षण में है रेंजर टुंडे—और क्यों बेखौफ है जांच से?

-राजन पाण्डेय-
बैकुण्ठपुर,26 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में स्थित गुरु घासीदास राष्ट्र्रीय उद्यान, जिसे राज्य का नवीनतम टाइगर रिजर्व घोषित किया गया है, आज वन्यजीव संरक्षण से ज़्यादा भ्रष्टाचार, संरक्षण और अघोषित सत्ता संरचना के आरोपों को लेकर चर्चा में है, सबसे बड़ा सवाल एक ही नाम पर आकर टिक जाता है—रेंजर टुंडे। स्थानीय सूत्रों और लगातार सामने आ रही शिकायतों के अनुसार,पार्क के रेंजर टुंडे किसी डीएफओ के अधीन काम करते नहीं दिखते,न आदेश का भय,न स्थानांतरण की चिंता,न जांच का डर उनका व्यवहार यह संकेत देता है कि उन्हें कहीं न कहीं से मजबूत संरक्षण प्राप्त है।
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में स्थित गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान, जिसे हाल ही में राज्य का चौथा और देश का नवीनतम टाइगर रिजर्व घोषित किया गया,आज वन्यजीव संरक्षण के लिए नहीं बल्कि भ्रष्टाचार,प्रशासनिक अनियमितताओं और अंदरूनी साठगांठ के आरोपों को लेकर चर्चा में है,जिस उद्यान को बाघों के सुरक्षित भविष्य का प्रतीक बनना था,वही आज सवालों के घेरे में खड़ा दिखाई देता है।
जब जंगल में रेंजर कानून से ऊपर हो जाए…
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में स्थित गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान को हाल ही में टाइगर रिजर्व का दर्जा दिया गया,यह दर्जा बाघों की सुरक्षा के लिए था,लेकिन आज यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह दर्जा अब कुछ अधिकारियों के लिए ‘कानून से ऊपर’ होने का लाइसेंस बन गया है? राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह मामला केवल एक रेंजर,एक पार्क या एक राज्य तक सीमित नहीं रह गया है,यह उस प्रशासनिक संस्कृति को उजागर करता है, जिसमें संरक्षण का नाम लेकर भ्रष्टाचार जंगलों में छुपा दिया जाता है।
किसी डीएफओ से नहीं डरता रेंजर..तो डरता किससे है तंत्र?
गंभीर आरोप यह हैं कि पार्क के एक रेंजर को न डीएफओ का डर है,न स्थानांतरण का,न जांच का,बल्कि उसे पूरा भरोसा है कि जांच हुई तो भी क्लीन चिट मिलेगी,यह भरोसा यूँ ही नहीं आता,यह भरोसा तब आता है,जब अधिकारी जानता हो कि मेरी फाइल कभी ऊपर तक पहुँचेगी ही नहीं,और यही वह बिंदु है जहाँ मामला भ्रष्टाचार से आगे,संरक्षण तक पहुँच जाता है।
भ्रष्टाचार का पैसा और संरक्षण की ढाल
सबसे खतरनाक आरोप यह है कि भ्रष्टाचार से निकला पैसा ऊपर तक पहुँचता है और वही पैसा संरक्षण की ढाल बन जाता है,यदि यह आरोप सही हैं,तो यह सिर्फ वन विभाग की विफलता नहीं,बल्कि शासन-प्रशासन की नैतिक हार है।
फर्जी मस्टर रोल और मजदूरी घोटाला
उद्यान क्षेत्र में तालाब निर्माण,चेक डैम,अग्नि सुरक्षा और अन्य श्रम आधारित कार्यों में फर्जी मस्टर रोल के गंभीर आरोप सामने आए हैं सूत्रों के अनुसार ऐसे मजदूरों के नाम दर्ज हैं जिन्होंने कभी काम नहीं किया, बाहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के नाम पर मजदूरी भुगतान,कागज़ों में काम पूरा, ज़मीन पर सन्नाटा यह सीधे तौर पर सरकारी धन की सुनियोजित लूट की ओर इशारा करता है।
घटिया निर्माण,महीनों में ढहते ढांचे
वन्यजीवों के लिए बनाए गए पेयजल स्रोत,स्टाफ डेम,तालाब और चेक डैम कुछ ही महीनों में जर्जर होने लगे हैं,यह सवाल खड़ा करता है जब निर्माण कुछ महीनों में ही जवाब दे दे,तो करोड़ों रुपये गए कहाँ? स्थिति इतनी गंभीर है कि कुछ तालाबों को तिरपाल से ढकने की नौबत आ गई जो अपने आप में निर्माण गुणवत्ता पर करारा तमाचा है।
डीजल,वाहन भत्ता और गश्ती फंड का दुरुपयोग
सोनहत रेंज के रेंजर महेश टुंडे को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं,सूत्रों का दावा है कि रेंजर प्रायः मुख्यालय में मौजूद नहीं रहते, सरकारी वाहन से बैकुंठपुर-सोनहत का नियमित आवागमन,प्रतिदिन का खर्च शासन के खाते से,डीजल की खपत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के संदेह, गश्ती फंड के निजी उपयोग की आशंका यदि ये आरोप सही हैं,तो यह वन सुरक्षा नहीं,सरकारी संसाधनों की निजी सवारी का मामला बनता है।
कैम्पा फंड: कागज़ों में जंगल,ज़मीन पर सच्चाई गायब
वृक्षारोपण और मिट्टी संरक्षण के लिए मिलने वाला कैम्पा फंड भी सवालों के घेरे में है,कागज़ों में दर्ज कार्यों और धरातल पर दिख रही हकीकत के बीच बड़ा अंतर बताया जा रहा है,कई जगहों पर कार्यों की संख्या कागज़ों में ज्यादा,जमीन पर बेहद कम,यह सीधे-सीधे फंड के बंदरबांट का संकेत देता है।
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा शिकार:वन्यजीव
इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं बाघ और अन्य वन्यजीव, सुरक्षा उपकरणों की कमी,गश्ती दल की निष्कि्रयता,शिकार की घटनाओं का खतरा,वनों की कटाई और अतिक्रमण पर लगाम नहीं ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की निष्कि्रयता से टाइगर रिजर्व का भविष्य खतरे में है।
आय से अधिक संपत्ति के आरोप
सूत्रों के अनुसार,उद्यान के एक रेंजर आय से अधिक संपत्ति के मालिक बन चुके हैं,जिला मुख्यालय के रिहायशी इलाके में बड़ा मकान,लग्ज़री वाहन,अन्य अघोषित संपत्तियाँ सवाल यह है सरकारी वेतन से यह सब संभव कैसे हुआ?
आठ साल से एक ही रेंज में जमे अधिकारी
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि लगातार शिकायतों के बावजूद सोनहत रेंज के अधिकारी पिछले 8 वर्षों से एक ही जगह पदस्थ हैं,सूत्रों का दावा है कितनी भी बड़ी अनियमितता हो, कार्रवाई नहीं होती,यह बयान यदि सच है,तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि सिस्टम पर कब्ज़े का संकेत है।
जांच या लीपापोती?
हालाँकि वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि शिकायतों की जांच के लिए टीम गठित की गई है,लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि शिकायतें पुरानी हैं,कार्रवाई न के बराबर,दोषियों का मनोबल ऊँचा जिससे यह आशंका गहराती जा रही है कि कहीं यह जांच भी कागज़ी औपचारिकता बनकर न रह जाए।
न हटाया जा सकता हूँ,न रोका जा सकता हूँ—किस भरोसे पर?
उद्यान क्षेत्र में यह चर्चा आम है कि रेंजर टुंडे को इस बात का पूरा भरोसा है कि न उन्हें कोई हटा सकता है न उनके खिलाफ जांच आगे बढ़ेगी और यदि कभी जांच हुई भी,तो उन्हें क्लीन चिट मिल जाएगी,यह भरोसा केवल आत्मविश्वास नहीं, बल्कि संरक्षण के ठोस संकेत देता है। सवाल यह है कि आखिर वह कौन है जो यह संरक्षण दे रहा है?
टाइगर रिजर्व या ‘नो-एंट्री ज़ोन’?
गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान एक ऐसा टाइगर रिजर्व बनता जा रहा है,जहाँ आम नागरिकों की आवाजाही लगभग नहीं के बराबर है,पारदर्शिता शून्य है और वन्यजीव संरक्षण की आड़ में करोड़ों रुपये के कार्य हो रहे हैं सूत्रों का कहना है कि कुछ अधिकारी यह मानकर चलते हैं कि जंगल में हुई गड़बड़ी जंगल में ही दब जाएगी, लेकिन हकीकत यह है कि गड़बडि़याँ जंगल से बाहर आ रही हैं खबरें लग रही हैं,शिकायतें हो रही हैं,और सवाल पूछे जा रहे हैं।
भ्रष्टाचार की गंध और बढ़ती संपत्ति
रेंजर टुंडे की तेज़ी से बढ़ती संपत्ति भी संदेह के घेरे में है,सूत्रों के मुताबिक पदस्थापना के बाद संपत्ति में असामान्य वृद्धि,रहन-सहन और संसाधनों में अचानक बदलाव यह सब इशारा करता है कि उनके कार्यक्षेत्र में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा है, और इससे भी गंभीर आरोप यह है कि भ्रष्टाचार से निकला पैसा ऊपर तक पहुँचता है,और वही संरक्षण की ढाल बनता है।
7 नहीं…10 नहीं…अनंत पदस्थापना?
सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में एक अधिकारी का 3-5 साल से अधिक एक ही स्थान पर रहना अपवाद माना जाता है, लेकिन यहाँ 7 साल,10 साल और अब चर्चा 15 साल तक एक ही रेंज में जमे रहने की यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं,सिस्टम की मिलीभगत का संकेत है।
जांच क्यों नहीं बढ़ती?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है शिकायतें हैं,खबरें हैं,आरोप हैं संपत्ति का सवाल है,इसके बावजूद निलंबन नहीं, स्थानांतरण नहीं, ठोस जांच नहीं,यदि दोष नहीं है, तो जांच से डर क्यों? और यदि दोष है,तो कार्रवाई से बचाव क्यों?
अब जवाब चाहिए…
गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, यह तय होना बाकी है कि यह टाइगर रिजर्व रहेगा या भ्रष्टाचार के लिए सुरक्षित अभयारण्य बन जाएगा,अब जरूरत है,स्वतंत्र उच्च स्तरीय जांच,वित्तीय लेन-देन की गहन पड़ताल, लंबी पदस्थापना की समीक्षा,क्योंकि यदि आज सवाल दबा दिए गए, तो कल सिर्फ बाघ ही नहीं पूरा तंत्र लुप्तप्राय हो जाएगा।
अंतिम राष्ट्रीय सवाल
क्या भारत के टाइगर रिजर्व वन्यजीवों के लिए सुरक्षित हैं या भ्रष्टाचारियों के लिए? इस सवाल का जवाब अब केवल राज्य सरकार नहीं, देश का तंत्र देने वाला है।


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