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कोरिया@ एकलव्य आवासीय विद्यालय जांच दस्तावेज़ों से खुलासा,प्राचार्य-अधीक्षक बदलते रहे,गड़बडि़याँ स्थायी रहीं

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  • एकलव्य आवासीय विद्यालय में 5 साल का कागजी विकास, ज़मीनी सच्चाई में सुविधाएँ गायब
  • एकलव्य आवासीय विद्यालय पोड़ीडीह में 5 वर्षों तक चला अनियमितताओं का खेल
  • शासकीय कार्यालय में वर्षों तक चला अनियमितताओं का खेल, ऑडिट रिपोर्ट में गंभीर खुलासे
  • पाँच साल,कई प्रभारी, लेकिन गड़बड़ी एक जैसी…जांच में बड़ा खुलासा
  • कागजों में खरीदी,मौके पर नदारदःएकलव्य विद्यालय पोड़ीडीह जांच रिपोर्ट
  • क्रय समिति की बैठक बिना हुए करोड़ों का भुगतान…बच्चों के नाम पर खर्च, बच्चों को नहीं मिली सुविधाएँ
  • सरकारी कार्यालय में ‘नाम-हस्ताक्षर-भुगतान’ का त्रिकोण ऑडिट रिपोर्ट के आईने में जिम्मेदार कौन?

-रवि सिंह-
कोरिया,18 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)।
एकलव्य आदर्श संयुक्त आवासीय विद्यालय पोड़ीडीह,विकासखंड खडगवां, जिला कोरिया छत्तीसगढ़ में वर्ष 2017-18 से 2021-22 तक शासकीय धन के उपयोग में गंभीर अनियमितताओं का सिलसिला सामने आया है, यह खुलासा किसी आरोप या बयान पर नहीं,बल्कि आधिकारिक जांच प्रतिवेदन,नाम-वार पदस्थापना सूची,बिल-वाउचर,पंजी,भौतिक सत्यापन रिपोर्ट और अधिकारियों के स्वयं के लिखित बयानों के आधार पर हुआ है,जांच से यह स्पष्ट होता है कि पाँच वर्षों में करोड़ों रुपये का व्यय हुआ,लेकिन उसी अनुपात में न तो सामग्री मौके पर मिली,न ही शासन द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया।
बता दे की जिले के एक शासकीय कार्यालय में वर्ष 2018 से 2021 के बीच हुए क्रय एवं व्यय कार्यों में भारी अनियमितताओं का खुलासा हुआ है, आधिकारिक ऑडिट एवं जांच प्रतिवेदन में यह सामने आया है कि लाखों रुपये की शासकीय राशि नियमों की अनदेखी करते हुए खर्च की गई,जबकि कई मामलों में आवश्यक स्वीकृति,समिति निर्णय एवं प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, वर्ष 2018-2021 के बीच शासकीय कार्यालय में हुए क्रय-व्यय की ऑडिट जांच यह स्पष्ट करती है कि अनियमितताएं प्रणालीगत थीं,न कि आकस्मिक, दस्तावेज़ों में दर्ज हस्ताक्षरकर्ता अधिकारी, क्रय समिति से जुड़े पदाधिकारी और भुगतान आदेश जारी करने वाले जिम्मेदार तीनों स्तरों पर नियमों का उल्लंघन पाया गया,कलेक्टर (आदिवासी विकास) कोरिया एवं अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) खडगवां के आदेश पर विद्यालय में आय-व्यय की जांच,क्रय सामग्री का भौतिक सत्यापन,छात्रावास सुविधाओं की वास्तविक स्थिति की जांच कराई गई, दिनांक 18.11.2021 से 23.11.2021 के बीच गठित जांच दल ने दस्तावेज़ों,पंजीयों और मौके की स्थिति का मिलान किया।
जब ऑडिट बोले और प्रशासन चुप रहे…
छत्तीसगढ़ में अक्सर कहा जाता है भ्रष्टाचार उजागर होना बड़ी बात नहीं, उस पर कार्रवाई होना बड़ी बात है,कोरिया जिले का यह मामला उसी कड़वे सच को उजागर करता है,ऑडिट रिपोर्ट कोई अख़बारी आरोप नहीं होती। यह शासन की अपनी प्रक्रिया से निकला दस्तावेज़ होता है,जो ठोस तथ्यों,बिलों और अभिलेखों पर आधारित होता है,जब ऐसी रिपोर्ट में साफ लिखा हो कि खरीदी नियमों के विरुद्ध हुई,समिति की भूमिका संदिग्ध रही,सरकारी धन का अनुचित उपयोग हुआ, तो सवाल यह नहीं रह जाता कि घोटाला हुआ या नहीं,सवाल यह बन जाता है कि दोषियों को बचाव कौन कर रहा है? यदि एक सामान्य कर्मचारी से गलती हो जाए तो उस पर तत्काल नोटिस,जांच और निलंबन हो जाता है, लेकिन जब मामला लाखों के व्यय,वर्षों की अवधि और दर्जनों बिलों का हो तो वही प्रशासन फाइलें ठंडे बस्ते में डाल देता है,क्या यही सुशासन है? अगर जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं,वसूली की कोई पहल नहीं, जिम्मेदारी तय नहीं तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, भ्रष्टाचार को मौन स्वीकृति है,जनता के पैसे का सवाल यह पैसा किसी अधिकारी की जेब से नहीं गया, यह पैसा करदाता जनता का था,और जब जनता का पैसा इस तरह उड़ाया जाए,तो चुप रहना भी अपराध की श्रेणी में आता है।
जांच में सामने आए प्रमुख तथ्य… कागज़ों में खरीदी,ज़मीन पर नदारद
जांच के दौरान यह पाया गया कि गद्दे,बेड,अलमारी,रैक,शू-पॉलिश मशीन,डिश वॉशर,फर्नीचर,खेल सामग्री,पानी फिल्टर,बर्तन,यूनिफॉर्म कई मदों में भुगतान तो पूरा किया गया,लेकिन भौतिक सत्यापन में सामग्री या तो आंशिक मिली या पूरी तरह अनुपस्थित पाई गई,क्रय समिति केवल काग़ज़ों में थी जांच प्रतिवेदन के अनुसार 2019 से 2021 तक एक भी क्रय समिति बैठक का रिकॉर्ड नहीं, समिति के सदस्यों ने अपने बयान में स्वीकार किया कि न तो बैठक हुई,न हमें खरीद प्रक्रिया की जानकारी थी,यह स्थिति शासन के क्रय नियमों का सीधा उल्लंघन है,स्टॉक,मेस और उपस्थिति पंजी अधूरी या गायब,कई वर्षों की स्टॉक पंजी संधारित नहीं, मेस पंजी में नियमित प्रविष्टियाँ नहीं,उपस्थिति पंजी में काट-छांट व बाद में सुधार जांच में यह भी सामने आया कि कुछ पंजी बाद में तैयार किए गए प्रतीत होते हैं,छात्रावास की वास्तविक स्थिति चिंताजनक मिली थी निरीक्षण के समय कमरे गंदे,गद्दे पुराने और कम संख्या में,शौचालयों में सफाई नहीं,बच्चों के लिए खेल,टीवी,मनोरंजन की व्यवस्था नहीं,बच्चों की संख्या के अनुपात में सुविधाएँ अपर्याप्त,जबकि इन्हीं मदों में हर वर्ष लाखों रुपये खर्च दिखाए गए।
सत्ता बदली,सवाल वही…क्या आदिवासी बच्चों को अब न्याय मिलेगा?
एकलव्य आवासीय विद्यालय पोड़ीडीह का मामला सिर्फ एक शासकीय अनियमितता नहीं है, यह सत्ता, संवेदनहीनता और चयनात्मक नैतिकता का आईना है,पाँच वर्षों तक आदिवासी बच्चों के नाम पर पैसा खर्च होता रहा,सुविधाएँ काग़ज़ों में बढ़ती रहीं,लेकिन ज़मीन पर बच्चे अभाव में रहे,सबसे बड़ा और असहज सवाल यह है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में यह जांच क्यों नहीं हो पाई? उस समय दस्तावेज़ मौजूद थे, शिकायतें थीं,हालात बदतर थे फिर भी न तो सरकार जागी,न जनप्रतिनिधि,न वे चेहरे जो आज आदिवासी पीड़ा पर राजनीति कर रहे हैं,जब आदिवासी बच्चों के छात्रावास में गद्दे नहीं थे,साफ़ पानी नहीं था, सुविधाएँ नहीं थीं, तब वे कांग्रेसी नेता कहाँ थे,जो आज आदिवासी दुख के ठेकेदार बने फिर रहे हैं?
अब सवाल बीजेपी सरकार से है…
अब सत्ता बदली है,सरकार भाजपा की है और यह मामला मंत्री के गृह ग्राम क्षेत्र से जुड़ा है, तो सवाल स्वाभाविक है क्या मंत्री को इस मामले की जानकारी है? क्या वे अब तक इससे बेख़बर हैं, या चुप हैं? क्या यह मामला सिर्फ फाइलों में सिमट जाएगा क्योंकि यह “अपनों” का क्षेत्र है? या फिर यहीं से एक उदाहरणात्मक कार्रवाई होगी? राजनीति में नैतिकता की असली परीक्षा सत्ता में आकर होती है, विपक्ष में रहते हुए नहीं।
राजनीति तब क्यों नहीं हुई,जब हक छीना जा रहा था?
यह मामला दोबारा तब उछाला गया,जब आदिवासी दुख पर राजनीति शुरू हुई, लेकिन यह दुख नया नहीं है,यह दुःख तब का है जब बच्चों के नाम पर खरीदी दिखी, जब सुविधाएँ गायब थीं, जब सिस्टम आँख मूँदे बैठा था,उस समय न धरना था,न प्रेस कॉन्फ्रेंस,न आदिवासी आंसू दिखाई दिए,आज अगर इस मुद्दे पर राजनीति हो रही है,तो यह सवाल भी उतना ही जरूरी है क्या यह चिंता बच्चों के लिए है,या सत्ता-समीकरण के लिए?
सबसे बड़ा सवाल
जब हर वर्ष बजट मिलता रहा,बिल-वाउचर कटते रहे,भुगतान होते रहे तो फिर सामग्री गई कहाँ? बच्चों को सुविधाएँ क्यों नहीं मिलीं? वर्षों तक यह सब चलता कैसे रहा?एकलव्य आवासीय विद्यालय पोड़ीडीह का यह मामला किसी एक व्यक्ति या एक वर्ष तक सीमित नहीं दिखता, दस्तावेज़ बताते हैं कि यह एक लंबी अवधि की संस्थागत विफलता और संभावित वित्तीय अनियमितताओं का सिलसिला है,जिसकी जिम्मेदारी अलग-अलग कार्यकालों में अलग-अलग अधिकारियों पर बनती है, अब निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या दोषियों पर विभागीय व कानूनी कार्रवाई होगी? क्या शासकीय धन की वसूली होगी? या यह मामला भी फाइलों में सिमट कर रह जाएगा?
अब न्याय की कसौटी मंत्री के सामने है…
आज सरकार के पास पूरी जांच रिपोर्ट है,नाम-वार कार्यकाल सूची है, दस्तावेज़ हैं,बयान हैं,अब कोई बहाना नहीं बचता,अगर अब भी,जांच ठंडी पड़ती है,कार्रवाई टलती है,जिम्मेदारी तय नहीं होती तो यह मानना पड़ेगा कि आदिवासी बच्चों का हक सत्ता बदलने से भी सुरक्षित नहीं है,क्या मंत्री उस बच्चे को जवाब देंगे,जिसके नाम पर बिस्तर खरीदा गया, लेकिन वह ज़मीन पर सोया? क्या मंत्री उस छात्रावास को देखेंगे, जहाँ काग़ज़ों में विकास था, लेकिन दीवारों पर बदहाली? या फिर यह मामला भी राजनीतिक शोर में दब जाएगा? अब यह सिर्फ एक जांच नहीं, सरकार की नीयत की परीक्षा है।
मंत्री जी…यह सिर्फ फाइल नहीं…आदिवासी बच्चों का हक¸ है!
एकलव्य आवासीय विद्यालय पोड़ीडीह का मामला अब किसी दल,किसी अफ़सर या किसी पुराने शासन तक सीमित नहीं रह गया है,अब यह मामला सीधे सरकार और मंत्री की नीयत से जुड़ चुका है,यह विद्यालय मंत्री के गृह ग्राम क्षेत्र में आता है,दस्तावेज़ साफ़ हैं,जांच रिपोर्ट सामने है, नाम-वार जिम्मेदारी तय की जा सकती है, अब सवाल यह नहीं है कि क्या हुआ था अब सवाल यह है कि अब क्या होगा? मंत्री के सामने विकल्प साफ़ हैं- या तो यह मामला उदाहरणात्मक कार्रवाई बने या फिर यह भी साबित हो जाए कि आदिवासी बच्चों का हक¸ सत्ता बदलने से भी सुरक्षित नहीं,यह फैसला मंत्री को करना है और यही फैसला इतिहास में दर्ज होगा।
मंत्री के सामने विकल्प साफ़ हैं- या तो यह मामला उदाहरणात्मक कार्रवाई बने या फिर यह भी साबित हो जाए कि आदिवासी बच्चों का हक¸ सत्ता बदलने से भी सुरक्षित नहीं,यह फैसला मंत्री को करना है और यही फैसला इतिहास में दर्ज होगा।
बिना समिति अनुमोदन के खरीदी
दस्तावेज़ों के अनुसार कई सामग्री क्रय बिना सक्षम समिति की बैठक एवं अनुमोदन के किए गए। कुछ प्रकरणों में यह भी पाया गया कि क्रय के समय आवश्यक तुलना पत्र (कोटेशन) संलग्न नहीं थे, जिससे खरीदी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
नाम-वार कार्यकाल और जवाबदेही
जांच के साथ संलग्न प्रमाणित सूची के अनुसार
सुश्री बी. बड़ा (मार्च 2017 – 10.12.2019)
प्रभारी प्राचार्य रहते हुए प्रारंभिक वर्षों में बड़ी खरीदी

श्री शैलेन्द्र कुमार मिश्रा (10.12.2019 – 10.02.2021)
सबसे अधिक व्यय,लेकिन सबसे कम प्रक्रिया पालन

श्री ललित शुक्ला (10.02.2021 – 18.03.2021)
पूर्व अव्यवस्था यथावत मिली

श्री हारिक प्रसाद मिश्रा (18.03.2021 – 12.11.2021)
बिना क्रय समिति बैठक हस्ताक्षर करने की बात स्वयं स्वीकार

श्री भागवत सिंह (12.11.2021 से वर्तमान)
जांच के समय पदस्थ, दस्तावेज़ उपलब्ध कराए

छात्रावास अधीक्षक स्तर पर भी अलग-अलग कार्यकाल में वाहन भत्ता, निजी वाहन उपयोग, सामग्री की जिम्मेदारी को लेकर गंभीर प्रश्न उठे हैं।
मंत्री जी से सीधे सवाल
सवालः क्या आपको इस पूरे मामले की जानकारी है?
सवालः अगर नहीं,तो सवाल यह है कि आपके गृह क्षेत्र में पाँच साल तक चलती रही गड़बडि़यों की जानकारी आपको क्यों नहीं दी गई?
सवालः अगर जानकारी है, तो अब तक संज्ञान क्यों नहीं?
सवालः क्या फाइलें अभी भी “अध्ययनाधीन” हैं,या निर्णय लेने का साहस नहीं बन पा रहा?
सवालः क्या यह मामला इसलिए संवेदनशील है क्योंकि यह अपने क्षेत्र का है?
सवालः क्या वही प्रशासनिक सख़्ती यहाँ भी लागू होगी, जो अन्य जिलों में दिखाई जाती है?
सवालः क्या आप यह स्पष्ट करेंगे कि जांच में नाम आए अधिकारियों पर कार्रवाई होगी या नहीं? या फिर यह मामला “पूर्व सरकार” कहकर टाल दिया जाएगा?
सवालः क्या आप आदिवासी बच्चों के पक्ष में खड़े होंगे,या सिस्टम के?
कोर्ट-केंद्रित मांग

  1. स्वतंत्र/उच्चस्तरीय जांच (विजिलेंस/ईओडब्ल्यू)
  2. नामित अधिकारियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय
  3. अनियमित राशि की वसूली
  4. आईपीसी/भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अभियोजन
  5. समयबद्ध कार्रवाई की न्यायिक निगरानी

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