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रायपुर@क्या सरकारी स्कूल शिक्षक पढ़ाने लायक नहीं…इसलिए अब कुत्ते भगाने की ड्यूटी सौंप दी गई?

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हाईकोर्ट सख्त,विभाग लाचार… और शिक्षक असहाय…

  • स्कूलों के आसपास आवारा कुत्तों पर कार्रवाई के
  • आदेश…पर सवाल ये कि पढ़ाएगा कौन?
  • सरकारी स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा खतरे में,शिक्षा की गुणवत्ता
  • पहले से ही नीचे,अब अध्यापकों पर कुत्ते भगाने का बोझ…
  • क्या शिक्षा विभाग खुद मान चुका है कि शिक्षक पढ़ा नहीं पा रहे… इसलिए अब फोकस कुत्ता नियंत्रण पर?
  • क्या सरकारी शिक्षक अब पढ़ाएंगे नहीं…सिर्फ कुत्ते भगाएंगे?
  • शिक्षा व्यवस्था पर सवाल और आदेशों की उलझन ने खोली कई परतें


न्यूज डेस्क
रायपुर,22 नवम्बर 2025 (घटती-घटना)।
सरकारी स्कूलों के शिक्षकों से पढ़ाई की उम्मीद टूट चुकी है,क्या यही वजह है कि कांग्रेस सरकार में गौठानों के लिए मवेशी संभालने का बोझ डाला गया और अब भाजपा सरकार में स्कूलों से कुत्ते भगाने की जिम्मेदारी थमा दी गई है? शिक्षा व्यवस्था पहले से ही लड़खड़ा रही है,और विभाग की नीतियाँ इसे और हास्यास्पद बना रही हैं,जिन शिक्षकों को बच्चों का भविष्य संभालना चाहिए, उन्हीं से अब कुत्ते भगाने,रिपोर्ट बनाने, मटर छीलने,स्वेटर बाँटने और गैर-शैक्षणिक काम करवाए जा रहे हैं, सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं,लेकिन विभाग की तरफ से जारी हो रहे ‘अजीबोगरीब आदेश’ चर्चा और विवाद दोनों का कारण बन रहे हैं। हालिया निर्देशों में शिक्षक पढ़ाई छोड़कर कुत्ते भगाने,सवाल यह है कि क्या सरकार को अब यह स्वीकार है कि शिक्षक पढ़ाने का काम ठीक से नहीं कर पा रहे? छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य के स्कूलों में बच्चों पर बढ़ते कुत्ते हमलों पर कड़ा रुख अपनाते हुए सभी जिलों को 24 घंटे के भीतर रिपोर्ट देने का आदेश दिया है,लोक शिक्षा संचालनालय ने पशुपालन विभाग के पत्र के आधार पर तत्काल कार्रवाई की अनिवार्यता लागू कर दी है,लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक और बड़ा सवाल उठाया है जब सरकारी शिक्षक पढ़ाई छोड़कर सर्वे, गौठान,पंचायत कार्य और अब कुत्ते भगाने जैसे कामों में झोंके जा रहे हैं,तो शिक्षा व्यवस्था सुधरेगी कैसे? शिक्षा विभाग का नया आदेश केवल प्रशासनिक कठोरता नहीं,यह सरकारी शिक्षा प्रणाली का आईना है, शिक्षकों ने खुद वर्षों तक जो अनदेखी की उसका बोझ आज कुत्ता भगाने,गौठान,सर्वे, फाइलों और रिपोर्टिंग के रूप में उनके सिर पर ही आ रहा है,अगर शिक्षक अपनी असली भूमिका—पढ़ाना-पढ़ाना और सिर्फ पढ़ाना—निभाएँ,तो सरकारें कभी ऐसे आदेश जारी करने की हिम्मत भी नहीं कर पायेगा।
क्या यह आदेश शिक्षकों की कार्यप्रणाली की देन है?
जब पढ़ाई नहीं हुई,तो गैर-शैक्षणिक कामों का बोझ बढ़ना ही था,यह कड़वा सच है कि यह नया आदेश—कुत्ता भगाने वाला फरमान—कहीं न कहीं सरकारी स्कूलों में वर्षों से चली आ रही शिक्षकों की कमजोर कार्यप्रणाली और गैर-जिम्मेदारी का भी परिणाम है, सरकारी स्कूलों में शिक्षक तनख्वाह समय पर लेते हैं,लेकिन पढ़ाई की गुणवत्ता पर न गंभीरता,न परिणामों की जिम्मेदारी,शिक्षिकाएँ स्कूल में स्वेटर बुनते,गैप भरते,मटर छीलते दिख जाती थीं,यह दृश्य किसी एक जिले या एक ब्लॉक का नहीं पूरे राज्य में आम है, वहीं कई पुरुष शिक्षक स्कूल समय में नदारत,और उनकी उपस्थिति सिर्फ वेतन बिल में दर्ज। परिणाम—शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ टूट गई बच्चों का सीखने का स्तर गिरा, अभिभावकों का भरोसा टूटा,और सरकारी स्कूल गरीबों की मजबूरी बनकर रह गए। यही कार्यप्रणाली सरकारों को मजबूर करती रही? कांग्रेस में गौठान का बोझ,अब भाजपा में कुत्ता भगाने का फरमान, सरकारें बार-बार यह मान चुकी हैं कि है की शिक्षक पढ़ाई में उतना योगदान नहीं दे पा रहे,तो फिर इन्हें दूसरे प्रशासनिक काम में लगा दो।
सच्चाई कड़वी जरूर है…पर यही है…
जब शिक्षा नहीं सुधरी,तो आदेश उलझे हुए आते ही रहेंगे,यदि सरकारी स्कूलों में,शिक्षक अपनी भूमिका गंभीरता से निभाएँ,उपस्थिति वास्तविक हो,कक्षा में पढ़ाई हो,और परिणाम दिखें तो न सरकारों को यह दिन देखने पड़ते, न शिक्षकों को कुत्ता भगाने जैसे शर्मनाक आदेश झेलने पड़ते।
विशेषज्ञों की टिप्पणी
नेताओं-अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ें,तब व्यवस्था सुधरेगी-यह सवाल वर्षों से उठा है कि जब शिक्षक,नेता,अधिकारी अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाते हैं,तो सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता कौन सुधारेगा? अगर शासकीय शिक्षक,विधायक,कलेक्टर,विभागीय सचिव,शिक्षा अधिकारियों के बच्चे सरकारी स्कूल में हों,तो न केवल पढ़ाई सुधरेगी,बल्कि ऐसे ‘उलटे-सीधे आदेश’ भी आना बंद होंगे।
हाईकोर्ट सही…पर शिक्षा विभाग की प्राथमिकताएँ गलत…
आवारा कुत्तों पर नियंत्रण जरूरी है बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है,लेकिन यह भी उतना ही सच है कि शिक्षक पर इतना गैर-शैक्षणिक बोझ डालने से शिक्षा का स्तर और गिर रहा है, पंचायत और निकाय अपनी जिम्मेदारी से बचते हैं और बोझ स्कूलों पर डाल देते हैं विभाग सिर्फ कोर्ट के आदेश पर सक्रिय होता है,बच्चों की पढ़ाई कभी उसकी प्राथमिकता नहीं बनती?
आखिर शिक्षा व्यवस्था में सुधार कौन करेगा?
आज स्थिति यह है कि शिक्षक पढ़ाने के बजाय आदेशों की पूर्ति में लगे हैं, बच्चों का आधारभूत सीखने का स्तर गिर रहा है, अभिभावक सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं कर पा रहे, सरकारें दिखावे के प्रयोग कर रही हैं, मूल समस्या को नहीं छू रहीं, शिक्षक पढ़ाने के बजाय कुत्ते भगाने या सर्वे भरने में लगेंगे तो शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं,बल्कि मज़ाक बन जाएगी। सरकारी शिक्षकों और अधिकारियों के बच्चे यदि खुद सरकारी स्कूलों में पढ़ें तभी शिक्षा सुधार की वास्तविक शुरुआत होगी।
कांग्रेस सरकार में
गौठानों में मवेशी पहुँचाने
गतिविधियों की मॉनिटरिंग
योजनाओं के सर्वे

भाजपा सरकार में
स्कूलों से आवारा कुत्ते भगाने
पंचायत को रिपोर्ट भेजने
आपदा जैसी त्वरित कार्रवाई जैसे आदेश शिक्षकों पर इतना बोझ इसलिए बढ़ा—क्योंकि विभाग को खुद भरोसा नहीं रहा कि स्कूलों में शिक्षा सुचारू चलेगी।


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