एमसीबी से उठता भाजपा के लिए असहज राष्ट्रीय सवाल,अटल जयंती कार्यक्रम का बहिष्कार—सम्मान की राजनीति या संगठनात्मक पतन?
-रवि सिंह-
एमसीबी,26 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)। भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक डीएनए जिन मूल्यों से बना है, उनमें सबसे ऊपर है अनुशासन,संगठन और अपने पितृ पुरुषों के प्रति आदर, लेकिन एमसीबी जिले से आई खबर यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या भाजपा अब अपने ही डीएनए से दूर जा रही है? 25 दिसंबर वही तारीख, जब देश भारत रत्न अटल बिहारी बाजपेयी को स्मरण करता है, वही अटल, जिनके नाम पर पार्टी आज भी नैतिक पूंजी बटोरती है,और वही दिन,जब एमसीबी जिले में भाजपा नेता यह तय करते हैं कि पहले हमारा सम्मान…बाद में अटल।
क्या भाजपा के पितृ पुरुष से भी बड़े हो गए एमसीबी जिले के भाजपा नेता?
भारतीय जनता पार्टी स्वयं को विश्व की सबसे बड़ी और अनुशासित राजनीतिक पार्टी बताती रही है,लेकिन एमसीबी जिले में घटित घटनाक्रम इस दावे पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहा है। सवाल सीधा है क्या अब भाजपा नेताओं का व्यक्तिगत सम्मान, पार्टी की विचारधारा और उसके पितृ पुरुषों के सम्मान से भी ऊपर हो गया है? यह सवाल यूं ही नहीं उठ रहा। इसकी पृष्ठभूमि है भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री एवं भाजपा के पितृ पुरुष स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेयी की 101वीं जयंती पर आयोजित वह सरकारी कार्यक्रम, जिसका एमसीबी जिले के भाजपा नेताओं ने बहिष्कार कर दिया।
अटल जयंती भी सम्मान की राजनीति की भेंट चढ़ी?
25 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ राज्य सरकार द्वारा प्रदेश के 115 नगरीय निकायों में अटल परिसर के लोकार्पण का कार्यक्रम आयोजित किया गया, कार्यक्रम सरकारी था, मुख्य अतिथि वर्चुअल रूप से मुख्यमंत्री,साथ में विधानसभा अध्यक्ष,उपमुख्यमंत्री एवं नगरीय प्रशासन मंत्री जुड़े हुए थे,यह आयोजन केवल औपचारिक नहीं था,बल्कि छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण की सौगात देने वाले अटल जी के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर था,इसके बावजूद एमसीबी जिले के कुछ भाजपा नेताओं ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया।
अटल जयंती नहीं…आत्मसम्मान जयंती
छत्तीसगढ़ सरकार ने 25 दिसंबर 2025 को प्रदेश के 115 नगरीय निकायों में अटल परिसर के लोकार्पण का निर्णय लिया, कार्यक्रम सरकारी था, मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री थे (वर्चुअल),साथ में विधानसभा अध्यक्ष और उपमुख्यमंत्री,यह कोई साधारण आयोजन नहीं था यह छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के शिल्पकार को नमन था,लेकिन एमसीबी जिले में यह आयोजन बदल गया सम्मान न मिलने पर बहिष्कार आंदोलन में।
जब आयोजक ही कहे मुझे बुलाया नहीं गया…
सबसे रोचक तर्क आया नगर पालिका उपाध्यक्ष मनेंद्रगढ़ की ओर से हमें आमंत्रण नहीं मिला अब जरा ठहरिए, आमंत्रण पत्र में नाम है, शिलापट्टिका में नाम है, पद के कारण आयोजक मंडल का हिस्सा हैं फिर भी दावा है न बुलाए जाने का अपमान। यह वही स्थिति है जैसे शादी का दूल्हा कहे मुझे निमंत्रण नहीं मिला, इसलिए मैं बारात में नहीं गया।
क्या भाजपा में अब अटल से बड़ा कोई सम्मान है?
यह सवाल कटु है,लेकिन जरूरी है,क्या,पार्टी की विचारधारा,पितृ पुरुषों का स्मरण,मुख्यमंत्री की मौजूदगी सब कुछ व्यक्तिगत सम्मान की कसौटी पर तौला जाएगा? यदि ऐसा है, तो भाजपा अब कैडर पार्टी नहीं, काडर-एगो पार्टी बनती दिख रही है।
अनुशासन:भाषणों में,व्यवहार में नहीं
भाजपा दशकों से कांग्रेस को अनुशासनहीनता का प्रमाणपत्र देती आई है…
लेकिन एमसीबी जिले में जो हुआ,वह बताता है अनुशासन अब भाजपा में आदेश नहीं,विकल्प बन चुका है… सरकार भाजपा की…
कार्यक्रम भाजपा के पितृ पुरुष का, और बहिष्कार भाजपा नेताओं का,यदि इसे अनुशासन कहा जाए, तो शब्दकोश बदलना पड़ेगा…
पद पार्टी ने दिया…पर पार्टी अब गौण है…
जिन नेताओं ने बहिष्कार किया वे पार्टी की कृपा से ही अध्यक्ष, उपाध्यक्ष,सभापति बने,लेकिन जब पार्टी की विचारधारा के सम्मान की घड़ी आई,तो वही पार्टी व्यक्तिगत अपमान के आगे छोटी पड़ गई,यह केवल राजनीतिक विरोध नहीं,यह राजनीतिक अहंकार है।
प्रशासनिक चूक थी,पर क्या अटल दोषी थे?
हाँ,आमंत्रण पत्र में वर्चुअल शब्द नहीं था यह प्रशासन की चूक है, लेकिन सवाल यह है क्या इस चूक की सजा अटल बिहारी बाजपेयी की जयंती को दी जानी थी? क्या विरोध मुख्यमंत्री से था या अटल जी से? यदि जवाब स्पष्ट नहीं,तो बहिष्कार का नैतिक आधार भी नहीं।
एमसीबी नहीं,भाजपा के लिए चेतावनी
जो कुछ एमसीबी में हुआ,वह स्थानीय घटना नहीं है,यह संकेत है उस खतरे का,जब पार्टी व्यक्तियों के अहंकार के आगे झुकने लगती है,यदि आज अटल जयंती पर बहिष्कार स्वीकार्य है,तो कल किस विचारधारा की बारी होगी?
पार्टी ने पद दिए, अब पार्टी से ऊपर पदधारी?
नगर पालिका उपाध्यक्ष को पार्टी ने पहले अध्यक्ष बनाया, फिर उपाध्यक्ष, पार्टी संगठन ने भरोसा किया, अवसर दिए, लेकिन जब पार्टी की विचारधारा के सम्मान का समय आया, तो व्यक्तिगत सम्मान पार्टी से ऊपर रख दिया गया, यह कार्यक्रम कोई दलीय मंच नहीं था यह सरकार का कार्यक्रम था, और सरकार भाजपा की ही थी, इसके बावजूद इसे आपसी वर्चस्व और प्रशासनिक टकराव का विषय बना दिया गया।
मेरी अंतिम पंक्ति
जिस दिन किसी पार्टी में नेता, अपने पितृ पुरुषों से बड़े हो जाएँ— उस दिन पार्टी बड़ी नहीं रहती, सिर्फ नाम भर रह जाती है।
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