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बैकुंठपुर/सोनहत,@ कोहरे की सफेद चादर में लिपटा सोनहत…थम गई जनजीवन की रफ्तार

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  • हाड़ कंपाने वाली ठंडः 5-10 मीटर रह गई दृश्यता…सड़कों पर रेंगते वाहन
  • शीत लहर का डबल अटैक-कोहरा,पाला और गिरता तापमान
  • खेतों पर बर्फ जैसी परत,सब्जी की फसलों पर पाले का कहर
  • अलाव नदारद,पंचायतों की तैयारी शून्य-ठंड में कांपते लोग…


राजन पाण्डेय
बैकुंठपुर/सोनहत,24 दिसंबर 2025(घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ के उत्तरी छोर पर स्थित कोरिया जिला इन दिनों कड़ाके की ठंड, घने कोहरे और शीत लहर के त्रिकोण में फंसा हुआ है,खासकर सोनहत क्षेत्र में सुबह का नज़ारा ऐसा है मानो प्रकृति ने पूरी धरती पर सफेद चादर बिछा दी हो,दृश्यता 5 से 10 मीटर तक सिमट चुकी है और सुबह 10 बजे तक सूरज के दर्शन नहीं होना अब सामान्य हो गया है। कोहरे का सीधा असर जनजीवन और यातायात पर पड़ा है, शिव घाट,राष्ट्रीय और राज्य मार्गों पर वाहन रेंगते दिखे। यह स्थिति केवल असुविधा नहीं,बल्कि दुर्घटना का खुला न्योता है, ऐसे समय में सवाल उठता है क्या प्रशासन और स्थानीय संस्थाएं केवल मौसम के गुजर जाने का इंतजार कर रही हैं?
पालाः किसानों पर सबसे भारी मार
सोनहत ब्लॉक में तापमान गिरते ही खेतों में पाले की सफेद परत जम गई है। टमाटर,बैंगन,मिर्च, लौकी जैसी नाजुक सब्जियां झुलसने लगी हैं,आलू की फसल पर पाले का असर ऐसा है कि पत्ते जलकर काले पड़ रहे हैं,जिससे कंद का विकास रुकने और पैदावार घटने की आशंका गहरा गई है। यह सिर्फ एक मौसमीय घटना नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत पर संकट है।
अलाव नहीं, इंतज़ाम शून्य
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ग्रामीण पंचायतों में अलाव की कोई ठोस व्यवस्था नहीं दिख रही, ठंड से सबसे अधिक प्रभावित बुजुर्ग, बच्चे और गरीब तबका खुले आसमान के नीचे ठिठुरने को मजबूर है। हर साल आने वाली इस ठंड के बावजूद, व्यवस्थागत तैयारी का अभाव प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है।
सलाह है, लेकिन सहारा चाहिए
कृषि विशेषज्ञ हल्की सिंचाई और सल्फर छिड़काव की सलाह दे रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या छोटे किसान यह सब बिना संस्थागत मदद के कर पाएंगे? ठंड केवल मौसम नहीं, नीति और तैयारी की परीक्षा भी होती है।
अब चेत जाना जरूरी
कोहरा और शीत लहर कुछ दिनों में कम हो सकती है, लेकिन इससे उजागर हुई कमियां लंबे समय तक सवाल बनकर रहेंगी, पंचायतों को अलाव की व्यवस्था करनी होगी, प्रशासन को किसानों के लिए त्वरित राहत और मार्गदर्शन देना होगा, और आम लोगों को सावधानी के साथ-साथ सामूहिक सजगता दिखानी होगी, क्योंकि ठंड हर साल आती है, लेकिन लापरवाही अगर हर साल दोहराई जाए, तो नुकसान भी हर साल बढ़ेगा।


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