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कोरिया@ जल है तो कल है’ रिज टू वैली मॉडल ने बदली जल संरक्षण की सोच

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पहाड़ से घाटी तक पानी की सुरक्षा : सोनहत में दिखा मनरेगा का असर…
घुघरा में जल चेतना का जीवंत पाठ,मॉडल ने समझाया भविष्य का रास्ता
रिज टू वैलीः जब विज्ञान और पंचायत साथ आए
आवा पानी झोंकी से आगे…कोरिया में जल आंदोलन की नींव
-राजन पाण्डेय-
कोरिया,24 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)।
जल संकट आज केवल भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है, ऐसे समय में कोरिया जिले के जनपद पंचायत सोनहत अंतर्गत ग्राम पंचायत घुघरा में प्रस्तुत रिज टू वैली अवधारणा पर आधारित मनरेगा मॉडल सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि नीतिगत चेतावनी और समाधान दोनों है, अब तक जल संरक्षण की अधिकांश कोशिशें नदियों, नालों या घाटी तक सीमित रहीं, परिणाम यह हुआ कि ऊपर से बहकर आई मिट्टी और तेज बहाव ने नीचे बनी संरचनाओं को अल्पकालिक बना दिया,रिज टू वैली तकनीक इस सोच को उलट देती है पानी को नीचे पहुंचने से पहले ही रोकना, थामना और जमीन में उतारना,यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।
बता दे की कोरिया जिले के जनपद पंचायत सोनहत में जल संरक्षण को लेकर एक सकारात्मक और ज़मीनी पहल सामने आई है, प्रशासन गांव की ओर अभियान के तहत ग्राम पंचायत घुघरा में आयोजित शिविर में रिज टू वैली अवधारणा पर आधारित मनरेगा संरचनाओं का जीवंत मॉडल प्रस्तुत किया गया, जिसने जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों दोनों का ध्यान खींचा, मॉडल के माध्यम से जल-संरक्षण के महत्व को सरल और प्रभावी ढंग से समझाया गया, एक ओर जल-सजगता के अभाव में जलविहीन गांव, तो दूसरी ओर जागरूक नागरिकों द्वारा जल-संरक्षणयुक्त गांव की तस्वीर,संदेश साफ थाः आज बचत, कल सुरक्षा। हालांकि,असली परीक्षा अब शुरू होती है, मॉडल और संदेश तभी सार्थक होंगे जब रिज टू वैली संरचनाएं गुणवत्ता,निरंतर निगरानी और स्थानीय सहभागिता के साथ जमीन पर उतरेंगी। यदि यह पहल फोटो और शिविर तक सीमित रह गई,तो यह भी बाकी अभियानों की तरह इतिहास बन जाएगी, लेकिन अगर इसे सही ढंग से क्रियान्वित किया गया, तो यह तय है कोरिया जिले में जलस्तर बढ़ेगा, खेती बचेगी और गांवों का भविष्य सुरक्षित होगा।
समझें क्या है ‘रिज टू वैली’ तकनीक?
रिज टू वैली जल-संग्रहण और मृदा-संरक्षण की एक वैज्ञानिक, परिणामकारी पद्धति है, इसका मूल सिद्धांत है पहाड़ी की चोटी (रिज) से घाटी (वैली) तक पानी के बहाव को चरणबद्ध तरीके से नियंत्रित करना, ताकि भूजल रिचार्ज बढ़े और मिट्टी का कटाव रुके, कैसे काम करती है यह तकनीक? रिज (ऊपरी हिस्सा)ः छोटे-छोटे गड्ढे/ट्रेंच ताकि वर्षा जल वहीं समा जाए, ढलानः पत्थर के घेरे/कंटूर संरचनाएं पानी की गति धीमी हो, मिट्टी बहे नहीं, वैली (निचला हिस्सा)ः चेक डैम/तालाब शेष पानी का संचयन।
मुख्य लाभ
भूजल पुनर्भरण : कुओं-नलकूपों का जलस्तर सुधरता है।
मृदा संरक्षण : उपजाऊ मिट्टी सुरक्षित रहती है।
हरियाली में वृद्धि : नमी बढ़ने से पौधरोपण सफल होता है।
बाढ़ जोखिम में कमी : अचानक तेज बहाव का खतरा घटता है।
संरचनाओं की दीर्घायु : ऊपर मिट्टी रुकने से नीचे के तालाब/चेक डैम जल्दी नहीं भरते।
आवा पानी झोंकी अभियान से मिली गति-
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में आवा पानी झोंकी जैसे जन-जागरूकता अभियानों ने ग्रामीणों को वर्षा जल संचयन, भूजल संरक्षण और श्रमदान से जोड़ा है। उद्देश्य स्पष्ट है जल संकट से बचाव और भावी पीढि़यों के लिए संसाधनों की सुरक्षा।
डॉ. रामचंद्र सिंह देव की विरासत आज की पहल
जल संरक्षण के क्षेत्र में प्रेरणास्रोत रहे डॉ. रामचंद्र सिंह देव ने वर्षों पहले इसी तरह की वैज्ञानिक तकनीकों पर जोर दिया था। उनके बाद जिले में अभियानात्मक रूप में यह प्रयास पहली बार दिखा है। इसकी सफलता आगे तय होगी, पर ग्राउंड लेवल पर पंचायती अमले की सक्रियता और जन-सहयोग ने उम्मीदें मजबूत की हैं। यदि क्रियान्वयन निरंतर और गुणवत्तापूर्ण रहा, तो जलस्तर में बढ़ोतरी निश्चित है।


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