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खड़गवां@पट्टा नहीं, पीएम आवास नहीं…फिर भी ‘बेघर-आदिवासी’ की झूठी कहानी क्यों?

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  • पीएम आवास कहीं और…अवैध निर्माण कहीं… वन विभाग की कार्यवाही के बाद कांग्रेस के निशाने पर स्थानीय मंत्री
  • क्या कांग्रेस के कुछ नेता पीडि़तों का दर्द बाँटने नहीं,बल्कि मंत्री को घेरने की राजनीतिक स्कि्रप्ट लेकर पहुंचे थे?
  • झूठे नैरेटिव का बुलडोज़र…पीएम आवास नहीं, अवैध कब्जे गिरे…
  • राजनीति की स्कि्रप्ट तैयारज्सच आया तो पूरा प्लान फ्लॉप…
  • तीन-तीन नोटिस की रिसीविंग के बाद भी ‘पीडि़त’ बनाने का खेल…
  • वन विभाग की कार्रवाई,मंत्री पर निशाना: दुख कम,राजनीति ज्यादा…
  • अवैध कब्जा हटते ही नेताओं का दर्द क्यों जागा?
  • वन विभाग की कार्रवाई की हीरो शिप किसकी—विभाग के अफसरों की या फिर मंत्री के निजी आवास पर भीड़ लगाना ही राजनीति का “शॉर्टकट”?

-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,26 नवंबर 2025 (घटती-घटना)।
बीते दिनों वन विभाग ने रतनपुर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर अवैध अतिक्रमण हटाते हुए तीन दुकान और एक कच्चा-मकान जमींदोज किया, कार्यवाही पूरी तरह नोटिस-आधारित थी, लेकिन कुछ राजनीतिक चेहरों ने इसे आदिवासी बेघर, पट्टे की जमीन तोड़ी और पीएम आवास गिराया जैसे आरोपों के साथ घेराबंदी में बदलने की कोशिश शुरू कर दी, मगर जब मीडिया का पूरा दल मौके पर पहुँचा, तो तस्वीर पूरी तरह उलट निकल आई।
अवैध कब्जे का सच—और राजनीति का झूठा प्रायश्चित यदि बता करे रतनपुर की घटना यह भी बताती है कि दिल्ली–रायपुर की राजनीति से ज्यादा खतरनाक है गांव की छोटी राजनीति, जहाँ सच्चाई की मौत भी चुपचाप हो जाती है और झूठ ट्रैक्टर ट्रॉली में बैठकर सीधे मंत्री के घर तक पहुँच जाता है, सवाल यह नहीं कि अवैध कब्जा क्यों तोड़ा गया सवाल यह है कि अवैध कब्जाधारियों को राजनीतिक छतरी किस कीमत पर मिली? जिस मंत्री को निशाने पर लिया गया, उनकी भूमिका शून्य। कार्रवाई वन विभाग की; नोटिस वन विभाग के; जमीन वन विभाग की; और फायदा लेने की कोशिश नेताओं की, यह वही राजनीति है जो पीडि़त को ‘पीडि़त’ नहीं बनने देती, पहले उसे अपनी पार्टी की प्रॉपर्टी बनाती है, फिर उसके कंधे पर बंदूक रखकर सत्ता पर निशाना साधती है, और यह भी याद रखा जाए—जब झूठ को सच की तरह सजाया जाता है, तब असली पीडि़त कानून नहीं, समाज होता है, वन भूमि बचाने के नाम पर लड़ाई बहुत कम लोग लड़ते हैं, लेकिन वन भूमि कब्जाने वालों की पैरवी करने वाले अचानक ‘क्रांतिकारी’ बन जाते हैं, क्योंकि भीड़ सच्चाई नहीं पूछती वह सिर्फ नारा देखती है, रतनपुर मामले ने एक कड़वा सच सामने रखा है यदि राजनीतिक फायदे के लिए अवैध कब्जे को भी ‘आदिवासी अधिकार’ जैसी पवित्र आवाज़ के साथ जोड़कर बेचा जा सकता है, तो फिर आने वाले वर्षों में अफसर काम करने से डरेंगे और नेता ट्वीट करने का साहस बढ़ाएँगे। सबसे बड़ा अपराध क्या है?—अवैध कब्जा? या अवैध कब्जे को सामाजिक न्याय के नाम पर धोकर परोस देना? इस सवाल का जवाब रतनपुर में मिला है—और वह किसी को अच्छा नहीं लगेगा, यह राज्य का दुर्भाग्य नहीं, राजनीति का चेहरा है।
राजनीतिक रंग क्यों चढ़ा? स्थानीय मंत्री को घेरने की कोशिश
स्थानीय मंत्री के गृह ग्राम से जोड़कर कुछ नेताओं ने इसे मंत्री बनाम आदिवासी का रूप देने की कोशिश की, जबकि कार्यवाही पूरी तरह वन विभाग की है, नोटिस विभाग ने जारी किए, अवैध कब्जे वन भूमि पर थे, बेघर-आदिवासी नैरेटिव फर्जी निकला तो सवाल बनता है, क्या कुछ नेता सिर्फ मंत्री को घेरने के लिए पीडि़तों के कंधे पर राजनीति की बंदूक रख रहे थे?
वन विभाग…अवैध कब्जा हटाना मजबूरी… और कई जगह चिन्हांकित हैं…
विभाग ने कहा कई नोटिस के बाद भी कब्जाधारी नहीं हटे,तब कार्रवाई की गई, और भी कई अतिक्रमण चिन्हांकित हैं कार्रवाई आगे भी होगी।
झूठ का राजनीतिक खेल—वन विभाग की वैध कार्यवाही को मोड़ने की कोशिश
ग्राम वासियों के बयान,नोटिस,मौके की जांच,विभागीय कागज सब मिलकर दिखाते हैं कि अतिक्रमण हुआ,नोटिस दिए गए,मकान-दुकान गैरकानूनी थे,पीडि़त मूल निवासी नहीं,बेघर होने की बात फर्जी,राजनीति का नैरेटिव सच से बिल्कुल उलट कुछ लोग राजस्व/वन विभाग की वैध कार्यवाही को मंत्री के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन तथ्यों ने उनकी कहानी ढहा दी।
रतनपुर की घटना एक आइना है जहाँ सच साफ दिख रहा है…
स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जयसवाल का कहना है की वन विभाग की कार्रवाई को स्थानीय मंत्री से जोड़ना, राजनीति की वही पुरानी स्कि्रप्ट है तथ्य गायब, नैरेटिव हाजि़र, सवाल यही है कि नेताओं को पीडि़त के घर से ज़्यादा मंत्री का घर क्यों दिखा? जब राजनीति सच से बड़ी हो जाए तो अवैध कब्जाधारी भी रातों-रात ‘आदिवासी पीडि़त’ बना दिए जाते हैं, रतनपुर की घटना एक आइना है जहाँ सच साफ दिख रहा है, लेकिन कुछ लोग धुंध फैलाने पर उतारू हैं।
बड़ा खुलासा-1
जिस ‘पट्टे’ की दुहाई—वह जमीन पर मकान था ही नहीं…

सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा फैलाया गया झूठ यही था कि करीमन के पट्टे वाली जमीन पर बने घर को तोड़ दिया गया, लेकिन मौके पर मिला सच करीमन की पट्टे वाली जमीन पर कोई घर बना ही नहीं था, जिस घर को सुशीला ने करीमन ने जगह दी ये कहकर बताया,वह पूरी तरह वन विभाग की जमीन पर पाया गया, सुशीला बोली करीमन ने कहा यह उनकी पट्टे की जमीन है, हमने घर बना लियाज्सौदा हुआ था या पैसा लिया गया? इस पर सुशीला ने कहा यह मेरे पति बताएँगे, यानी पट्टे तोड़ा गया पूरी तरह फर्जी नैरेटिव!

बड़ा खुलासा-2
बेघर?—नहीं… सबके पास दूसरी पंचायत में पक्के मकान मौजूद

\जिस सुलेमान को बेघर बताकर भावनात्मक कार्ड खेला गया, वह कोड़ांगी में पहले से पक्का मकान वाला निकला, सरपंच, स्थानीय लोगों और तथ्यों से साफ हुआ, कोई भी मूल निवासी नहीं, यहाँ वोटर-लिस्ट में नाम तक नहीं, कई लोगों पर मकान बनाकर बेचने का धंधा करने का भी आरोप, मतलब—आदिवासी बेघर जैसी बातें सिर्फ राजनीतिक माहौल बनाने के लिए फैलाई जा रही थीं।

बड़ा खुलासा-3
नोटिस नहीं दिया गया?- तीन-तीन नोटिस की रिसीविंग मौजूद

वन परिक्षेत्राधिकारी शंखमुनि पांडे के अनुसार 03 सितम्बर 2024, 21 अगस्त 2025 व 17 सितम्बर 2025 नामित अतिक्रमणकारियों ने राजेंद्र प्रधान, सुलेमान/नागेंद्र और रामप्रसाद को तीन नोटिस दिए गए, रिसीविंग विभाग के पास मौजूद है, अर्थात बिना नोटिस बुलडोज़रभी मनगढ़ंत कहानी!

बड़ा खुलासा-4
पीएम आवास तोड़ने का दावा भी फर्जी

सरपंच नरेंद्र सिंह ने साफ कहा रतनपुर में ऐसे किसी व्यक्ति के नाम पर पीएम आवास है ही नहीं, जिसका घर वन विभाग ने तोड़ा, हाँ एक पीएम आवास पहले से ही अवैध था खड़गवां के नाम पर स्वीकृत, रतनपुर में बनाया गया जिस पर जनपद पहले ही नोटिस जारी कर चुका था, उस जगह पर वन विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो “पीएम आवास तोड़ दिया गया—पूरी तरह गलत सूचना।

बड़ा खुलासा-5
रामप्रसाद-यहाँ का नहीं, सूरजपुर जिले का निवासी

पीडि़त लिस्ट में शामिल नामों की जांच में सामने आया रामप्रसाद तो रतनपुर का निवासी भी नहीं, वह सूरजपुर जिले का रहने वाला है यानी इस अतिक्रमण ग्रुप का स्थानीय जमीन से कोई संबंध नहीं, फिर भी राजनीतिक नैरेटिव में इन्हें ‘मूल निवासी आदिवासी’ बताया जा रहा था।
स्थानीय लोगों की राय: “ये हाल के वर्षों में आए,पहचान बाद में बनी…मूल निवासी नहीं…
स्थानीय ग्रामीणों के बयान बेहद स्पष्ट
-“यहाँ का कोई मूल निवासी नहीं।”
-“पिछले वर्षों में कब्जा किया गया।”
-“एक व्यक्ति कई घर बनाकर बेचता है।”
-“पीएम आवास, पट्टा—सब फर्जी दावा।” यानी पूरी राजनीति एक झूठी कहानी पर खड़ी।


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