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रायपुर@सलामी गई…पर सवाल खड़े रह गए

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  • औपनिवेशिक व्यवस्था हटाने का दावा…औपनिवेशिक सोच अब भी जिंदा…
  • सलामी बंद… लेकिन सबके लिए नहीं पुलिस को राहत या सिर्फ दिखावटी सुधार?

-अनिल सिन्हा-
रायपुर,25 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ सरकार ने सलामी गार्ड परंपरा में बदलाव कर एक ऐसा फैसला लिया है,जिसे काग़ज़ पर पढ़ने से लगता है कि अब शासन व्यवस्था औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकल रही है,लेकिन ज़मीन पर उतरते ही सवाल यह बनता है क्या सचमुच सलामी खत्म हुई है,या सिर्फ ‘कुछ लोगों’ की सलामी रोकी गई है? सरकार का तर्क है कि सलामी गार्ड एक औपनिवेशिक व्यवस्था की विरासत है,जो पुलिस बल की कार्यक्षमता को प्रभावित करती है, यह तर्क सही भी लगता है,आखिर जनता की सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस बल को हर दौरे में लाइन लगाकर ‘जय हो’ कराना किस आधुनिक लोकतंत्र की पहचान है? पर यहीं से व्यंग्य शुरू होता है, यह फैसला साहसिक दिखता जरूर है,लेकिन अभी भी यह आधा कदम आगे,एक कदम पीछे जैसा है, सलामी गार्ड हटाना प्रतीक है, पर असली लड़ाई उस सोच से है जो आज भी सत्ता को आम नागरिक से ऊँचा मानती है,जब वह सोच बदलेगी तब किसी आदेश की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
सलामी अब वीआईपी की हैसियत देखकर-
आदेश कहता है मंत्री, डीजीपी,वरिष्ठ अधिकारी अब दौरे पर सलामी नहीं लेंगे,लेकिन जैसे ही बात आती है संवैधानिक पदों,विशेष अतिथियों और राष्ट्रीय आयोजनों की सलामी फिर से खड़ी हो जाती है,सीना चौड़ा करके यानी संदेश साफ है सलामी बुरी है…पर सबके लिए नहीं,अगर यह औपनिवेशिक परंपरा थी, तो वह सिर्फ मंत्रियों के लिए ही औपनिवेशिक क्यों? राज्यपाल के सामने वह परंपरा अचानक संवैधानिक मर्यादा कैसे बन जाती है?
पुलिस सुधार या प्रतीकात्मक सुधार?
सरकार कहती है कि इस फैसले से पुलिस बल की कार्यक्षमता बढ़ेगी,लेकिन असली सवाल यह है क्या पुलिस बल की कार्यक्षमता सिर्फ सलामी से घट रही थी? क्या ट्रांसफर उद्योग,राजनीतिक दबाव, संसाधनों की कमी, थानों की बदहाली ष्टशद्यशठ्ठद्बड्डद्य स्4ह्यह्लद्गद्व नहीं हैं? क्या वीआईपी कल्चर सिर्फ सलामी से चलता है, या उसके पीछे पूरी व्यवस्था खड़ी है? अगर सरकार सच में पुलिस को ‘कामकाजी बल’ बनाना चाहती है, तो सलामी से ज्यादा ज़रूरी है फील्ड से अनावश्यक ड्यूटी हटाना, राजनीतिक हस्तक्षेप कम करना, जवाबदेही तय करना सलामी हटाना सुधार की शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसे सुधार मान लेना आत्मसंतोष से ज्यादा कुछ नहीं।
लोकतंत्र का आईना सलामी
नहीं,समानता चाहिए…

लोकतंत्र में सम्मान पद से नहीं, व्यवस्था से मिलता है, अगर एक मंत्री बिना सलामी के चल सकता है, तो दूसरा क्यों नहीं? अगर औपनिवेशिक परंपरा गलत है, तो वह हर स्थिति में गलत होनी चाहिए आंशिक नैतिकता भी दरअसल अनैतिकता ही होती है।
आदेश का सार (सरल भाषा में)
– आदेश क्रमांक : Gencor -35/2523/2025-HOME
– दिनांकः 19 दिसंबर 2025
– जारी विभागः गृह (सामान्य) विभाग, छत्तीसगढ़ शासन
सरकार ने क्या फैसला लिया?- राज्य शासन ने सलामी गार्ड की मौजूदा व्यवस्था में व्यापक बदलाव करते हुए इसे, औपनिवेशिक परंपरा मानते हुए सामान्य दौरों, आगमन/प्रस्थान और निरीक्षण के दौरान पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया है।
अब किन्हें नहीं मिलेगी सलामी गार्ड?- अब निम्न परिस्थितियों में सलामी गार्ड नहीं दी जाएगीः मंत्रियों के सामान्य दौरे, आगमन / प्रस्थान, जिला भ्रमण, निरीक्षण कार्यक्रम, इसमें शामिल हैंः माननीय गृहमंत्री सभी मंत्रीगण, पुलिस महानिदेशक , अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी यानी, अब वीआइ्रपी संस्कृति को औपचारिक तौर पर सीमित किया गया है।
संवैधानिक पद जिन्हें सलामी गार्ड मिलेगी…
– राज्यपाल
– संवैधानिक पदों पर आसीन महानुभाव
– प्रोटोकॉल के अंतर्गत विशिष्ट अतिथि इनके लिए सलामी गार्ड यथावत रहेगी।
सरकार का तर्क क्या है? आदेश में साफ कहा गया है कि…
– पुलिस बल की कार्य क्षमता बढ़ाने
– अनावश्यक औपनिवेशिक दिखावे को समाप्त करने
– संसाधनों का व्यावहारिक उपयोग सुनिश्चित करने
– के लिए यह निर्णय लिया गया है।
किन अवसरों पर छूट रहेगी?- कुछ राष्ट्रीय और संवैधानिक अवसरों पर सलामी गार्ड पहले की तरह दी जाएगी, राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस – 26 जनवरी, स्वतंत्रता दिवस – 15 अगस्त,शहीद पुलिस स्मृति दिवस – 21 अक्टूबर, राष्ट्रीय एकता दिवस – 31 अक्टूबर
यह फैसला क्यों अहम है?
– वीआईपी संस्कृति पर सरकारी लगाम
– पुलिस बल को प्रोटोकॉल से राहत
– प्रशासन में समानता का संदेश
– प्रतीकात्मक नहीं, व्यावहारिक शासन की दिशा


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