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कोरिया@कुर्सी पर सत्ता,खड़े जनप्रतिनिधि…क्या यही है लोकतंत्र की ‘खूबसूरती’?

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-रवि सिंह-
कोरिया,17 दिसम्बर 2025 (घटती-घटना)। यह तस्वीर सिर्फ एक ज्ञापन सौंपने का दृश्य नहीं है, यह लोकतंत्र के चरित्र पर लगा एक सवालिया निशान है,कोरिया कलेक्टर के कक्ष में कलेक्टर आराम से कुर्सी पर बैठी हैं, सामने जिला पंचायत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्य खड़े होकर ज्ञापन थमा रहे हैं और यहीं से सवाल शुरू होता है क्या जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों की यही है हैसियत? क्या प्रशासनिक पद, लोकतांत्रिक पदों से बड़ा हो गया है?
लोकतंत्र में कुर्सी नहीं, सम्मान ऊँचा होता है भारत का संविधान स्पष्ट है कलेक्टर नियुक्त होता है, जिला पंचायत अध्यक्ष चुना जाता है फिर भी दृश्य उलटा है जनादेश लेकर आए प्रतिनिधि खड़े हैं और सत्ता-तंत्र कुर्सी पर, यह कोई शिष्टाचार की छोटी सी भूल नहीं, यह प्रशासनिक अहंकार और राजनीतिक चुप्पी का संयुक्त प्रदर्शन है।
आज ज्ञापन, कल आदेश? : आज जनप्रतिनिधि ज्ञापन दे रहे हैं, कल शायद योजनाओं की फाइलें भी इसी मुद्रा में साइन होंगी और परसों जनता की आवाज़ भी खड़े होकर सुनी जाएगी यदि चुने हुए प्रतिनिधि ही सम्मान की लड़ाई नहीं लड़ेंगे, तो जनता की गरिमा कौन बचाएगा?
यह तस्वीर एक चेतावनी है

यह फोटो बताती है कि सत्ता का संतुलन बिगड़ रहा है, प्रशासन खुद को निर्वाचित संस्थाओं से ऊपर मानने लगा है और राजनीति ने टकराव की जगह समर्पण चुन लिया है लोकतंत्र की खूबसूरती कुर्सी में नहीं, बराबरी में होती है, यदि इस दृश्य को सामान्य मान लिया गया,तो आने वाले समय में जनप्रतिनिधि केवल नाम के रह जाएंगे और शासन पूरी तरह फाइलों व कुर्सियों से चलेगा, आखç¸री सवाल क्या जिला पंचायत अध्यक्ष, इस दृश्य को सही ठहराएंगे? या अगली बार सम्मान के साथ, बराबरी में खड़े होने की माँग करेंगे? क्योंकि लोकतंत्र में खड़े होकर ज्ञापन देना अपमान नहीं होना चाहिए, लेकिन उसे चुपचाप स्वीकार कर लेना खतरे की घंटी है।
क्या यह प्रोटोकॉल है या प्रभुत्व?
कोई यह तर्क दे सकता है कि कलेक्टर अपने कक्ष में हैं, इसलिए बैठी हैं लेकिन सवाल यह है जब समान स्तर के संवैधानिक संस्थानों के प्रतिनिधि सामने हों, तो क्या प्रोटोकॉल का तकाज़ा नहीं कि कलेक्टर भी खड़ी हों? या कम से कम सम्मान की बराबरी दिखाई दे? यह दृश्य बताता है कि प्रशासन अब सेवा नहीं, सर्वोच्चता की मुद्रा में है।
सबसे चिंताजनक बातः जनप्रतिनिधियों की स्वीकृति
इस तस्वीर में सबसे पीड़ादायक बात यह नहीं कि कलेक्टर बैठी हैं, बल्कि यह है कि अध्यक्ष ने इसे स्वीकार किया, उपाध्यक्ष और सदस्य मौन हैं कोई आपत्ति नहीं, कोई असहजता नहीं, कोई सवाल नहीं, यही मौन कल को परंपरा बन जाता है, और परंपरा बनते ही लोकतंत्र कमजोर हो जाता है।
तस्वीर एवं घटनाक्रम के
दृश्यात्मक विश्लेषण पर आधारित लेख

यह टिप्पणी केवल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध तस्वीर एवं घटनाक्रम के दृश्यात्मक विश्लेषण पर आधारित है, इस लेख का उद्देश्य किसी व्यक्ति, अधिकारी या संवैधानिक पद पर आसीन संस्था की नीयत, ईमानदारी या कर्तव्यनिष्ठा पर आरोप लगाना नहीं है, यह लेख न्यायालय के अधिकार क्षेत्र,प्रशासनिक प्रक्रिया या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर विमर्श के लिए प्रस्तुत किया गया है।


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