रायपुर,23 दिसम्बर 2025। छत्तीसगढ़ के मशहूर कवि, कथाकार और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल का 88 साल की उम्र में मंगलवार शाम को निधन हो गया है। एक महीने पहले ही उन्हें भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था। विनोद शुक्ल पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे। उनका रायपुर एम्स में इलाज चल रहा था। साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल को ज्ञानपीठ के महाप्रबंधक आरएन तिवारी ने वाग्देवी की प्रतिमा और पुरस्कार का चेक सौंपकर उन्हें सम्मानित किया था। ज्ञानपीठ पुरस्कार पाने वाले वे छत्तीसगढ़ के पहले साहित्यकार हैं। इस दौरान विनोद कुमार शुक्ल ने कहा था- जब हिन्दी भाषा सहित तमाम भाषाओं पर संकट की बात कही जा रही है, मुझे पूरी उम्मीद है कि नई पीढ़ी हर भाषा और हर विचारधारा का सम्मान करेगी। किसी भाषा या अच्छे विचार का नष्ट होना,मनुष्यता का नष्ट होना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विनोद कुमार शुक्ल से उनका हाल-चाल जाना था। पीएम छत्तीसगढ़ के 25वें स्थापना दिवस पर रायपुर आए थे। इस दौरान विनोद कुमार शुक्ल ने प्रधानमंत्री से कहा था कि, ‘लिखना मेरे लिए सांस लेने जैसा है। मैं जल्द से जल्द घर लौटना चाहता हूं – मैं लिखना जारी रखना चाहता हूं।’
‘हर मनुष्य को अपने जीवन में एक किताब जरूर लिखनी चाहिए ‘ : लंबे समय से बच्चों और किशोरों के लिए भी लेखन कर रहे विनोद कुमार शुक्ल ने कहा था कि उन्हें नई पीढ़ी से बहुत उम्मीदें हैं। उन्होंने कहा, अच्छी किताबें हमेशा साथ रखनी चाहिए। किसी भी क्षेत्र में शास्त्रीयता को पाना है तो उस क्षेत्र के सबसे अच्छे साहित्य के पास जाना चाहिए। आलोचना पर उन्होंने अपने स्वभाव के अनुरूप बेहद सरल लेकिन गहरी बात कही- अगर किसी अच्छे काम की आलोचना की जाती है, तो वही आलोचना आपकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। कविता की सबसे अच्छी आलोचना है- एक और बेहतर कविता लिख देना। विनोद कुमार शुक्ल ने जीवन के अनुभवों पर बात करते हुए कहा था कि असफलताएं, गलतियां और आलोचनाएं हर जगह मिलेंगी, लेकिन उसी बिखराव में कहीं छिटका हुआ अच्छा भी मौजूद होता है। ‘जब कहीं किसी का साथ न मिले, तब भी चलो-अकेले चलो। उम्मीद ही जीवन की सबसे बड़ी ताकत है। मेरे लिए लिखना और पढ़ना सांस लेने की तरह है।’ इसके बाद उन्होंने अपनी एक प्रसिद्ध कविता ‘सबके साथ’ का पाठ भी किया, जिसमें मनुष्य के भीतर मौजूद सामूहिक संवेदना की गहरी छवि दिखाई देती है।
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