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कोरिया/एमसीबी@हमाली राशि: किसान की राहत का वादा भ्रष्ट सिस्टम की कमाई का स्थायी जरिया?

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  • हमाली राशि किसकी…किसान की सुविधा की या प्रबंधकों की कमाई की?
  • धान खरीदी का सबसे बड़ा और अनवरत चलने वाला घोटाला… किसान फिर भी सबसे ज्यादा ठगा!
  • सरकार देती है 30 लाख तक हमाली राशि,किसान फिर भी जेब से मजदूरी क्यों दे रहा?
  • धान खरीदी का सबसे बड़ा घोटाला…हमाली मद का पैसा बंदरबांट में गायब!
  • कागज़ में किसान को राहत,ज़मीन पर किसान से वसूली…कौन ले रहा हमाली का पैसा?
  • हमाली मद में सालाना करोड़ों की लूट,समिति प्रबंधन पर उठे गंभीर सवाल…
  • प्रशासन रोज आंकड़े जारी कर रहा,पर किसान से ली जा रही मजदूरी कौन देखेगा?
  • किसानों की जेब कट रही,सिस्टम के लोग मोटे हो रहे,हमाली मद का काला खेल जारी किसी किसान को फायदा नहीं, पूरा चैनल फायदा में,धान खरीदी का सबसे बड़ा चालू खेल!


-रवि सिंह-
कोरिया/एमसीबी, 07 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)।
धान खरीदी के मौसम में सरकार बड़े गर्व से दावा करती है कि किसान को एक रुपये की भी अतिरिक्त मजदूरी नहीं देनी चाहिए, इसलिए हमाली राशि बढ़ाई गई है जो प्रसवित है,करोड़ों रुपए समितियों को भेजे जाते है और घोषणा की गई कि सरकार किसान की हर चिंता का समाधान कर रही है, लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है क्या सरकार की भेजी गई यह राशि किसान तक पहुंच भी रही है? जवाब कड़वा है,लेकिन सच्चाई जानना जरूरी है नहीं। हमाली राशि, जो मजदूरों के भुगतान के लिए दी जाती है ताकि किसान पर वित्तीय बोझ न आए,वह आज धान खरीदी प्रणाली का सबसे बड़ा चालू घोटाला बन चुकी है,कागज में यह पैसा किसान की राहत है,लेकिन जमीन पर यह पैसा समिति प्रबंधकों,खरीद केंद्र के प्रभारी, समिति अध्यक्ष और उनके पूरे चैनल की निजी आय बन चुका है, किसान आज भी मजदूरों को अपनी जेब से भुगतान करता है, निर्बल, मजबूर, और पूरी तरह सिस्टम पर निर्भर किसान के पास विकल्प ही क्या है? धान बेचना है, कम से कम नुकसान में बेचना है तो वह मना भी नहीं कर सकता, ज्यादातर समितियों में मजदूरी वसूली खुलेआम, निर्भीक और बिना किसी निगरानी के होती है,यानी सरकार का पैसा और किसान का पैसा दोनों खर्च होते हैं, लेकिन राहत किसी को नहीं मिलती, सिवाय उन लोगों के जो सिस्टम को अपनी जेब के हिसाब से चलाना जानते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल- एक समिति में जब लगभग 20-25 लाख रुपए तक की हमाली राशि आती है,तो उसका हिसाब कौन लेता है? किसके पास जाता है यह पैसा? किस मजदूर को इसका भुगतान मिलता है? प्रशासन हर दिन खरीदी का आंकड़ा बताता है पर कभी किसी जिम्मेदार अधिकारी को यह जांचते नहीं देखा कि किसान से वसूली हुई या नहीं, कितना धान खरीदा गया बताना आसान है, कितना भ्रष्टाचार हुआ बताना कठिन है और शायद इसी कठिनाई ने इस घोटाले को आदत, परंपरा और सिस्टम का हिस्सा बना दिया है, सरकार की मंशा पर सवाल नहीं है मुद्दा है कि वह मंशा समितियों में बैठे कुछ लोगों की जेब के आगे दम तोड़ देती है,जब तक हमाली राशि का भुगतान डिजिटल रूप से मजदूरों के खाते में नहीं जाता, जब तक प्रत्येक समिति का हमाली ऑडिट सार्वजनिक नहीं होता, और जब तक खरीदी केंद्रों पर जमीनी निगरानी शुरू नहीं होती तब तक यह खेल जारी रहेगा, और किसान? वह हर साल की तरह इस साल भी अपना पैसा, पसीना और उम्मीद तीन खर्च करेगा। क्योंकि इस सिस्टम में उसके लिए राहत के नाम पर बनाई गई योजनाएं उसी के खिलाफ चलने वाले तंत्र को और मजबूत बनाती हैं, यह सवाल सरकार से ज़्यादा, अपने आपको जनता का सेवक कहने वाले प्रशासनिक ढांचे से पूछने की जरूरत है जब हमाली किसान की थी, तो मजदूरी किसान से क्यों? और जब पैसा सरकार ने दिया, तो फायदा समिति प्रबंधन को क्यों? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलता, तब तक धान खरीदी के हर मौसम में हमाली राशि देश की सबसे बड़ी ओपन सीक्रेट लूट बनी रहेगी।
कोरिया की समितियों में हमाली का महाघोटाला…1 करोड़ की हकीकत…30 लाख का खर्च…बाकी पैसा कहाँ गया…
धान खरीदी सत्र 2024-25 के आधिकारिक आंकड़े खुद बता रहे हैं कि कोरिया जिले में हमाली राशि के नाम पर करोड़ों का खेल हुआ चुका है जिले के 16 समितियों में पंजीकृत लगभग 25 हजार किसानों से पिछले वर्ष 12 लाख 80 हजार मि्ंटल धान की खरीदी हुई थी, सरकारी गाइडलाइन के अनुसार समितियों को 6 प्रति मि्ंटल-व्यवस्था हेतु 9 प्रति मि्ंटल हमाली भुगतान हेतु कुल मिलाकर 1 करोड़ 15 लाख रुपये से अधिक की राशि पिछले सत्र में कोरिया जिले को हमाली मद में जारी की गई थी, लेकिन सच्चाई क्या है? कोरिया जिले की समितियों में पंजीकृत हमाल हैं ही नहीं, ज्यादातर समितियां कुछ 4, 6 या अधिकतम 10 मजदूरों को दैनिक मजदूरी (300 रुपये प्रतिदिन) पर काम करवाती हैं, यदि पूरे खरीदी सत्र का वास्तविक खर्च जोड़ें तो लगभग 50-55 दिन खरीदी कार्य सभी समितियों के मजदूर मिलाकर कुल खर्च 30-35 लाख रुपये से अधिक नहीं बनता फिर 70-80 लाख रुपये कहाँ गए? यह राशि किन-किन के बीच बंटी? किसने अपने हिस्से का कितना ‘कमीशन’ तय किया? यह प्रश्न अब किसानों में उबाल पैदा कर रहे हैं, इस वर्ष हमाली राशि बढ़ाने का प्रस्तावित घोटाले का आकार दोगुना होने की संभावना है सूत्रों के अनुसार इस वर्ष शासन स्तर पर हमाली मद का बढ़ा हुआ प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है अनुमान लगाया जा रहा है कि हमाली राशि 9 रुपये से बढ़कर 14-15 रुपये प्रति मि्ंटल तक जा सकती है व्यवस्था और भंडारण मद भी बढ़ाया जा सकता है यदि पिछले वर्ष कोरिया में 12.80 लाख मि्ंटल खरीदी पर 1 करोड़ से अधिक की राशि जारी हुई थी, तो इस वर्ष बढ़ी हुई दरों पर यह राशि कोरिया जिले में ही 2.5 से 3 करोड़ रुपये के पार जाएगी, और सबसे बड़ा सवाल क्या मजदूरों का भुगतान बढ़ेगा? या सिर्फ घोटाले का आकार बढ़ेगा? जमीनी वास्तविकता कहती है मजदूर अब भी 300 रुपये रोज़ की ‘मनमानी’ मजदूरी पर काम कर रहे हैं, यानी राशि बढ़ेगी, पर हमाली नहीं घोटाला बढ़ेगा।
दो दशक से जारी ‘हमाली बंदरबांट’ का सिस्टम
ध्यान देने वाली बात यह है कि धान खरीदी की यही संरचना 2012-13 से लगातार चल रही है,हर वर्ष करोड़ों की हमाली राशि जारी होती है,लेकिन न पंजीकृत हमाल,न निर्धारित भुगतान,न पारदर्शी रसीद,न बकायदा उपस्थिति,न पेमेन्ट की ऑडिट सिर्फ कागजी भुगतान और बंदरबांट की गारंटी।
राजनीतिक संरक्षण का बड़ा खेल
छत्तीसगढ़ में सहकारी समितियों में पिछले दो पंचवर्षीय से चुनाव ही नहीं हुए,अध्यक्ष मनोनीत होते हैं और योग्यता सिर्फ एकःसत्ताधारी दल के स्थानीय नेतृत्व का चेला होना,कांग्रेस शासन हो या वर्तमान भाजपा दोनों में समिति अध्यक्षों पर किसानों से ज्यादा कर्मचारियों का हित साधने का आरोप है,सूत्र बताते हैं कई समितियों के अध्यक्ष को धान खरीदी शुरू होने से पहले ही 3 से 5 लाख रुपये तक का ‘एडवांस’ मिल चुका है,इसलिए वे किसानों के हितैषी की जगह हमाली-भुगतान में शामिल कर्मचारियों का कवच बनकर खड़े हैं,किसान उन्हें शासन का प्रतिनिधि समझते हैं,लेकिन समिति अध्यक्ष किसानों के शोषणकर्ताओं की ढाल बन चुके हैं।
फर्जी धान खरीदी और अन्य मदों में भी करोड़ों का खेल
हमाली राशि के अलावा समितियों में कागजी धान खरीदी (फर्जी उपार्जन),राइस मिलर्स की मिलीभगत,खाद-यूरिया वितरण अनियमितता,फसल बीमा के नाम पर कटौती,अमानत राशि का गबन, गुणवत्ता दिखाकर अवैध वसूली हर समिति में लाखों नहीं,करोड़ों का झोल-झाल होता है।
वर्तमान वर्षः फिर वही खेल…
इस वर्ष भी शासन ने लगभग 14 प्रति मि्ंटल जारी किए जिसमें 5 रूपए सुरक्षा व भंडारण 9 हमाली लगभग वही मात्रा खरीद होने पर हमाली राशि फिर लगभग 1 करोड़ रुपये से अधिक बनेगी,पर वास्तविक भुगतान? फिर से सिर्फ 30-35 लाख,यानी इस वर्ष भी 70-80 लाख रुपये का संभावित गोलमाल,हमाली के नाम पर हो रही यह संगठित बंदरबांट सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं,किसानों के नाम पर चलाया जा रहा एक सिस्टेमेटिक ‘शोषण मॉडल’ है,जब धान खरीदी के असली श्रमिकों तक एक रुपये का भी हिस्सा नहीं पहुँचता और समिति अध्यक्ष-कर्मचारी-ठेकेदार पूरे खेल का हिस्सा बने रहते हैं,तब यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, किसानों के साथ किया गया धोखा है।
हमाली राशि किसके लिए?… कागज में किसान के लिए… जमीन पर चैनल की कमाई के लिए
सरकार किसानों की सुविधा के लिए हमाली मद में मोटी राशि देती है, एक औसत समिति में यह रकम 25-30 लाख रुपए तक पहुंच जाती है,लेकिन किसान मजदूरों को अपनी जेब से मजदूरी देता है,जबकि नियम के अनुसार यह भुगतान समिति को करना चाहिए,सरकार द्वारा भेजी गई हमाली राशि किसान तक पहुंचती ही नहीं,यह राशि प्रायः समिति प्रबंधक,धान खरीदी प्रबंधक,अध्यक्ष और इनके बीच के पूरे चैनल में बंट जाती है,किसान को न तो श्रम से राहत मिलती है,न पैसा बचता है, अर्थात हमाली राशि नाम की सरकारी सहायता किसान को नहीं,बल्कि समितियों में बैठे प्रभावशाली लोगों को ताकत और मोटी कमाई देती है।
हर दिन प्रशासन धान खरीदी के आंकड़े बताता है…पर कौन बताएगा किसान से वसूली गई मजदूरी का हिसाब?
प्रशासन रोज प्रेस नोट जारी करता है आज इतने किसानों ने धान बेचा, इतनी मात्रा खरीदी गईज् लेकिन कोई यह जांचने ग्रामीण समितियों तक जमीन पर उतरता ही नहीं कि क्या किसान से अवैध मजदूरी वसूली की जा रही है? क्या हमाली राशि वास्तव में मजदूरों को दी जा रही है? क्या प्रबंधक और अध्यक्ष इस राशि का बंदरबांट कर रहे हैं? किसान के सामने विकल्प दो ही हैं या तो जेब से मजदूरी दे, या अपना धान खरीदी केंद्र में जमा ही न कर पाए, यानी सरकारी घोषणा और जमीनी सच के बीच पूरा का पूरा भ्रष्टाचार का खाई खड़ी है।
सरकार की मंशा अच्छी, सिस्टम में बैठे लोग इसे लूट का जरिया बना चुके हैं…
सरकार की सोच किसान पर अतिरिक्त खर्च न आए जमीनी अमल किसान से मजदूरी लो और हमाली राशि खुद बांट लो, यदि हमाली राशि का आज तक सबसे बड़ा पीडि़त कोई है, तो वह किसान ही है, और यदि इसका सबसे बड़ा लाभार्थी कोई है, तो वह समिति प्रबंधन का नेटवर्क है।
सरकार देती है, सिस्टम खा जाता है… हमाली रकम का पूरा खेल उजागर
कागज़ पर किसान के लिए बनी सुविधा, जमीन पर समितियों की निजी कमाई बन चुकी है। मजदूरों को भुगतान किसान के जेब से, जबकि लाखों की हमाली राशि का बंदरबांट प्रबंधन करता है।
हमाली मद में 25-30 लाख की एंट्री,पर किसान को एक रुपया नहीं…कहाँ जाता है यह पैसा?
एक समिति में लाखों की राशि पहुंचती है लेकिन भुगतान किसान से वसूला जाता है। मजदूर भी उसी का पैसा लेते हैं, और सरकारी राशि समिति प्रबंधक, अध्यक्ष और चैनल में बंट जाती है।
प्रशासन आंकड़े देखता है,जमीनी सच नहीं… किसान से अवैध मजदूरी वसूली कौन रोक रहा?
हर दिन खरीदी के नंबर जारी होते हैं, मगर यह कोई नहीं जांचता कि किसान से जबरन मजदूरी वसूली जा रही है या नहीं। हमाली राशि के वास्तविक उपयोग पर निगरानी शून्य है।
कठोर सवाल जो प्रशासन को जवाब देने चाहिए
जब सरकार हमाली राशि देती है,तो किसान को मजदूरों को भुगतान क्यों करना पड़ता है?
हमाली राशि का ऑडिट कौन करता है?
समिति प्रबंधकों पर कार्रवाई कब होगी?
किसान को वास्तविक राहत का लाभ कब तक मिलेगा?
क्योंकि यदि यह स्थिति जारी रही, तो धान खरीदी में सरकार के वादे और कागज़ी सुधार सिर्फ घोषणा बनकर रह जाएंगे,और उनकी कीमत किसान आज भी चुका रहा है…


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